भोपाल,20 मई (युआईटीवी)- ट्विशा शर्मा की कथित आत्महत्या के मामले में अब नया मोड़ आ गया है। बुधवार को ट्विशा शर्मा के परिवार ने एक विस्तृत बयान जारी करते हुए मामले की जाँच में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की माँग की। परिवार ने अदालत में अर्जी दाखिल कर किसी प्रमुख राष्ट्रीय संस्थान से स्वतंत्र चिकित्सा राय लेने तथा अहम फोरेंसिक और डिजिटल साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित रखने की माँग की है। इस मामले की सुनवाई आज मजिस्ट्रेट अनुदिता गुप्ता के समक्ष होने की संभावना है।
परिवार का कहना है कि 12 मई को भोपाल स्थित ससुराल में हुई ट्विशा शर्मा की मौत को लेकर अब भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। उनका मानना है कि एक स्वतंत्र मेडिकल राय से जाँच प्रक्रिया में जनता का भरोसा बहाल होगा और मौत के कारणों को लेकर किसी भी तरह की आशंका को दूर करने में मदद मिलेगी। परिवार के अनुसार यह कदम केवल न्याय सुनिश्चित करने और तथ्यों को स्पष्ट करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
ट्विशा शर्मा का शव पिछले आठ दिनों से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भोपाल में रखा हुआ है। परिवार ने चिंता जताई है कि यदि प्रक्रिया में और देरी होती है,तो महत्वपूर्ण फोरेंसिक निष्कर्ष प्रभावित हो सकते हैं। ट्विशा के पिता नव निधि शर्मा ने कहा कि परिवार की एकमात्र कोशिश यह सुनिश्चित करना है कि मौत के वास्तविक कारणों और उससे जुड़ी परिस्थितियों पर कोई संदेह न रह जाए। उन्होंने कहा कि सभी वैज्ञानिक और कानूनी प्रक्रियाएँ पूरी होने के बाद ही उनकी बेटी का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और शांति के साथ किया जाएगा।
परिवार द्वारा दायर याचिका में मामले से जुड़े 40 से अधिक मोबाइल नंबरों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड,टावर लोकेशन डेटा,इंटरनेट उपयोग रिकॉर्ड,व्हाट्सएप चैट और अन्य डिजिटल मेटाडेटा को सुरक्षित रखने की माँग की गई है। परिवार का कहना है कि आधुनिक जाँच में डिजिटल साक्ष्य बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और यदि इन्हें समय रहते सुरक्षित नहीं किया गया,तो कई अहम तथ्य हमेशा के लिए खो सकते हैं।
परिवार ने अपनी अर्जी में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और डिजिटल रिकॉर्ड के फोरेंसिक विश्लेषण की भी माँग की है। उनका कहना है कि इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि ट्विशा की मौत से पहले किन परिस्थितियों में घटनाएँ हुईं और क्या किसी तरह का मानसिक दबाव या अन्य कारण मौजूद थे। परिवार का मानना है कि डिजिटल डेटा इस मामले की सच्चाई सामने लाने में निर्णायक साबित हो सकता है।
मामले में सह-आरोपी मानी जा रही गिरिबाला सिंह को अंतरिम जमानत मिलने के बाद भी विवाद बढ़ गया है। परिवार ने आरोप लगाया कि एक प्रेस नोट में गिरिबाला सिंह को ‘गिरी हुई बाला’ कहकर संबोधित किया गया,जिससे मामले का माहौल और अधिक संवेदनशील हो गया। परिवार का कहना है कि यदि गिरिबाला सिंह स्वयं को निर्दोष मानती हैं,तो उन्हें दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में दोबारा पोस्टमॉर्टम कराने की माँग का समर्थन करना चाहिए।
परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि मामले से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोग जाँच को प्रभावित करने या देरी कराने की कोशिश कर सकते हैं। उनका कहना है कि यदि शव लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा गया या जाँच प्रक्रिया धीमी रही,तो सबूत खराब हो सकते हैं और इससे न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होगी। ट्विशा के पिता ने कहा कि उन्हें डर है कि अनावश्यक देरी के कारण ऐसे फोरेंसिक निष्कर्ष प्रभावित हो सकते हैं,जिन्हें बाद में ठीक नहीं किया जा सकेगा।
परिवार के बयान में उन खबरों पर भी आपत्ति जताई गई है,जिनमें दावा किया गया कि जमानत पर बाहर मौजूद एक व्यक्ति ने न्यायिक परिसर का इस्तेमाल मीडिया से बातचीत करने और मृतक के खिलाफ बयान देने के लिए किया। परिवार का कहना है कि ट्विशा अब इस दुनिया में नहीं हैं और वह सार्वजनिक रूप से लगाए जा रहे आरोपों का जवाब देने या अपना पक्ष रखने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में मृतक के खिलाफ माहौल बनाना नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से गलत है।
परिवार ने यह सवाल भी उठाया कि क्या आम नागरिकों को कानून के तहत समान सुरक्षा मिलती है,खासकर तब जब किसी मामले में प्रभावशाली लोग शामिल हों। उनका कहना है कि सार्वजनिक संस्थानों का इस्तेमाल किसी मृतक पीड़िता के खिलाफ कथित माहौल बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। परिवार ने न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने की अपील की है।
इस मामले ने सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच भी व्यापक चर्चा पैदा कर दी है। कई लोग परिवार की मांगों का समर्थन कर रहे हैं और निष्पक्ष जाँच की माँग उठा रहे हैं। वहीं कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परिवार को फोरेंसिक प्रक्रिया और मेडिकल रिपोर्ट को लेकर संदेह है,तो स्वतंत्र मेडिकल राय लेना जाँच प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब सभी की नजर अदालत की सुनवाई पर टिकी हुई है। यह देखा जाना बाकी है कि अदालत परिवार की मांगों पर क्या फैसला सुनाती है और क्या स्वतंत्र मेडिकल जाँच तथा डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण को लेकर नए निर्देश जारी किए जाते हैं। फिलहाल ट्विशा शर्मा की मौत का मामला केवल एक आपराधिक जाँच तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह न्यायिक पारदर्शिता,फोरेंसिक प्रक्रिया और पीड़ित परिवार के अधिकारों से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
परिवार लगातार यही कह रहा है कि उनका उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं,बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जाँच पूरी निष्पक्षता और वैज्ञानिक आधार पर हो। उनका मानना है कि यदि सभी तथ्य पारदर्शी तरीके से सामने आएँगे,तभी ट्विशा शर्मा को न्याय मिल सकेगा और समाज का भरोसा जाँच एजेंसियों और न्याय व्यवस्था पर कायम रहेगा।
