ईरान के पहले उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरेफ (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा,तेहरान ने ट्रंप के प्रस्ताव को ठुकराया,नए ड्राफ्ट पर भी नहीं बनी सहमति,ईरान ने ट्रंप के पूरे कार्यकाल को थेरेपी सेशन बताया

तेहरान,11 मई (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक बार फिर तल्खी बढ़ती दिखाई दे रही है। ईरान ने अमेरिका की ओर से भेजे गए 14 बिंदुओं वाले प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और इसके जवाब में अपना नया ड्राफ्ट प्रस्ताव वाशिंगटन को भेजा है। हालाँकि,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के इस नए प्रस्ताव को भी पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है। दोनों देशों के बीच बढ़ते विवाद ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।

भारत में स्थित ईरानी दूतावास ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी बयान में दूतावास ने कहा कि ईरान का जवाब देश के मूल अधिकारों और संप्रभुता पर आधारित है। दूतावास ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की ओर से पेश किया गया प्रस्ताव ईरान के लिए स्वीकार करना संभव नहीं था,क्योंकि ऐसा करने का मतलब तेहरान का अमेरिकी दबाव और अत्यधिक माँगों के सामने झुकना होता।

ईरानी दूतावास ने अपने बयान में कहा कि ईरान का नया प्रस्ताव कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर आधारित है। इसमें अमेरिका से युद्ध के हर्जाने की माँग,होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता की मान्यता,आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने और ईरानी संपत्तियों व जब्त किए गए धन को वापस करने की माँग शामिल है। दूतावास ने कहा कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा।

इस बीच घाना में स्थित ईरानी दूतावास ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान पर कटाक्ष किया। दूतावास ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ईरान का प्रस्ताव पढ़ा है,लेकिन वास्तव में वह उसके मूल भाव को समझने में असफल रहे हैं। बयान में यह भी कहा गया कि ट्रंप वैश्विक स्तर पर सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश कर रहे हैं और उनका पूरा राजनीतिक कार्यकाल केवल ध्यान आकर्षित करने का माध्यम बन गया है।

ईरानी दूतावास ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि व्हाइट हाउस के आंतरिक सूत्रों के अनुसार ट्रंप का कार्यकाल एक “मल्टी-बिलियन डॉलर थेरेपी सेशन” की तरह बन गया है। बयान में दावा किया गया कि यह उस मानसिक संतुष्टि की तलाश है,जो उन्हें अपने शुरुआती जीवन में नहीं मिल सकी। ईरान की ओर से की गई इस तीखी टिप्पणी ने दोनों देशों के बीच जुबानी जंग को और तेज कर दिया है।

दरअसल पूरा विवाद उस समय और बढ़ गया,जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर ईरान के प्रस्ताव को लेकर टिप्पणी की। ट्रंप ने लिखा कि उन्होंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है और उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव पूरी तरह अस्वीकार्य है। ट्रंप के इस बयान के बाद ईरान की ओर से लगातार प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगीं।

ईरान के सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने भी अमेरिका के प्रस्ताव की आलोचना की। अपने टेलीग्राम चैनल पर जारी संदेश में आईआरआईबी ने कहा कि अमेरिकी प्रस्ताव का वास्तविक अर्थ ईरान को ट्रंप की “लालची माँगों” के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना था। चैनल ने कहा कि ईरान का जवाब देश के बुनियादी अधिकारों,स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा पर आधारित है।

विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के नए प्रस्ताव में जिन मुद्दों को प्रमुखता दी गई है,वे लंबे समय से तेहरान की रणनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा रहे हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का मुद्दा ईरान के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है और दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में ईरान लगातार इस क्षेत्र में अपनी संप्रभुता और प्रभाव बनाए रखने पर जोर देता रहा है।

इसके अलावा आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की माँग भी ईरान की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। तेल निर्यात,बैंकिंग व्यवस्था और विदेशी निवेश पर लगे प्रतिबंधों ने ईरान को आर्थिक रूप से काफी प्रभावित किया है। यही कारण है कि तेहरान किसी भी समझौते में प्रतिबंध हटाने और जब्त की गई संपत्तियों की वापसी को अनिवार्य शर्त मान रहा है।

दूसरी ओर अमेरिका का रुख अब भी कठोर दिखाई दे रहा है। ट्रंप प्रशासन लगातार ईरान पर दबाव बनाए रखने की नीति अपनाता रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान को अपने क्षेत्रीय प्रभाव,परमाणु गतिविधियों और सैन्य नीतियों में बदलाव करना होगा। हालाँकि,ईरान बार-बार यह कहता रहा है कि वह किसी भी प्रकार के दबाव में आने वाला नहीं है।

अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन सकता है। पहले से ही क्षेत्र में कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है और अमेरिका-ईरान टकराव से स्थिति और जटिल हो सकती है। खासकर तेल बाजार और वैश्विक व्यापार मार्गों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

फिलहाल दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति बनती नजर नहीं आ रही है। अमेरिका ने ईरान के नए प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है,जबकि ईरान अपने रुख पर कायम है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत आगे बढ़ती है या यह विवाद और अधिक गहराता है। फिलहाल पश्चिम एशिया की राजनीति में यह टकराव एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है।