वाशिंगटन,11 मई (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक टकराव और गहरा हो गया है। ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत के लिए अपना नया ड्राफ्ट प्रस्ताव भेज दिया है,लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें ईरान का जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया और यह अमेरिका के लिए स्वीकार्य नहीं है। इस घटनाक्रम ने पहले से तनावपूर्ण माहौल को और अधिक गंभीर बना दिया है,खासकर तब जब होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री इलाकों में सैन्य गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है और यह उन्हें बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। ट्रंप ने अपने बयान में तीखा रुख अपनाते हुए संकेत दिया कि वाशिंगटन अब तेहरान के प्रति और सख्त नीति अपना सकता है। उनके इस बयान के कुछ ही घंटे पहले ईरान ने पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए अमेरिका को अपना प्रस्ताव भेजा था।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पुष्टि की कि तेहरान ने अपना जवाब अमेरिका तक पहुँचा दिया है। हालाँकि,उन्होंने इस प्रस्ताव की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की। माना जा रहा है कि पाकिस्तान दोनों देशों के बीच तनाव कम कराने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार,तेहरान का प्रस्ताव मुख्य रूप से क्षेत्र में जारी दुश्मनी और सैन्य संघर्ष को समाप्त करने पर केंद्रित था। रिपोर्टों में कहा गया कि ईरान ने लड़ाई को आधिकारिक रूप से खत्म करने,होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और अमेरिकी नौसेना के उन जहाजों को हटाने की माँग की है,जिन्हें तेहरान समुद्री नाकाबंदी लागू करने वाला मानता है। इसके अलावा ईरान ने आर्थिक प्रतिबंध हटाने और बातचीत के लिए अतिरिक्त 30 दिन का समय देने की भी माँग रखी है।
रिपोर्टों के मुताबिक ईरान ने यह भी प्रस्ताव दिया कि भविष्य की बातचीत में उसके परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा को अलग रखा जाए। तेहरान लंबे समय से कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है,जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को आशंका है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को खारिज करने के बाद तेहरान पर अमेरिका के साथ “गेम खेलने” का आरोप लगाया। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि अब ईरान ज्यादा खुश नहीं रहेगा। ट्रंप के इस बयान को पश्चिम एशिया में संभावित सैन्य कार्रवाई के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ईरान को स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाना चाहता। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन किसी भी शांति समझौते के लिए इसे अनिवार्य शर्त मानता है। रुबियो के मुताबिक जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट और पारदर्शी रुख नहीं अपनाएगा,तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।
ईरान के जवाब से पहले ट्रंप प्रशासन ने मध्यस्थों के जरिए 14 बिंदुओं वाला एक प्रस्ताव भेजा था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस फ्रेमवर्क में ईरान की परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण,क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताएं और सैन्य गतिविधियों में बदलाव जैसी माँगें शामिल थीं। हालाँकि,तेहरान ने इसे अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय अधिकारों के खिलाफ बताते हुए अस्वीकार कर दिया।
कूटनीतिक स्तर पर जारी इस टकराव के समानांतर सैन्य मोर्चे पर भी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आसपास के क्षेत्रों में अमेरिका और ईरान के बीच सीधी टकराव जैसी स्थिति बनती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने गुरुवार को तीन अमेरिकी नौसैनिक डिस्ट्रॉयर जहाजों पर हमला किया। ईरान का आरोप था कि ये जहाज उन समुद्री क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे थे,जिन्हें तेहरान अपना नियंत्रण क्षेत्र मानता है।
ईरान ने दावा किया कि उसने बैलिस्टिक मिसाइलों,क्रूज मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल करते हुए अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाया और इस हमले में गंभीर नुकसान हुआ। हालाँकि,अमेरिका ने इन दावों को खारिज कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि उनके युद्धपोत सुरक्षित हैं और उन्हें किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचा।
इस घटना से पहले अमेरिका ने दो ईरानी झंडे वाले तेल टैंकरों पर कार्रवाई की थी। अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि ये जहाज ओमान की खाड़ी के पास लागू नौसैनिक नाकाबंदी को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। इसके जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित केशम द्वीप और बंदर अब्बास के पास कुछ ठिकानों पर हमले किए।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ता तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन सकता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है और दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहाँ संघर्ष और बढ़ता है,तो अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार,वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
क्षेत्रीय तनाव अब ईरान के समुद्री इलाकों से आगे बढ़कर खाड़ी देशों तक फैलने लगा है। कतर के रक्षा मंत्रालय ने रविवार को जानकारी दी कि अबू धाबी से आ रहे एक व्यावसायिक मालवाहक जहाज को दोहा के तट के पास एक ड्रोन ने निशाना बनाया। हमले में जहाज में मामूली आग लग गई,हालाँकि किसी बड़े नुकसान की खबर नहीं है। इस घटना ने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएँ पैदा कर दी हैं।
इस बीच अमेरिका और कतर के बीच भी कूटनीतिक बातचीत तेज हो गई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और व्हाइट हाउस के पश्चिम एशिया दूत स्टीव विटकॉफ ने शनिवार को कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी के साथ बातचीत की। इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी लड़ाई को रोकने के प्रयासों को आगे बढ़ाना था।
कतर की ओर से जारी बयान में कहा गया कि बातचीत के दौरान पाकिस्तान की मध्यस्थता कोशिशों पर भी चर्चा हुई। कतर का कहना है कि क्षेत्र में तनाव कम करना और सुरक्षा व स्थिरता बहाल करना सभी पक्षों की प्राथमिकता होनी चाहिए। बाद में अमेरिकी विदेश विभाग ने भी बयान जारी कर कहा कि अमेरिका और कतर दोनों पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए करीबी तालमेल बनाए हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वाल्ट्ज ने भी ईरान की स्थिति पर टिप्पणी की। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि बातचीत लंबी और जटिल होती जा रही है क्योंकि ईरान की नेतृत्व व्यवस्था कमजोर और बिखरी हुई नजर आ रही है। वाल्ट्ज ने होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की गतिविधियों की आलोचना करते हुए कहा कि कोई भी देश अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों में इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकता।
उन्होंने बताया कि अमेरिका अब संयुक्त राष्ट्र में एक नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है,जिसमें कहा जाएगा कि ईरान को अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियां बंद करनी होंगी। अमेरिका का आरोप है कि ईरान समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसमें समुद्री सुरक्षा,क्षेत्रीय प्रभाव,आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य शक्ति प्रदर्शन जैसे कई मुद्दे जुड़ चुके हैं। दोनों देशों के बीच बढ़ती बयानबाजी और सैन्य गतिविधियाँ इस बात का संकेत दे रही हैं कि पश्चिम एशिया एक बड़े संकट की ओर बढ़ सकता है।
फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों से संयम बरतने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने की अपील कर रहा है। हालाँकि,जिस तरह से दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं,उससे निकट भविष्य में किसी बड़े समझौते की संभावना कमजोर दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान,कतर और अन्य मध्यस्थ देशों की कोशिशें इस तनाव को कम कर पाती हैं या नहीं।
