वॉशिंगटन,12 अगस्त (युआईटीवी)- भारत और अमेरिका के बीच रूसी तेल की खरीद तथा प्रस्तावित ऊँचे अमेरिकी टैरिफ को लेकर जारी चर्चा के बीच व्हाइट हाउस ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने मंगलवार को बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच इस मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाने की क्षमता है। नवारो ने दोनों नेताओं के बीच अच्छे कार्य संबंधों का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में उनके बीच आकर टिप्पणी करना उनका काम नहीं है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है,जब भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के साथ-साथ रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर भी वॉशिंगटन की चिंताएँ सामने आती रही हैं।
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान नवारो से भारत पर प्रस्तावित संभावित टैरिफ और दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता के संबंध में सवाल पूछा गया। सवाल में दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम से जुड़े उस विधेयक का भी उल्लेख किया गया,जिसके तहत रूस की ऊर्जा खरीद करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। पत्रकार ने जानना चाहा कि यदि इस तरह के ऊँचे टैरिफ लागू होते हैं,तो क्या भारत-अमेरिका संबंधों और दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
इसके जवाब में नवारो ने संभावित टैरिफ की स्थिति पर सीधे कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बहुत अच्छे कार्य संबंध हैं और दोनों नेता इस मुद्दे का समाधान आपस में निकाल लेंगे। नवारो ने यह भी कहा कि इस मामले में दोनों नेताओं के बीच आकर टिप्पणी करना उनकी भूमिका नहीं है। उनके इस बयान को भारत और अमेरिका के बीच बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की संभावना के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
नवारो ने बातचीत के दौरान भारत और रूस के बीच ऊर्जा व्यापार का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कुछ महीने पहले फाइनेंशियल टाइम्स में लिखे अपने एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद में काफी बढ़ोतरी हुई। उन्होंने दावा किया कि युद्ध से पहले भारत रूस के तेल व्यापार में अपेक्षाकृत कम शामिल था,लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
नवारो ने भारत पर रूसी तेल से जुड़े उत्पादों की बिक्री करने का आरोप भी लगाया। उनका दावा था कि इस तरह के व्यापार से रूस को युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिली। हालाँकि,बातचीत के दौरान उन्होंने इस आरोप के समर्थन में कोई आंकड़ा या विस्तृत प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। भारत पहले भी अपनी ऊर्जा खरीद को लेकर स्पष्ट कर चुका है कि देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
नवारो ने कहा कि रूसी तेल से जुड़ा मुद्दा अब सुलझ चुका है। हालाँकि,उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि किस कार्रवाई या समझौते के बाद यह समस्या समाप्त हुई। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि उनका संकेत भारत की रूसी तेल खरीद,पेट्रोलियम उत्पादों के व्यापार या दोनों देशों के बीच ऊर्जा से जुड़े किसी अन्य पहलू की ओर था। नवारो ने कहा कि संभव है कि उनके पहले लिखे गए लेख की भी इस मामले में कुछ भूमिका रही हो।
उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधी बातचीत महत्वपूर्ण दौर में है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से बाजार पहुँच,शुल्क,व्यापार असंतुलन और अन्य आर्थिक मुद्दों पर चर्चा होती रही है। अमेरिकी प्रशासन की व्यापक टैरिफ नीति के कारण भारत समेत कई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों में नए समीकरण बन रहे हैं। ऐसे में रूसी ऊर्जा खरीद का मुद्दा व्यापार वार्ता को और जटिल बनाने की क्षमता रखता है।
अमेरिकी प्रशासन रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए उन देशों को भी निशाने पर लेने की नीति पर जोर देता रहा है,जो रूसी ऊर्जा की खरीद जारी रखते हैं। इसी संदर्भ में अमेरिकी सीनेट में पारित एक विधेयक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले सप्ताह अमेरिकी सीनेट ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ को 86 के मुकाबले 11 मतों से पारित किया था। इस विधेयक में रूसी तेल और गैस के बड़े खरीदार देशों तथा प्रतिबंधों से बचने में कथित रूप से शामिल प्रमुख देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है।
हालाँकि,उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस विधेयक में भारत का नाम ऐसे देश के रूप में स्वतः शामिल नहीं किया गया है,जिस पर अनिवार्य रूप से यह टैरिफ लगाया जाएगा। इसलिए भारत पर इस प्रावधान के तहत सीधे कोई शुल्क लागू होने की स्थिति अभी निश्चित नहीं है। इसके बावजूद,विधेयक और अमेरिकी प्रशासन की रूस से जुड़ी व्यापार नीति ने नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच बातचीत में इस मुद्दे का महत्व बढ़ा दिया है।
भारत के लिए रूसी तेल का मुद्दा केवल विदेश नीति से जुड़ा विषय नहीं है,बल्कि इसका सीधा संबंध देश की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से भी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव आए और भारत ने विभिन्न स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद जारी रखते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की। रूसी तेल की खरीद में वृद्धि ने भारतीय रिफाइनिंग क्षेत्र को भी प्रभावित किया और देश की ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में रूस की भूमिका बढ़ी।
दूसरी ओर,अमेरिका का तर्क है कि रूस की ऊर्जा आय पर दबाव डालना उसके सैन्य अभियान को सीमित करने के प्रयासों का हिस्सा है। वॉशिंगटन चाहता है कि रूस से होने वाले ऊर्जा व्यापार के माध्यम से उसे मिलने वाले राजस्व को कम किया जाए। इसी कारण अमेरिकी प्रशासन रूसी ऊर्जा खरीद करने वाले देशों पर संभावित अतिरिक्त आर्थिक दबाव की बात करता रहा है।
नवारो ने बातचीत के दौरान अमेरिकी प्रशासन की व्यापक टैरिफ नीति का बचाव भी किया। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी टैरिफ के कारण विदेशी कंपनियाँ शुल्क से बचने के लिए अमेरिका में निवेश करने और उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करने को प्रोत्साहित हो रही हैं। उनके अनुसार,इससे अमेरिका में विदेशी निवेश बढ़ने के साथ-साथ घरेलू निवेश को भी बढ़ावा मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि टैरिफ के कारण विदेशी निवेशक अमेरिका में कारखाने स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। नवारो का तर्क है कि यदि विदेशी कंपनियाँ अमेरिकी बाजार में अपने उत्पाद बेचना चाहती हैं,तो अमेरिका में उत्पादन करने से उन्हें टैरिफ से बचने का लाभ मिल सकता है। अमेरिकी प्रशासन अपनी आर्थिक नीति के समर्थन में इस निवेश को महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहा है।
हालाँकि,नवारो ने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिकी नागरिक अभी भी महँगाई और अन्य आर्थिक समस्याओं के कारण कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने माना कि आम लोगों पर आर्थिक दबाव मौजूद है,लेकिन उनका कहना था कि ट्रंप प्रशासन की नीतियों से सकारात्मक परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि टैरिफ नीति से लंबे समय में घरेलू उद्योग और रोजगार को मजबूती मिलेगी।
भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा स्थिति में नवारो का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने सीधे टकराव की भाषा के बजाय दोनों शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत और आपसी समाधान की संभावना पर जोर दिया है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि ट्रंप और मोदी के बीच व्यक्तिगत और कार्य संबंधों को इस तरह के जटिल मुद्दों से निपटने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालाँकि,रूसी तेल की खरीद,प्रस्तावित टैरिफ और व्यापक व्यापार वार्ता से जुड़े कई सवाल अभी खुले हुए हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका भारत से रूसी तेल की खरीद में किस स्तर के बदलाव की अपेक्षा कर रहा है और इसके बदले भारत को व्यापार वार्ता में क्या राहत मिल सकती है। इसी तरह,प्रस्तावित 100 प्रतिशत तक टैरिफ का वास्तविक दायरा और भारत पर उसका संभावित प्रभाव भी आगे की अमेरिकी नीति पर निर्भर करेगा।
फिलहाल नवारो के बयान से इतना जरूर संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली इस मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाने का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को भी मजबूत रखे। वहीं अमेरिका के सामने भारत जैसे बड़े रणनीतिक साझेदार पर दबाव और द्विपक्षीय संबंधों के व्यापक हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
ऐसे में आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली बातचीत तथा भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर विशेष नजर रहेगी। रूसी तेल,टैरिफ और व्यापार से जुड़े फैसले न केवल दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि बदलती वैश्विक भू-राजनीति में भारत-अमेरिका साझेदारी की दिशा पर भी असर डाल सकते हैं।
