भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा

एफसीआरए संशोधन विधेयक को लेकर सरकार की सफाई,क्वात्रा बोले- विदेशी फंडिंग पर निगरानी मजबूत होगी,कानून मानने वाले संगठनों का काम नहीं रुकेगा

वॉशिंगटन/ नई दिल्ली,10 अगस्त (युआईटीवी)- प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल 2026 को लेकर उठ रही विभिन्न आशंकाओं और चर्चाओं के बीच भारत सरकार की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण सामने आया है। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने रविवार को कहा कि प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य कानून का पालन करने वाले नागरिक संगठनों,गैर सरकारी संगठनों या धर्मार्थ संस्थाओं को विदेशी सहायता से वंचित करना नहीं है। उन्होंने कहा कि विधेयक का मूल उद्देश्य विदेशी धन के प्रवाह में पारदर्शिता बढ़ाना,निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट बनाना है।

विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए कहा कि मीडिया और नागरिक समाज के बीच एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कई तरह की गलतफहमियाँ बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून को लेकर ऐसी धारणा बनाई जा रही है कि भारत नागरिक संगठनों को मिलने वाली विदेशी सहायता रोकने के लिए नया कानून ला रहा है,जबकि वास्तविकता इससे अलग है। उनके अनुसार, विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना और उससे जुड़े नियम तय करना प्रत्येक संप्रभु देश का अधिकार है। राष्ट्रीय सुरक्षा,वित्तीय पारदर्शिता और सार्वजनिक हित से जुड़े कारणों को ध्यान में रखते हुए दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में विदेशी फंडिंग को विनियमित किया जाता है।

राजदूत ने कहा कि एफसीआरए भारतीय नागरिकों को विदेशी दान स्वीकार करने से नहीं रोकता और न ही कानून का पालन करने वाले नागरिक संगठनों को बंद करने का प्रावधान करता है। उन्होंने बताया कि देश में हजारों संगठन एफसीआरए के तहत पंजीकृत हैं और वे स्वास्थ्य,शिक्षा,आपदा राहत,अनुसंधान, मानवीय सहायता तथा सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में विदेशी योगदान प्राप्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि विदेशी सहायता प्राप्त करने की व्यवस्था बनी हुई है,लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

क्वात्रा ने एफसीआरए के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में विदेशी योगदान को नियंत्रित करने के लिए पहला एफसीआरए कानून वर्ष 1976 में लागू किया गया था। इसके बाद बदलती परिस्थितियों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप वर्ष 2010 में कानून को अधिक आधुनिक स्वरूप दिया गया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में भी इसमें कई बदलाव किए गए। उनके अनुसार,2026 का प्रस्तावित विधेयक इसी क्रम में अगला कदम है,जिसका उद्देश्य विदेशी योगदान से संबंधित व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना,बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करना और नियमों को अधिक स्पष्ट बनाना है।

उन्होंने कहा कि एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों को विदेशी फंडिंग पर पूरी तरह रोक के रूप में देखना सही नहीं होगा। उनका कहना है कि भारत में विदेशी योगदान लेने की अनुमति पहले की तरह बनी रहेगी,लेकिन इस प्रक्रिया के लिए निर्धारित कानूनी नियमों का पालन करना आवश्यक होगा। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग की जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध होने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि धन का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए किया जाए,जिसके लिए उसे प्राप्त किया गया है।

राजदूत ने उन आरोपों को भी खारिज किया कि एफसीआरए के कारण गैर सरकारी संगठनों और धर्मार्थ संस्थाओं को व्यापक नुकसान हुआ है या प्रस्तावित संशोधन उनके कामकाज पर अनावश्यक रूप से नए प्रतिबंध लगाने वाला है। उन्होंने विदेशी योगदान के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि एफसीआरए के तहत पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी योगदान वर्ष 2010-11 में लगभग 1.2 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया। उनके मुताबिक,इन आँकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि एफसीआरए व्यवस्था के बावजूद विदेशी योगदान प्राप्त करने की गतिविधियाँ जारी हैं और उनमें वृद्धि भी हुई है।

उन्होंने भारत में गैर सरकारी संगठनों की संख्या और एफसीआरए पंजीकरण के बीच अंतर को भी रेखांकित किया। क्वात्रा ने कहा कि देश में 30 लाख से अधिक गैर सरकारी संगठन हैं,जबकि इनमें से केवल 14,450 संगठनों के पास एफसीआरए पंजीकरण है। इसका अर्थ यह है कि देश में मौजूद अधिकांश नागरिक संगठन एफसीआरए के दायरे में ही नहीं आते। उन्होंने कहा कि विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए एफसीआरए के तहत निर्धारित नियमों का पालन करना जरूरी है,जबकि सामान्य तौर पर काम कर रहे नागरिक संगठनों पर इस कानून का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता।

क्वात्रा ने एफसीआरए व्यवस्था को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि कानून किसी संगठन को विदेशी दान,शोध अनुदान या मानवीय सहायता प्राप्त करने से नहीं रोकता। उनके अनुसार,मुख्य रूप से संगठन को पंजीकरण कराना होता है,निर्धारित प्रक्रिया के तहत विदेशी धन प्राप्त करना होता है और यह बताना होता है कि प्राप्त धन का इस्तेमाल किस तरह किया गया। सरकार का कहना है कि इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य संगठनों के कामकाज को रोकना नहीं,बल्कि विदेशी योगदान के इस्तेमाल में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

प्रस्तावित संशोधन को लेकर सबसे अधिक चिंता विदेशी चंदे से खरीदी या बनाई गई संपत्तियों को लेकर सामने आई है। कुछ वर्गों की ओर से यह आशंका जताई गई थी कि यदि किसी गैर सरकारी संगठन,धार्मिक संस्था,पूजा स्थल,अस्पताल,स्कूल या अन्य संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द होता है तो उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है। क्वात्रा ने इन चिंताओं का जवाब देते हुए कहा कि विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियों और बची हुई राशि को लेकर मौजूदा व्यवस्था पहले से लागू है।

उन्होंने बताया कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है या संस्था स्वयं अपना पंजीकरण छोड़ देती है तो विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियाँ और बची हुई राशि पहले से ही राज्य सरकार की ओर से नामित प्राधिकरण के पास चली जाती हैं। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था वर्ष 2010 से लागू है और इसे प्रस्तावित विधेयक के कारण पहली बार लागू नहीं किया जा रहा है।

क्वात्रा के मुताबिक,2026 का प्रस्तावित विधेयक इस व्यवस्था में एक नया तत्व जोड़ता है। इसके तहत ऐसी संपत्तियों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए एक निर्धारित प्राधिकरण होगा। साथ ही संबंधित संगठन के लिए अपनी स्थिति बहाल करने का रास्ता भी खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई संगठन दोबारा अपना एफसीआरए पंजीकरण बहाल कराने में सफल होता है,तो उसकी सभी संपत्तियाँ और बची हुई राशि पूरी तरह उसे वापस कर दी जाएँगी।

धार्मिक संस्थाओं और पूजा स्थलों से जुड़ी संपत्तियों को लेकर भी राजदूत ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था में पूजा स्थलों को विशेष सुरक्षा देने का प्रावधान है। यदि किसी ऐसे संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, जिसने किसी पूजा स्थल से संबंधित संपत्ति विदेशी योगदान के माध्यम से बनाई है,तो उस संपत्ति को उसी धर्म से जुड़े किसी अन्य एफसीआरए-पंजीकृत संगठन को हस्तांतरित किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धार्मिक गतिविधियाँ बाधित न हों और संबंधित पूजा स्थल की व्यवस्था जारी रहे।

उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य किसी धार्मिक संस्था की गतिविधियों को रोकना नहीं है। सभी धर्मों से जुड़े संगठन यदि कानून की निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं,तो विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पहले की तरह पात्र रहेंगे। धार्मिक शिक्षा,पूजा स्थलों का रखरखाव,सामाजिक सेवा,चैरिटी और अन्य कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशी सहायता प्राप्त करने की व्यवस्था जारी रहेगी।

एफसीआरए संशोधन को किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ बताया जा रहा है,इस आरोप को भी क्वात्रा ने पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि प्रस्तावित कानून किसी खास धर्म,समुदाय या विचारधारा को निशाना बनाता है। उनके अनुसार,एफसीआरए की व्यवस्था धर्म,समुदाय और विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं करती। विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले सभी संगठनों के लिए समान कानूनी नियम लागू होते हैं।

क्वात्रा ने जोर देकर कहा कि यदि कोई संगठन निर्धारित नियमों का पालन करता है,तो उसे विदेशी योगदान प्राप्त करने और अपने सामाजिक या धार्मिक कार्य जारी रखने में कोई बाधा नहीं होगी। उनका कहना है कि कानून का मुख्य आधार संगठन की गतिविधि या उसकी धार्मिक पहचान नहीं,बल्कि विदेशी धन के स्रोत,उसके उपयोग और उससे संबंधित जवाबदेही है।

प्रस्तावित संशोधन को लेकर सरकार की ओर से दिया गया यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है,जब संसद में एफसीआरए विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्षी दलों ने प्रस्तावित बदलावों पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि इससे गैर सरकारी संगठनों और नागरिक समाज की स्वतंत्र गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। कुछ विपक्षी नेताओं ने प्रशासनिक खर्च की सीमा और संगठनों के अधिकारों से जुड़े प्रावधानों पर भी चिंता व्यक्त की है। वहीं सरकार का कहना है कि विदेशी योगदान के नियमन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग की निगरानी दुनिया भर में अपनाई जाने वाली सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। किसी भी देश के लिए यह जानना जरूरी है कि उसके यहाँ आने वाला विदेशी धन कहाँ से आ रहा है,किस संगठन को मिल रहा है और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। सरकार के अनुसार,पारदर्शिता और जवाबदेही से संबंधित प्रावधानों को मजबूत करना नागरिक संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं,बल्कि वित्तीय व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास है।

क्वात्रा के स्पष्टीकरण में विदेशी योगदान के बढ़ते आँकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। वर्ष 2010-11 में एफसीआरए-पंजीकृत संगठनों को करीब 1.2 अरब डॉलर का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ था,जबकि 2024-25 में यह राशि बढ़कर 2.67 अरब डॉलर हो गई। सरकार इस वृद्धि को इस बात के प्रमाण के तौर पर देख रही है कि एफसीआरए व्यवस्था विदेशी सहायता को पूरी तरह रोकने वाली व्यवस्था नहीं है। हालाँकि,विदेशी योगदान की मात्रा बढ़ने के साथ उसकी निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता भी बढ़ती है।

प्रस्तावित विधेयक में संपत्तियों की सुरक्षा और पंजीकरण बहाली से जुड़े प्रावधानों को भी सरकार एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में पेश कर रही है। इसके मुताबिक,किसी संगठन का पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियों की सुरक्षा के लिए निर्धारित प्राधिकरण जिम्मेदार होगा। यदि बाद में संगठन अपना पंजीकरण बहाल कराने में सफल होता है,तो संपत्तियाँ और बची हुई राशि वापस करने की व्यवस्था होगी। धार्मिक स्थलों से संबंधित संपत्तियों के मामले में समान धार्मिक समुदाय के किसी अन्य एफसीआरए-पंजीकृत संगठन को जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव है।

इस पूरी बहस में सबसे महत्वपूर्ण सवाल विदेशी फंडिंग और नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का है। सरकार जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा,पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही को प्राथमिकता दे रही है,वहीं नागरिक समाज से जुड़े कुछ वर्ग यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि विदेशी योगदान को नियंत्रित करने के नाम पर वैध सामाजिक गतिविधियों पर अनावश्यक प्रतिबंध न लगें। प्रस्तावित विधेयक पर संसद में चर्चा के दौरान इन दोनों पहलुओं पर व्यापक बहस होने की संभावना है।

फिलहाल भारत सरकार की ओर से विनय मोहन क्वात्रा के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की गई है कि एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को विदेशी फंडिंग बंद करने वाले कानून के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार के अनुसार,इसका उद्देश्य विदेशी धन के प्रवाह को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। कानून का पालन करने वाले गैर सरकारी संगठनों,नागरिक संगठनों,धार्मिक संस्थाओं,अस्पतालों,स्कूलों और चैरिटेबल संगठनों के लिए विदेशी सहायता प्राप्त करने का रास्ता खुला रहेगा। अब इस प्रस्तावित कानून पर संसद में होने वाली चर्चा यह तय करेगी कि सरकार की इन दलीलों और विपक्ष की आशंकाओं के बीच किस तरह का संतुलन सामने आता है।