नई दिल्ली,19 मई (युआईटीवी)- भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई को सूचना का अधिकार कानून के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ नहीं माना जा सकता। केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने हालिया फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि बीसीसीआई पर आरटीआई एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। आयोग ने कहा कि बीसीसीआई न तो किसी कानून के तहत स्थापित संस्था है और न ही इसे सरकार से ऐसी वित्तीय सहायता मिलती है,जिसके आधार पर इसे सार्वजनिक प्राधिकरण माना जा सके। इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चल रही उस बहस को एक नया मोड़ मिल गया है,जिसमें यह सवाल उठता रहा है कि देश में क्रिकेट का संचालन करने वाली सबसे प्रभावशाली संस्था आखिरकार जनता के प्रति कितनी जवाबदेह है।
यह फैसला सूचना आयुक्त पीआर रमेश ने एक अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। यह अपील गीता रानी नाम की आवेदक द्वारा दायर की गई थी। अपील में बीसीसीआई की कानूनी स्थिति और उसके अधिकारों से जुड़ी जानकारी माँगी गई थी। आवेदक ने यह जानना चाहा था कि आखिर किस प्रावधान के तहत बीसीसीआई अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करता है और राष्ट्रीय टीम के लिए खिलाड़ियों का चयन करता है। साथ ही यह भी पूछा गया था कि सरकार बीसीसीआई को कौन-कौन से लाभ उपलब्ध कराती है और इस संस्था पर सरकार का कितना नियंत्रण है।
यह मामला वर्ष 2017 में दायर एक आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ था। यह आवेदन केंद्रीय युवा मामले और खेल मंत्रालय के पास दायर किया गया था। आवेदन में बीसीसीआई से जुड़ी विभिन्न जानकारियाँ माँगी गई थीं। हालाँकि,केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि माँगी गई जानकारी उसके पास उपलब्ध नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि आरटीआई आवेदन को बीसीसीआई के पास ट्रांसफर नहीं किया जा सकता,क्योंकि बीसीसीआई को सूचना का अधिकार कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित नहीं किया गया है।
इसके बाद मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुँचा। सुनवाई के दौरान बीसीसीआई ने अपनी ओर से दलील देते हुए कहा कि वह तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण कानून के तहत पंजीकृत एक निजी और स्वायत्त संस्था है। बोर्ड ने कहा कि वह आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) में निर्धारित किसी भी शर्त को पूरा नहीं करता। बीसीसीआई के अनुसार न तो उस पर सरकार का स्वामित्व है,न ही सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण है और न ही उसे सरकार से पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है।
आयोग ने अपने फैसले में आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) का विस्तार से उल्लेख किया। इस धारा के तहत किसी संस्था को सार्वजनिक प्राधिकरण तभी माना जाता है,जब उसका गठन संविधान,संसद,राज्य विधानमंडल या सरकारी अधिसूचना के जरिए हुआ हो अथवा वह सरकार के स्वामित्व,नियंत्रण या पर्याप्त वित्तीय सहायता के अंतर्गत आती हो। आयोग ने कहा कि बीसीसीआई इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं आता।
अपने आदेश में आयोग ने साफ कहा कि बीसीसीआई का गठन किसी संवैधानिक या वैधानिक प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ है। यह केवल एक पंजीकृत सोसायटी है। आयोग ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी संस्था का पंजीकरण होना मात्र उसे सरकारी संस्था नहीं बना देता। पंजीकरण सिर्फ कानूनी पहचान प्रदान करने की एक प्रक्रिया है,ताकि निजी व्यक्तियों द्वारा बनाई गई संस्था विधिक रूप से कार्य कर सके। इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि संस्था का निर्माण किसी कानून द्वारा किया गया है।
आयोग ने अपने आदेश में यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है,जिससे यह साबित हो कि बीसीसीआई को सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलती है। आयोग ने माना कि बीसीसीआई पूरी तरह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर संस्था है। उसका राजस्व मीडिया अधिकारों,प्रायोजन समझौतों,प्रसारण अनुबंधों और टिकट बिक्री जैसे स्रोतों से आता है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि संस्था सरकारी धन पर निर्भर है।
फैसले में यह भी कहा गया कि बीसीसीआई अपने संसाधनों से काम करता है और उसकी आय पूरी तरह उसकी व्यावसायिक गतिविधियों पर आधारित है। आयोग के अनुसार,सरकारी फंडिंग की अनुपस्थिति इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य है। इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि बीसीसीआई को सार्वजनिक प्राधिकरण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया,जो बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार मामले में आया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करते हुए बीसीसीआई में कई प्रशासनिक सुधारों का रास्ता साफ किया था। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने माना था कि बीसीसीआई ऐसे कार्य करता है,जिनका प्रभाव व्यापक जनहित से जुड़ा है। क्योंकि भारत में क्रिकेट केवल खेल नहीं बल्कि एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र बन चुका है।
हालाँकि,आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के कार्यों को सार्वजनिक महत्व का जरूर माना था,लेकिन अदालत ने उसे आरटीआई एक्ट के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित नहीं किया था। इसलिए केवल सार्वजनिक कार्य करने के आधार पर किसी संस्था को आरटीआई कानून के दायरे में नहीं लाया जा सकता। आयोग के अनुसार,इसके लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
इस फैसले के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो सकती है कि क्या बीसीसीआई जैसी प्रभावशाली संस्था को पारदर्शिता के दायरे में लाया जाना चाहिए। बीसीसीआई दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड माना जाता है और भारतीय क्रिकेट पर उसका लगभग पूर्ण नियंत्रण है। राष्ट्रीय टीम के चयन से लेकर घरेलू क्रिकेट के संचालन और अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंटों के आयोजन तक,क्रिकेट से जुड़ा हर बड़ा फैसला बीसीसीआई ही करता है। ऐसे में लंबे समय से यह माँग उठती रही है कि बोर्ड को आरटीआई के दायरे में लाकर उसकी कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए।
कई पूर्व खिलाड़ियों,खेल विशेषज्ञों और पारदर्शिता से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना रहा है कि बीसीसीआई जनता के हित से जुड़े कार्य करता है और इसलिए उसे जवाबदेह होना चाहिए। उनका तर्क है कि जब कोई संस्था देश का प्रतिनिधित्व करती है और राष्ट्रीय टीम का चयन करती है,तब उसकी निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। दूसरी ओर,बीसीसीआई लगातार यह कहता रहा है कि वह एक निजी संस्था है और उसकी स्वायत्तता बनाए रखना जरूरी है।
बीते वर्षों में बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने को लेकर कई कानूनी और प्रशासनिक चर्चाएँ हो चुकी हैं। लोढ़ा समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर दिया था। हालाँकि,अब केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा कानूनी स्थिति में बीसीसीआई को सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता।
यह फैसला केवल बीसीसीआई तक सीमित नहीं माना जा रहा,बल्कि इससे उन अन्य खेल संगठनों पर भी असर पड़ सकता है,जो स्वयं को निजी और स्वायत्त संस्था बताते हैं। आने वाले समय में संभव है कि खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस और तेज हो। फिलहाल केंद्रीय सूचना आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान कानून के तहत बीसीसीआई सूचना का अधिकार कानून के दायरे में नहीं आता और इसलिए इस मामले में दायर अपील खारिज की जाती है।
