सुप्रीम कोर्ट

पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त,कहा- व्यावसायिक हितों से ऊपर है नागरिकों का स्वास्थ्य

नई दिल्ली,14 अगस्त (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट और प्रमुख चेतावनी लेबल लगाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख को लेकर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि उपभोक्ताओं को सामान्य तौर पर यह जानकारी होती है कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में चीनी,वसा और कार्बोहाइड्रेट मौजूद हो सकते हैं, लेकिन पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी होने से उन्हें किसी उत्पाद को खरीदने से पहले अधिक बेहतर और सूचित निर्णय लेने में मदद मिलेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी उत्पाद को खरीदना है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय उपभोक्ता का होता है और निर्माताओं के व्यावसायिक हितों को नागरिकों के स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यह मुद्दा सीधे तौर पर नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे मामलों में निर्माता यह तय नहीं कर सकते कि उपभोक्ताओं को उत्पाद के बारे में किस तरह की जानकारी दी जाए। अदालत का जोर इस बात पर था कि उपभोक्ताओं को किसी खाद्य उत्पाद की प्रकृति और उसमें मौजूद प्रमुख पोषक तत्वों के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे अपनी जरूरत और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले सकें।

अदालत ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के निर्माताओं की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें चेतावनी लेबल से उनके कारोबार पर संभावित असर पड़ने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी उत्पाद को खरीदने या न खरीदने का अंतिम अधिकार उपभोक्ता के पास है। यदि किसी पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी दी जाती है,तो इससे उपभोक्ता को यह समझने में सहायता मिलेगी कि वह जिस खाद्य पदार्थ को खरीदने जा रहा है,उसमें चीनी,वसा या कार्बोहाइड्रेट की मात्रा जैसी महत्वपूर्ण जानकारी क्या है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी विशेष खाद्य उत्पाद या किसी विशेष निर्माता को निशाना बनाना नहीं है। उसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि लोगों को यह जानकारी उपलब्ध हो कि वे क्या खा रहे हैं। अदालत के अनुसार,खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग पर ऐसी जानकारी उपभोक्ता के अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों से जुड़ी हुई है। खासतौर पर ऐसे समय में जब पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की खपत तेजी से बढ़ रही है,उपभोक्ताओं के लिए स्पष्ट और आसानी से समझ में आने वाली जानकारी उपलब्ध होना महत्वपूर्ण हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर भी विशेष चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि भारत को अपने नागरिकों,विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में नियामकीय व्यवस्था को कमजोर नहीं रहने दिया जा सकता। उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पादों के बारे में सही जानकारी उपलब्ध कराना स्वास्थ्य सुरक्षा के व्यापक उद्देश्य का हिस्सा है।

पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पैकेजिंग और पोषण संबंधी चेतावनियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी हवाला दिया गया था। केंद्र ने अदालत को बताया था कि पैकेजिंग और पोषण संबंधी चेतावनियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था तैयार करने में व्यावहारिक चुनौतियाँ मौजूद हैं। हालाँकि,सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भारत अपने नागरिकों के लिए मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय लागू करने में देरी को उचित ठहराने के लिए विदेशी मानकों का सहारा नहीं ले सकता।

अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट है कि वह खाद्य पदार्थों की लेबलिंग को केवल कारोबारी या नियामकीय विषय के रूप में नहीं देख रही है,बल्कि इसे नागरिकों के स्वास्थ्य और उनके सूचित निर्णय लेने के अधिकार से जोड़कर देख रही है। अदालत ने कहा कि भारत को अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए और कमजोर नियामकीय व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने सरकार के सामने यह विकल्प भी स्पष्ट कर दिया है कि वह प्रस्तावित लेबलिंग व्यवस्था को स्वेच्छा से लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए या फिर न्यायिक निर्देश का सामना करे। पीठ ने केंद्र को इसे अंतिम अवसर बताते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया,तो अदालत मामले में अपना फैसला सुना सकती है।

इस मामले में चेतावनी लेबल का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में मौजूद चीनी,वसा और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को लेकर उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ रही है। पैकेट के सामने प्रमुख रूप से दी गई चेतावनी उपभोक्ताओं को खरीदारी के समय तुरंत महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा सकती है। अदालत का मानना है कि ऐसी जानकारी उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बनाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के रुख से यह संकेत मिलता है कि खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामलों में सरकार तथा संबंधित नियामकीय संस्थाओं को उपभोक्ताओं के हित को प्राथमिकता देनी होगी। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी खाद्य उत्पाद के कारोबार पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव की तुलना नागरिकों के स्वास्थ्य से नहीं की जा सकती। उपभोक्ता को जानकारी उपलब्ध कराना उसकी पसंद और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को मजबूत करता है, न कि उसे किसी उत्पाद को खरीदने से रोकता है।

अब केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि प्रस्तावित चेतावनी लेबल व्यवस्था को लेकर आगे क्या कदम उठाया जाए। यदि सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं होती है,तो सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर से निर्देश जारी कर सकता है। इस पूरे मामले में अदालत का रुख यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर कारोबारी हितों की तुलना में नागरिकों के स्वास्थ्य और उपभोक्ताओं के सूचित निर्णय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।