वाशिंगटन,9 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी अस्थिरता के बीच अमेरिका और ईरान के बीच घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम ने भले ही कुछ राहत की उम्मीद जगाई हो,लेकिन जमीनी हालात अब भी बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। शुक्रवार से इस्लामाबाद में प्रस्तावित शांति वार्ता से पहले ही ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए अमेरिका को चेतावनी दे दी है कि यदि उसकी शर्तें नहीं मानी गईं,तो वह बातचीत से पीछे हट सकता है। इस बयान ने न केवल वार्ता की संभावनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं,बल्कि पूरे क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है।
ईरान की मुख्य माँग यह है कि इजरायल तुरंत लेबनान में अपने सैन्य हमले बंद करे। तेहरान का स्पष्ट कहना है कि जब तक लेबनान में स्थायी युद्धविराम लागू नहीं होता,तब तक किसी भी तरह की शांति वार्ता का कोई मतलब नहीं है। इस बीच ईरानी सरकारी एजेंसियों फ़ार्स और तसनीम ने उन मीडिया रिपोर्ट्स को सिरे से खारिज कर दिया है,जिनमें यह दावा किया गया था कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुँच चुका है। ईरान ने इन खबरों को “पूरी तरह झूठा” करार दिया और साफ किया कि फिलहाल बातचीत में शामिल होने की कोई योजना नहीं है।
ईरान के एक जानकार सूत्र के हवाले से कहा गया है कि अमेरिका को पहले अपने वादों को पूरा करना होगा। विशेष रूप से लेबनान में युद्धविराम को लेकर जो प्रतिबद्धताएँ जताई गई थीं,उन्हें लागू करना जरूरी है। सूत्र ने यह भी कहा कि जब तक इजरायल अपने हमले नहीं रोकता,तब तक इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत को स्थगित रखा जाएगा। इस बयान से साफ है कि ईरान इस बार किसी भी तरह की कूटनीतिक प्रक्रिया में बिना ठोस परिणाम के शामिल होने के मूड में नहीं है।
गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में युद्धविराम की घोषणा के बाद ईरान में हमले लगभग थम गए थे। हालाँकि,इसके उलट इजरायल ने लेबनान में अपने सैन्य अभियान को तेज कर दिया। बुधवार को हुए ताजा हमलों में कम से कम 182 लोगों की मौत की खबर सामने आई,जिसने पूरे क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है। इजरायल का कहना है कि वह ईरान समर्थित संगठन हिज्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है,जो इस संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल है।
हिज्बुल्लाह,जिसे ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है,इस पूरे संघर्ष में तेहरान के समर्थन में उतर चुका है। इजरायल का आरोप है कि यह संगठन नागरिक इलाकों के भीतर से अपनी गतिविधियाँ संचालित करता है,जिससे उसे निशाना बनाना और भी जटिल हो जाता है। हालाँकि,स्थानीय निवासियों और अधिकारियों ने इन दावों का खंडन किया है और कहा है कि कई बार बिना किसी पूर्व चेतावनी के रिहायशी इलाकों पर हमले किए जा रहे हैं,जिससे आम नागरिकों की जान जा रही है।
इजरायल के लगातार हमलों के जवाब में ईरान ने एक बड़ा कदम उठाते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके बंद होने से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी हलचल मच गई है। ईरान के इस कदम ने पहले से ही नाजुक युद्धविराम को टूटने के कगार पर ला खड़ा किया है।
इस बीच,ईरान की सेना की प्रमुख इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने बयान जारी कर कहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करना इजरायल के हमलों के खिलाफ एक जवाबी कार्रवाई है। आईआरजीसी ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के सामने रखे गए 10 सूत्रीय प्रस्ताव में लेबनान में हमले रोकने की शर्त भी शामिल थी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी कहा कि लेबनान में युद्ध समाप्त करना युद्धविराम समझौते का अभिन्न हिस्सा था।
हालाँकि,इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस दावे को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस तरह की कोई शर्त औपचारिक समझौते में शामिल नहीं थी। इस बयानबाजी ने तीनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया है,जिससे शांति वार्ता की राह और कठिन हो गई है।
तनाव के बीच गुरुवार को इजरायल ने दावा किया कि उसने हिज्बुल्लाह के वरिष्ठ नेता नईम कासिम के करीबी सहयोगी अली यूसुफ हर्षी को मार गिराया है। हालाँकि,इस पर हिज्बुल्लाह की ओर से तुरंत कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। इस तरह की घटनाएँ लगातार यह संकेत दे रही हैं कि जमीनी स्तर पर संघर्ष अभी भी जारी है और किसी भी समय हालात और बिगड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत फरवरी के अंतिम दिनों में हुई थी,जब क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ने लगा। इसके बाद लगातार सैन्य कार्रवाइयों और जवाबी हमलों का सिलसिला शुरू हुआ,जिसने पूरे मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया। 7 अप्रैल को डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्धविराम की घोषणा के बाद उम्मीद जगी थी कि हालात सुधरेंगे और कूटनीतिक समाधान की दिशा में कदम बढ़ेंगे। इसी के तहत 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में शांति वार्ता प्रस्तावित की गई थी।
लेकिन वार्ता शुरू होने से पहले ही जिस तरह की धमकियाँ और बयान सामने आ रहे हैं,उन्होंने इस प्रक्रिया की सफलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है,तो दूसरी ओर इजरायल अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए है। अमेरिका, जो इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है,वह भी इन विरोधाभासी स्थितियों के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष करता नजर आ रहा है।
इस स्थिति में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है,क्योंकि इस्लामाबाद को इस वार्ता का मंच चुना गया है। हालाँकि,क्षेत्रीय तनाव और सुरक्षा चिंताओं के बीच यह देखना अहम होगा कि क्या यह बातचीत वास्तव में हो पाती है या नहीं।
यह पूरा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि मध्य पूर्व में शांति स्थापित करना कितना जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य है। जहाँ एक ओर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं,वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर जारी हिंसा और राजनीतिक बयानबाजी इस प्रक्रिया को कमजोर कर रही है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता वास्तव में हो पाएगी और यदि होती है,तो क्या इससे क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जा सकेगा या नहीं।
