अमेरिकी राष्ट्रपति के पूर्व सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन

ईरान युद्ध पर ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर उठे सवाल,जेक सुलिवन ने चेताया—‘स्पष्ट लक्ष्य के बिना भटक सकता है संघर्ष’

नई दिल्ली,9 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में तेजी से बदलते हालात के बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि भले ही अमेरिकी सेना सामरिक स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रही हो,लेकिन यदि युद्ध का अंतिम रणनीतिक उद्देश्य स्पष्ट नहीं होगा,तो यह संघर्ष गलत दिशा में जा सकता है। सुलिवन ने चेतावनी दी कि बिना स्पष्ट लक्ष्य के शुरू किया गया युद्ध न केवल अमेरिकी सैनिकों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है,बल्कि इसके दूरगामी भू-राजनीतिक परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

अमेरिकी समाचार नेटवर्क के एक प्रमुख कार्यक्रम में बातचीत के दौरान सुलिवन ने अमेरिकी सेना की क्षमताओं की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि अमेरिका की सैन्य ताकत दुनिया में सबसे पेशेवर और सक्षम बलों में से एक है और वह किसी भी सामरिक लक्ष्य को हासिल करने में असाधारण क्षमता रखती है। उनके अनुसार अमेरिकी सेना की ट्रेनिंग,तकनीकी कौशल और अनुशासन इसे दुनिया की सबसे प्रभावशाली सैन्य शक्तियों में शामिल करते हैं।

हालाँकि,सुलिवन ने इस प्रशंसा के साथ ही एक गंभीर चेतावनी भी दी। उनका कहना था कि सैन्य स्तर पर सफलता तभी सार्थक होती है,जब उसके पीछे स्पष्ट रणनीतिक दिशा हो। यदि राजनीतिक नेतृत्व यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि युद्ध का अंतिम उद्देश्य क्या है,तो युद्ध का रास्ता भटक सकता है और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।

सुलिवन ने कहा कि अमेरिका पहले ही इस अभियान के दौरान अपने कई सैनिकों को खो चुका है। उनके अनुसार जब किसी देश के सैनिक युद्ध में जान जोखिम में डालते हैं,तो यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि यह संघर्ष किस लक्ष्य को हासिल करने के लिए लड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि सैनिकों के बलिदान का सम्मान तभी हो सकता है,जब युद्ध के उद्देश्य और परिणाम स्पष्ट रूप से परिभाषित हों।

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने आरोप लगाया कि मौजूदा प्रशासन इस मामले में स्पष्टता दिखाने में असफल रहा है। उनके अनुसार अमेरिकी सरकार ने अब तक इस युद्ध के बारे में कई अलग-अलग कारण पेश किए हैं और ये कारण समय-समय पर बदलते भी रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि युद्ध शुरू करने से पहले पूरी तरह से विचार नहीं किया गया था।

उन्होंने कहा कि यदि किसी सैन्य अभियान के पीछे ठोस और स्थिर रणनीतिक दृष्टिकोण नहीं होता तो वह अभियान धीरे-धीरे अनियंत्रित हो सकता है। इससे न केवल सैन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ता है,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।

सुलिवन ने यह भी आशंका जताई कि अमेरिकी नेतृत्व इस युद्ध से गलत सबक ले सकता है। उन्होंने पिछले कुछ सैन्य अभियानों का हवाला देते हुए कहा कि कभी-कभी सीमित सैन्य सफलता नेताओं को यह विश्वास दिला देती है कि वे दुनिया के किसी भी हिस्से में सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके अपनी इच्छा के मुताबिक परिणाम हासिल कर सकते हैं। उनके अनुसार यह सोच खतरनाक हो सकती है क्योंकि हर संघर्ष का अपना अलग राजनीतिक और रणनीतिक संदर्भ होता है।

इस संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी नेता को यह लगने लगे कि सैन्य शक्ति हर समस्या का समाधान है,तो इससे भविष्य में और बड़े संघर्षों का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि यह सोच अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को और अधिक अस्थिर बना सकती है।

सुलिवन ने चेतावनी दी कि ईरान के खिलाफ युद्ध के भू-राजनीतिक परिणाम भी काफी जटिल हो सकते हैं। उनका मानना है कि इस संघर्ष से कुछ ऐसे देश लाभ उठा सकते हैं जो पहले से ही अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी हैं। उन्होंने विशेष रूप से रूस का उल्लेख करते हुए कहा कि इस स्थिति का फायदा उठाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

उनके अनुसार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस संघर्ष को अपने रणनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सुलिवन ने कहा कि कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि रूस कथित तौर पर ईरान को खुफिया जानकारी उपलब्ध करा सकता है,ताकि वह अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझ सके। यदि ऐसा होता है,तो यह संघर्ष और अधिक जटिल रूप ले सकता है।

उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े युद्ध में केवल दो पक्ष ही प्रभावित नहीं होते,बल्कि कई अन्य देश भी उससे अप्रत्यक्ष रूप से लाभ या नुकसान उठाते हैं। उनके अनुसार वर्तमान संघर्ष में रूस उन देशों में शामिल हो सकता है,जिन्हें इससे रणनीतिक लाभ मिल सकता है।

सुलिवन ने यह भी कहा कि इस युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। उन्होंने विशेष रूप से तेल की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का जिक्र किया और कहा कि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता आ सकती है। तेल की कीमतों में तेजी का असर दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है और इससे वैश्विक आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है।

इसके अलावा उन्होंने यह भी चिंता जताई कि मध्य पूर्व में युद्ध के कारण अमेरिका के सैन्य संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। उनका कहना था कि अमेरिका पहले से ही यूरोप में चल रहे संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और वहाँ उसके सहयोगियों को समर्थन की आवश्यकता है।

सुलिवन ने कहा कि जब अमेरिका को यूरोप में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रणनीतिक निर्णय लेने की जरूरत थी,तब मध्य पूर्व में बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत ने संसाधनों का ध्यान दूसरी दिशा में मोड़ दिया। उनके अनुसार इससे यूरोप में सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि अमेरिका एक साथ कई बड़े सैन्य मोर्चों पर सक्रिय रहता है,तो उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं में टकराव पैदा हो सकता है। इससे लंबे समय में अमेरिकी विदेश नीति पर भी असर पड़ सकता है।

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस संघर्ष के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों पर भी चर्चा की। उनका मानना है कि इस तरह के युद्ध वैश्विक राजनीति में नई मिसालें स्थापित कर सकते हैं। यदि बड़े देश बार-बार बिना स्पष्ट अंतर्राष्ट्रीय सहमति के सैन्य कार्रवाई करते हैं,तो इससे अंतर्राष्ट्रीय कानून और संस्थाओं की भूमिका कमजोर हो सकती है।

सुलिवन ने कहा कि दुनिया पहले ही एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है,जहाँ शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। ऐसे समय में यदि प्रमुख शक्तियाँ अंतर्राष्ट्रीय नियमों की अनदेखी करती हैं,तो वैश्विक व्यवस्था और अधिक अस्थिर हो सकती है।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह की परिस्थितियों से कुछ अन्य क्षेत्रीय विवाद भी प्रभावित हो सकते हैं। सुलिवन के अनुसार यदि शक्तिशाली देश यह महसूस करने लगें कि सैन्य ताकत का उपयोग बिना बड़े अंतर्राष्ट्रीय विरोध के किया जा सकता है,तो इससे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ सकता है।

इस संदर्भ में उन्होंने पूर्वी एशिया की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक संकेतों का असर वहाँ भी पड़ सकता है। उनका मानना है कि यदि बड़ी शक्तियाँ शक्ति के आधार पर फैसले लेने लगें तो इससे भविष्य में और बड़े संघर्षों की आशंका बढ़ सकती है।

सुलिवन के इन बयानों ने अमेरिकी विदेश नीति और सैन्य रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जहाँ एक ओर कुछ विश्लेषक अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं,वहीं दूसरी ओर कई विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस युद्ध के पीछे स्पष्ट और दीर्घकालिक रणनीति मौजूद है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलते समीकरणों के बीच यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है। फिलहाल इतना साफ है कि ईरान के साथ बढ़ता टकराव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है,बल्कि इसका असर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति,वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।