नई दिल्ली,10 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में लगातार बिगड़ते हालात के बीच एक तरफ जहाँ सैन्य टकराव तेज होता जा रहा है,वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक कोशिशें भी समानांतर रूप से जारी हैं। बेंजामिन नेतन्याहू ने लेबनान के साथ सीधे संवाद शुरू करने का संकेत देकर एक अहम पहल की है,लेकिन इस पहल के साथ ही ईरान की कड़ी चेतावनी ने पूरे क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे समय में जब संघर्ष-विराम बार-बार टूट रहा है और जमीनी हालात अस्थिर बने हुए हैं,यह घटनाक्रम शांति और युद्ध के बीच की महीन रेखा को और स्पष्ट कर रहा है।
इजरायल की सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक,प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने लेबनान के साथ जल्द से जल्द सीधी बातचीत शुरू करने का निर्देश दिया है। यह निर्णय उस पृष्ठभूमि में लिया गया है,जब लेबनान की ओर से बार-बार संवाद की इच्छा जताई जा रही थी। नेतन्याहू ने कहा कि यह बातचीत मुख्य रूप से दो अहम मुद्दों पर केंद्रित होगी—पहला,हिज्बुल्लाह का निरस्त्रीकरण और दूसरा, दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक शांति स्थापित करना।
नेतन्याहू ने अपने बयान में यह भी कहा कि इजरायल,लेबनान के प्रधानमंत्री द्वारा बेरूत को डीमिलिटराइज करने की अपील का स्वागत करता है। उन्होंने इसे एक सकारात्मक संकेत बताते हुए कहा कि यदि दोनों पक्ष ईमानदारी से आगे बढ़ें,तो क्षेत्र में स्थिरता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है। हालाँकि,इस प्रस्ताव के बावजूद जमीनी हालात अभी भी बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
दरअसल,हाल के दिनों में इजरायल द्वारा लेबनान में किए गए लगातार हमलों ने संघर्ष-विराम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन हमलों को लेकर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान का कहना है कि यह कार्रवाई न केवल संघर्ष-विराम समझौते का उल्लंघन है,बल्कि इससे शांति वार्ता की संभावनाएँ भी कमजोर पड़ती हैं। ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि यह आक्रामक रुख जारी रहा,तो वह भी जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लेबनान में इजरायल की दोबारा घुसपैठ “खुला उल्लंघन” है और यह भविष्य में होने वाले किसी भी समझौते के प्रति प्रतिबद्धता की कमी को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी परिस्थितियों में बातचीत “बेमानी” हो जाएगी। उनके बयान में यह भी स्पष्ट था कि ईरान अपने सहयोगियों को किसी भी कीमत पर अकेला नहीं छोड़ेगा।
ईरान का यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लेबनान स्थित हिज्बुल्लाह का प्रमुख समर्थक माना जाता है। हिज्बुल्लाह इस पूरे संघर्ष में इजरायल के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभा रहा है। ऐसे में ईरान की चेतावनी का सीधा असर न केवल इजरायल-लेबनान संबंधों पर पड़ेगा,बल्कि व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
इसी बीच,अमेरिका की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में दो सप्ताह के संघर्ष-विराम पर सहमति बनी है,जिसके बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस के इस्लामाबाद जाने की तैयारी की खबरें भी सामने आई हैं। हालाँकि,इन रिपोर्ट्स को लेकर आधिकारिक स्तर पर अभी स्पष्टता नहीं है।
पाकिस्तान,जो इस पूरे कूटनीतिक प्रयास में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है,उसके लिए भी यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है। एक ओर उसे दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना है,वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को भी ध्यान में रखना है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता को लेकर उम्मीदें तो हैं,लेकिन मौजूदा तनावपूर्ण माहौल में इसकी सफलता पर सवाल भी उठ रहे हैं।
इस बीच एक और दिलचस्प घटनाक्रम सामने आया,जब पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रेजा अमीरी मोगादम ने सोशल मीडिया पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पाकिस्तान पहुँचने की जानकारी दी,लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने अपना पोस्ट हटा लिया। इस घटना ने कूटनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है और यह संकेत भी दिया है कि पर्दे के पीछे कई स्तरों पर बातचीत चल रही हो सकती है।
यह पूरा घटनाक्रम मध्य पूर्व की जटिल राजनीति और संघर्ष की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है। एक ओर जहाँ नेतन्याहू का संवाद प्रस्ताव शांति की दिशा में एक कदम माना जा सकता है,वहीं दूसरी ओर ईरान की चेतावनी और इजरायल के जारी हमले इस प्रक्रिया को कमजोर करते नजर आ रहे हैं। ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और क्या वास्तव में इस क्षेत्र में स्थायी शांति की कोई संभावना बन पाती है या नहीं।
