नई दिल्ली,11 फरवरी (युआईटीवी)- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने के दावे ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। इस मामले में दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार,दिल्ली सरकार,दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब माँगा है। अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या इसी तरह का कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को तय की गई है।
यह पूरा मामला उस रिपोर्ट के बाद सामने आया,जिसमें दावा किया गया था कि वर्ष 2026 के पहले 15 दिनों में दिल्ली में 800 से अधिक लोग लापता हो गए। रिपोर्ट के अनुसार, इन लापता लोगों में 191 नाबालिग और 616 वयस्क शामिल हैं। आँकड़ों के मुताबिक,अब तक 235 लोगों का पता लगाया जा चुका है,जबकि 572 लोग अब भी लापता बताए गए हैं। इन आँकड़ों ने आम नागरिकों के बीच चिंता बढ़ा दी है और सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि लापता लोगों को लेकर मीडिया में दो अलग-अलग तरह के नैरेटिव चल रहे हैं। अदालत ने संकेत दिया कि एक ओर रिपोर्ट में गंभीर स्थिति का दावा किया जा रहा है,वहीं दूसरी ओर पुलिस प्रशासन इन आँकड़ों को गलत तरीके से पेश किया गया बता रहा है। ऐसे में सच्चाई का पता लगाना जरूरी है। अदालत ने संबंधित एजेंसियों से स्पष्ट करने को कहा है कि वास्तविक स्थिति क्या है और लापता लोगों की खोज के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
इस मामले में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्षी दल आम आदमी पार्टी ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि देश की राजधानी में पिछले 15 दिनों में 800 से अधिक लोग गायब हो गए हैं और इनमें से अधिकांश बच्चियाँ हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सरकार के “चारों इंजन” फेल हो गए हैं और लोगों से अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहने की अपील की।
हालाँकि,दिल्ली पुलिस ने 6 फरवरी को इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया था। पुलिस का कहना है कि आँकड़ों को गलत तरीके से पेश कर लोगों में भय और दहशत फैलाने की कोशिश की जा रही है। पुलिस ने स्पष्ट किया कि लापता व्यक्तियों के मामलों में कई बार कुछ दिनों के भीतर ही लोगों का पता लगा लिया जाता है और ऐसे मामलों को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना भ्रामक हो सकता है। दिल्ली पुलिस ने चेतावनी भी दी थी कि जो लोग जानबूझकर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाकर अफवाह का माहौल बना रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस बीच 9 फरवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने कहा कि यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही हैं,तो यह गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला हो सकता है। एनएचआरसी ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग ने यह जानना चाहा है कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों के लापता होने के पीछे क्या कारण हैं और उनकी खोज व सुरक्षा के लिए प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट और एनएचआरसी दोनों के हस्तक्षेप से इस मामले की गहन जाँच संभव हो सकेगी। अदालत का नोटिस यह संकेत देता है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और वह तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना चाहती है। वहीं दूसरी ओर पुलिस प्रशासन का कहना है कि लापता मामलों को लेकर स्थापित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाती है और हर शिकायत को दर्ज कर जाँच की जाती है।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि चाहे आँकड़ों की प्रस्तुति में कोई भ्रम क्यों न हो,लापता व्यक्तियों का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है और इसे राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए। विशेष रूप से नाबालिगों के मामलों में त्वरित कार्रवाई और पारदर्शिता बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि लापता मामलों के आँकड़ों को सार्वजनिक करते समय स्पष्ट श्रेणियों में जानकारी दी जानी चाहिए,ताकि यह समझा जा सके कि कितने मामले नए हैं,कितने पुराने लंबित हैं और कितनों का समाधान हो चुका है।
फिलहाल सभी की नजरें 18 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के समक्ष जब संबंधित एजेंसियाँ अपना पक्ष रखेंगी,तब यह स्पष्ट हो सकेगा कि राजधानी में लापता लोगों की वास्तविक स्थिति क्या है। यह मामला न केवल कानून-व्यवस्था,बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकार से भी जुड़ा है,इसलिए उम्मीद की जा रही है कि अदालत के निर्देशों के बाद स्थिति और अधिक स्पष्ट और पारदर्शी होगी।
