सुप्रीम कोर्ट

डॉग बाइट मामलों पर सख्त सुप्रीम कोर्ट,सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश बरकरार

नई दिल्ली,19 मई (युआईटीवी)- देशभर में बढ़ती डॉग बाइट यानी कुत्तों के काटने की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने के अपने फैसले को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया,जिसमें डॉग लवर्स और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से स्कूल,कॉलेज, अस्पताल,रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसी सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने के आदेश में बदलाव की माँग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है और आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या अब सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम यानी एबीसी योजना को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए जाने के कारण यह समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। अदालत ने कहा कि देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं और सबसे ज्यादा खतरा छोटे बच्चों और बुजुर्गों को हो रहा है। कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन ठोस कार्रवाई करने में विफल रहे हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कई राज्यों के उदाहरण देते हुए स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान के श्रीगंगानगर शहर में मात्र एक महीने के भीतर कुत्तों के काटने के 1,084 मामले सामने आए। इनमें कई छोटे बच्चों के चेहरे और शरीर पर गंभीर चोटें आईं। अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाएँ केवल आँकड़े नहीं हैं,बल्कि यह समाज में बढ़ते भय और प्रशासनिक विफलता की तस्वीर पेश करती हैं।

कोर्ट ने तमिलनाडु का भी उल्लेख किया,जहाँ इस वर्ष के पहले चार महीनों में करीब दो लाख डॉग बाइट के मामले दर्ज किए गए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह संख्या बेहद चिंताजनक है और इससे स्पष्ट होता है कि आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। अदालत ने कहा कि यह केवल किसी एक राज्य की समस्या नहीं है,बल्कि पूरे देश में तेजी से उभरती चुनौती बन चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट का भी जिक्र किया,जहाँ आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएँ सामने आई हैं। अदालत ने कहा कि देश के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट्स में से एक पर इस तरह की घटनाएँ होना सुरक्षा और शहरी प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने सूरत की घटना का भी उल्लेख किया,जहाँ एक जर्मन यात्री को आवारा कुत्ते ने काट लिया था। अदालत ने कहा कि इस तरह की घटनाएँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को प्रभावित करती हैं और शहरी प्रशासन के प्रति लोगों के भरोसे को कमजोर करती हैं।

शीर्ष अदालत ने अपने 22 अगस्त और 7 नवंबर 2025 के आदेशों को याद दिलाते हुए कहा कि पहले भी राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे एबीसी कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से लागू करें और आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करें। हालाँकि,अदालत ने पाया कि जमीनी स्तर पर इन निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकारें और संबंधित अधिकारी अदालत के निर्देशों का पालन नहीं करते हैं,तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी और अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है।

डॉग लवर्स और पशु अधिकार संगठनों की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश बहुत कठोर है और इससे पशुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कुत्तों को हटाने के बजाय एबीसी कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए,ताकि मानवीय तरीके से उनकी आबादी नियंत्रित की जा सके।

हालाँकि,सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पशु अधिकार महत्वपूर्ण हैं,लेकिन जब लोगों की जान और सुरक्षा का सवाल हो,तब जनहित को प्राथमिकता देना आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को भयमुक्त वातावरण मिलना चाहिए और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

देशभर में पिछले कुछ वर्षों में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएँ लगातार बढ़ी हैं। कई राज्यों में छोटे बच्चों पर हमले के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रही हैं,जिससे लोगों में डर और गुस्सा बढ़ा है। कई मामलों में बच्चों की मौत तक हो चुकी है,जबकि बड़ी संख्या में लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। अस्पतालों में रेबीज के इंजेक्शन की माँग भी लगातार बढ़ती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण,कचरा प्रबंधन की खराब स्थिति और एबीसी कार्यक्रम के कमजोर क्रियान्वयन की वजह से आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई नगर निगमों के पास पर्याप्त संसाधन और व्यवस्थाएँ नहीं हैं,जिसके कारण नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम सही तरीके से नहीं चल पा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को आम लोगों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि राज्य सरकारों को अब केवल कागजी योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए,बल्कि जमीन पर प्रभावी कदम उठाने होंगे। साथ ही कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि लापरवाही जारी रही,तो संबंधित अधिकारियों को सीधे जवाबदेह ठहराया जाएगा।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकारों और नगर निकायों पर दबाव बढ़ गया है कि वे आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए तत्काल और ठोस कार्रवाई करें। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन अदालत के निर्देशों को कितनी गंभीरता से लागू करता है और क्या इससे डॉग बाइट की बढ़ती घटनाओं पर प्रभावी रोक लग पाती है।