इस्लामाबाद,2 फरवरी (युआईटीवी)- पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत में हिंसा ने एक बार फिर भयावह रूप ले लिया है। सुरक्षा बलों ने करीब 40 घंटे तक चले एक बड़े सैन्य अभियान में कुल 145 लोगों को मार गिराया है। यह कार्रवाई हाल के दिनों में बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों में हुई बंदूक और बम हमलों की एक “तालमेल वाली” श्रृंखला के जवाब में की गई। स्थानीय मीडिया ने प्रांतीय मुख्यमंत्री सरफराज बुगती के हवाले से इस पूरे घटनाक्रम की पुष्टि की है,जबकि इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) ने बताया कि इस अभियान में 92 उग्रवादी मारे गए। इसके साथ ही 15 आम नागरिकों की मौत की भी पुष्टि की गई है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
मुख्यमंत्री सरफराज बुगती के अनुसार,हालिया हमलों और जवाबी कार्रवाई में कुल 31 सुरक्षाकर्मियों और नागरिकों की मौत हुई है। इनमें पुलिस,फ्रंटियर कोर और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के 17 जवान शामिल हैं। इसके अलावा,पाकिस्तान नौसेना के एक अधिकारी की भी जान गई है। कई अन्य लोग इन हमलों और सैन्य कार्रवाई में घायल हुए हैं,जिनका अलग-अलग अस्पतालों में इलाज जारी है। सरकार का कहना है कि यह अभियान सुरक्षा स्थिति को नियंत्रित करने और उग्रवादी नेटवर्क को तोड़ने के लिए जरूरी था।
पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में हाल के वर्षों में हिंसा की यह सबसे खतरनाक लहर मानी जा रही है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध यह इलाका लंबे समय से अशांति का केंद्र रहा है। बलूचिस्तान की सीमाएँ ईरान और अफगानिस्तान से लगती हैं,जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है। हालाँकि,स्थानीय आबादी लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि प्रांत की प्राकृतिक संपदा का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा और केंद्र सरकार संसाधनों पर नियंत्रण बनाए हुए है। इसी पृष्ठभूमि में यहां अलगाववादी और विद्रोही संगठनों की गतिविधियाँ दशकों से जारी हैं।
पाकिस्तान के उप गृह मंत्री तलाल चौधरी ने हालिया हमलों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि हमलावर आम नागरिकों के वेश में अस्पतालों,स्कूलों, बैंकों और बाजारों में घुसे और फिर अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। चौधरी के अनुसार,दुकानों में काम कर रहे सामान्य लोगों को निशाना बनाया गया और कई मामलों में नागरिकों को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि हर हमले में एक ही पैटर्न देखने को मिला,जहाँ हमलावर पहले आम लोगों की तरह घुले-मिले और फिर अचानक हिंसा को अंजाम दिया।
इन हमलों की जिम्मेदारी अलगाववादी संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने ली है। संगठन ने दावा किया है कि उसने ‘हीरोफ’ या ‘काला तूफान’ नाम से एक संगठित अभियान चलाया,जिसके तहत पूरे बलूचिस्तान में सुरक्षाबलों और सरकारी ठिकानों को निशाना बनाया गया। बीएलए का यह भी दावा है कि उसने सुरक्षा बलों के 80 से ज्यादा जवानों को मार डाला और 18 को बंदी बना लिया। हालाँकि,पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है और उन्हें उग्रवादियों का प्रचार करार दिया है।
आईएसपीआर के मुताबिक,सुरक्षा बलों ने खुफिया जानकारी के आधार पर कई इलाकों में एक साथ ऑपरेशन शुरू किया। यह अभियान करीब 40 घंटे तक चला, जिसमें उग्रवादियों के ठिकानों को निशाना बनाया गया और बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया गया। सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि सुरक्षा बलों ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि आम नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुँचे,लेकिन हमलावरों द्वारा नागरिक इलाकों में छिपने और मानव ढाल का इस्तेमाल करने के कारण स्थिति बेहद जटिल हो गई थी।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन आर्थिक रूप से सबसे गरीब प्रांत है। यहाँ दशकों से चल रहा विद्रोह कभी तेज होता है,तो कभी कुछ समय के लिए शांत पड़ जाता है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। बलूच समुदाय के अलगाववादी समूह लंबे समय से अधिक स्वायत्तता,राजनीतिक अधिकार और प्रांत के प्राकृतिक संसाधनों—खासतौर पर गैस,खनिज और बंदरगाह परियोजनाओं में बड़े हिस्से की माँग करते रहे हैं। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार और सेना प्रांत की संपदा का दोहन करती हैं,जबकि स्थानीय आबादी को गरीबी,बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से जुड़ी परियोजनाओं के चलते भी बलूचिस्तान में तनाव बढ़ा है। कई बलूच संगठनों का मानना है कि इन परियोजनाओं से बाहरी ताकतों को फायदा हो रहा है,जबकि स्थानीय लोगों को हाशिये पर रखा जा रहा है। इसी कारण,उग्रवादी समूह अक्सर सुरक्षा बलों के साथ-साथ बुनियादी ढाँचे और विदेशी हितों से जुड़े ठिकानों को भी निशाना बनाते रहे हैं।
हालिया हिंसा और सैन्य अभियान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ सैन्य कार्रवाई से बलूचिस्तान की समस्या का समाधान संभव है। मानवाधिकार संगठनों और विश्लेषकों का मानना है कि जब तक राजनीतिक संवाद,आर्थिक भागीदारी और स्थानीय लोगों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं सुना जाएगा,तब तक हिंसा का यह चक्र टूटना मुश्किल है। वहीं,पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था बहाल करना उसकी प्राथमिकता है और उग्रवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
फिलहाल बलूचिस्तान के कई इलाकों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त बल तैनात किया गया है। हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं और आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह सैन्य अभियान हिंसा को रोकने में कारगर साबित होता है या बलूचिस्तान एक बार फिर लंबे संघर्ष की ओर बढ़ता है।
