वाशिंगटन,29 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका की विदेश नीति में लैटिन अमेरिका एक बार फिर केंद्र में आ गया है। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के सामने पेश होते हुए विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने वेनेजुएला को लेकर गंभीर और कड़े शब्दों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि निकोलस मादुरो के शासनकाल में वेनेजुएला पश्चिमी गोलार्ध में चीन,रूस और ईरान के लिए एक रणनीतिक ठिकाने के रूप में उभर गया था,जो सीधे तौर पर अमेरिका की सुरक्षा और प्रभाव के लिए बड़ा खतरा बन गया। रुबियो के बयान न केवल वेनेजुएला की आंतरिक राजनीति पर सवाल खड़े करते हैं,बल्कि यह भी दिखाते हैं कि अमेरिका अपने ही पड़ोस में बढ़ते चीनी और रूसी प्रभाव को किस नजर से देखता है।
सीनेट समिति को संबोधित करते हुए रुबियो ने कहा कि यह खतरा किसी दूर-दराज के महाद्वीप से नहीं,बल्कि अमेरिका के अपने ही गोलार्ध से पैदा हो रहा था। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला एक ऐसा देश बन गया था,जहाँ एक ऐसे शासन का कब्जा था,जिसे एक अभियुक्त मादक पदार्थ तस्कर चला रहा था और जिसने दुनिया के लगभग हर उस देश को वहाँ खुली छूट दे रखी थी,जिसे अमेरिका अपना प्रतिद्वंद्वी, विरोधी या दुश्मन मानता है। रुबियो के अनुसार,यह स्थिति केवल वैचारिक टकराव की नहीं थी,बल्कि सीधे तौर पर रणनीतिक और सुरक्षा से जुड़ा हुआ मसला था।
मार्को रुबियो ने अपने बयान में सबसे ज्यादा जोर चीन की भूमिका पर दिया। उन्होंने कहा कि चीन वेनेजुएला के तेल को भारी छूट पर हासिल कर रहा था और इसके जरिए अमेरिका के बेहद करीब अपना आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ा रहा था। रुबियो ने खुलासा किया कि चीन को वेनेजुएला का तेल करीब 20 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिल रहा था। कई मामलों में चीन इसके लिए नकद भुगतान भी नहीं करता था,बल्कि इसे वेनेजुएला पर चढ़े पुराने कर्ज की भरपाई के तौर पर इस्तेमाल करता था। उनके मुताबिक,यह व्यवस्था पूरी तरह से वेनेजुएला के लोगों के हितों के खिलाफ थी।
रुबियो ने साफ शब्दों में कहा कि यह तेल वेनेजुएला की जनता की संपत्ति है,लेकिन उसे ‘बार्टर’ यानी लेन-देन के नाम पर चीन को सौंप दिया जा रहा था। उन्होंने बताया कि उस दौर में वेनेजुएला से चीन,रूस और ईरान तीनों ही अपने-अपने हितों को साधने में लगे हुए थे। चीन आर्थिक लाभ और दीर्घकालिक रणनीतिक पकड़ बनाने में जुटा था,रूस राजनीतिक और सैन्य प्रभाव बढ़ा रहा था,जबकि ईरान इस देश को अमेरिका के खिलाफ अपने ऑपरेशन और नेटवर्क के लिए इस्तेमाल कर रहा था। रुबियो के अनुसार,यह गठजोड़ अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक खतरा बन गया था।
अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि इसी वजह से वाशिंगटन ने मादुरो सरकार के खिलाफ सख्त कदम उठाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य वेनेजुएला की संप्रभुता को कमजोर करना नहीं था,बल्कि उस स्थिति को बदलना था,जिसमें यह देश अमेरिका के विरोधी देशों का अड्डा बन चुका था। रुबियो के मुताबिक,यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की जाती तो अमेरिका के अपने ही पड़ोस में एक स्थायी रणनीतिक संकट पैदा हो सकता था।
अपने बयान में रुबियो ने अमेरिकी नेतृत्व में लगाए गए तेल ‘क्वारंटीन’ का भी जिक्र किया। उन्होंने साफ किया कि इसे ‘नाकाबंदी’ कहना सही नहीं होगा,लेकिन इसके चलते चीन को मिलने वाला सस्ता वेनेजुएला तेल काफी हद तक कम हो गया है। उन्होंने कहा कि चीन आज भी वेनेजुएला का तेल खरीद सकता है,लेकिन अब उसे वही कीमत चुकानी होगी,जो दुनिया के अन्य देशों को चुकानी पड़ती है। इस कदम का मकसद चीन को अनुचित आर्थिक लाभ से रोकना और वेनेजुएला के संसाधनों के दुरुपयोग पर लगाम लगाना था।
रुबियो ने यह भी जानकारी दी कि प्रतिबंधों के तहत वेनेजुएला के तेल से होने वाली आय अब सीधे मादुरो सरकार के हाथ में नहीं जा रही है। यह रकम अमेरिकी निगरानी में रखे गए खातों में जमा की जा रही है,ताकि भविष्य में इसका इस्तेमाल वेनेजुएला के लोगों के हित में किया जा सके। उन्होंने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि यह पैसा भ्रष्टाचार,अवैध गतिविधियों या विदेशी शक्तियों के हितों में खर्च हो। रुबियो के अनुसार,यह व्यवस्था वेनेजुएला की जनता के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है।
चीन की व्यापक रणनीति पर बात करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि बीजिंग की नीति विचारधारा से ज्यादा आर्थिक दबाव पर आधारित है। उन्होंने कहा कि चीन आमतौर पर दूरसंचार,अहम बुनियादी ढाँचे और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों में दिलचस्पी दिखाता है। रुबियो ने आरोप लगाया कि चीनी कंपनियाँ अक्सर “खराब समझौतों” और भारी कर्ज के जरिए देशों को अपने जाल में फँसा लेती हैं। एक बार जब देश कर्ज के बोझ तले दब जाता है,तो चीन वहाँ अपने रणनीतिक हितों को आसानी से आगे बढ़ाता है।
हालाँकि,रुबियो ने यह भी दावा किया कि लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में चीन का प्रभाव अब पहले जितना मजबूत नहीं रहा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पनामा ने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से बाहर निकलने का फैसला किया है,जो इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के कई देश अब चीनी रणनीति को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं। उन्होंने कहा कि लैटिन अमेरिका में राजनीतिक बदलाव हो रहे हैं और कई सरकारें अब अपने दीर्घकालिक हितों को नए सिरे से परख रही हैं।
मार्को रुबियो ने अपने बयान के अंत में अमेरिका के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि वाशिंगटन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वेनेजुएला दोबारा कभी भी ईरान,रूस और चीन का खेल का मैदान न बने। उन्होंने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि यह सब अमेरिका के अपने ही गोलार्ध में हो रहा था,जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। रुबियो के अनुसार,अमेरिका की रणनीति केवल दबाव बनाने की नहीं है,बल्कि क्षेत्र में स्थिरता,पारदर्शिता और लोगों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने की है।
सीनेट में दिया गया रुबियो का यह बयान आने वाले समय में अमेरिका की लैटिन अमेरिका नीति की दिशा को भी स्पष्ट करता है। यह साफ संकेत है कि वाशिंगटन अब अपने पड़ोस में चीन,रूस और ईरान की मौजूदगी को लेकर और ज्यादा सतर्क और आक्रामक रुख अपनाने के लिए तैयार है। वेनेजुएला इस बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष का एक अहम केंद्र बन चुका है,जहाँ ऊर्जा संसाधन,राजनीतिक सत्ता और वैश्विक प्रभाव की लड़ाई आपस में गहराई से जुड़ गई है।
