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सात साल में वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की हिस्सेदारी पाँच गुना बढ़ने का अनुमान, अमेरिका ने 10 फीसदी तक पहुँचने की जताई उम्मीद

वॉशिंगटन,14 अगस्त (युआईटीवी)- भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को लेकर अमेरिका ने बड़ी संभावनाएँ जताई हैं। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अनुसार,अगले पाँच से सात वर्षों में वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की हिस्सेदारी पाँच गुना तक बढ़ सकती है। वर्तमान में वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है,लेकिन नीतिगत सुधारों,निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और अमेरिका के साथ मजबूत होते संबंधों के चलते इसके 10 प्रतिशत तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत के तेजी से विकसित हो रहे निजी अंतरिक्ष उद्योग को निवेश और कारोबार के लिए महत्वपूर्ण अवसर वाला क्षेत्र बताया है।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रशासन ने अगस्त में जारी अपने ‘एयरोस्पेस एंड डिफेंस एक्सपोर्टर अलर्ट’ में भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को ‘मार्केट ऑफ द मंथ’ के रूप में पेश किया है। विभाग ने कहा कि भारत का निजी क्षेत्र आधारित अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से विकसित हो रहा है और सरकार की ओर से निजीकरण तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों की दिशा में उठाए गए कदम अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं।

अमेरिकी विभाग के अनुमान के मुताबिक,अगले पाँच से सात वर्षों में भारत वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी हिस्सेदारी मौजूदा दो प्रतिशत से कम स्तर से बढ़ाकर करीब 10 प्रतिशत तक ले जा सकता है। यदि यह अनुमान साकार होता है,तो भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर सकता है। इसके पीछे निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका,अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश के लिए बेहतर माहौल और विदेशी कंपनियों के साथ सहयोग को महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने अपने अलर्ट में अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में मौजूद संभावनाओं को भी रेखांकित किया है। विभाग ने सैटेलाइट सिस्टम, उन्नत अंतरिक्ष उड़ान,कनेक्टिविटी,विनिर्माण और इससे जुड़ी तकनीकों में निवेश के अवसरों का उल्लेख किया है। अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत को एक ऐसे बाजार के रूप में देखा जा रहा है,जहाँ तेजी से बढ़ती तकनीकी क्षमता और अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी आने वाले वर्षों में नए कारोबारी अवसर पैदा कर सकती है।

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग कोई नया नहीं है। दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष सहयोग की शुरुआत भारत के पहले रॉकेट प्रक्षेपण के समय से मानी जाती है। वर्ष 1963 में भारत ने अपना पहला रॉकेट प्रक्षेपित किया था,जिसका नाम ‘नाइक-अपाचे’ था और इसे अमेरिका में बनाया गया था। उस शुरुआती सहयोग से लेकर अब तक दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में वैज्ञानिक आदान-प्रदान,संयुक्त कार्य समूह और विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से साझेदारी लगातार आगे बढ़ी है।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अनुसार,नासा और अमेरिकी निजी कंपनियों ने समय-समय पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन को तकनीक और विभिन्न उपकरणों की आपूर्ति भी की है। इससे दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में तकनीकी सहयोग की नींव मजबूत हुई। अब यह सहयोग केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है,बल्कि दोनों देशों की निजी कंपनियाँ भी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक-दूसरे के साथ साझेदारी और निवेश के अवसर तलाश रही हैं।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों और स्टार्टअप की संख्या तेजी से बढ़ी है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने कहा कि भारत के नए अंतरिक्ष स्टार्टअप अमेरिका में अपने परिचालन और विनिर्माण की मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे दोनों देशों के निजी अंतरिक्ष उद्योगों के बीच कारोबारी संबंधों के विस्तार की संभावनाएँ बढ़ी हैं। भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका बड़ा बाजार और तकनीकी साझेदार बन सकता है, जबकि अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत एक तेजी से उभरता हुआ अंतरिक्ष बाजार उपलब्ध कराता है।

फरवरी 2026 में अंतर्राष्ट्रीय समझ के लिए व्यापार परिषद ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रशासन से प्रमाणित अमेरिकी वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशन की बेंगलुरु यात्रा का नेतृत्व किया था। अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने इस यात्रा को सफल बताया है। विभाग के अनुसार,इस तरह की यात्राएं दोनों देशों की कंपनियों को एक-दूसरे के बाजार,तकनीकी क्षमता और निवेश के अवसरों को समझने में मदद करती हैं।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने कहा कि अंतरिक्ष अमेरिका और भारत के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इससे व्यापार,तकनीक और संयुक्त नीतिगत प्रयासों के माध्यम से दोनों देशों को लाभ मिल रहा है। विभाग के अनुसार,आने वाले समय में अंतरिक्ष क्षेत्र दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक और आर्थिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

दोनों देशों के बीच व्यावसायिक अंतरिक्ष संबंधों को ‘अमेरिका-भारत नागरिक अंतरिक्ष संयुक्त कार्य समूह’ के माध्यम से भी आगे बढ़ाया जा रहा है। वर्ष 2025 में शुरू की गई ‘ट्रस्ट’ पहल से भी अंतरिक्ष सहयोग को मजबूत करने की दिशा में प्रयास किए गए हैं। इसके अलावा वाणिज्यिक अंतरिक्ष उप-कार्य समूह का नेतृत्व अमेरिकी वाणिज्य विभाग और भारत के अंतरिक्ष विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।

इस उप-कार्य समूह का प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों की अंतरिक्ष कंपनियों के सामने आने वाली कारोबारी और नियामकीय बाधाओं को दूर करना है। इसके तहत बाजार तक पहुँच, सरकारी खरीद,विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और निर्यात नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाती है। इन क्षेत्रों में बेहतर समन्वय से दोनों देशों की कंपनियों के लिए एक-दूसरे के बाजार में प्रवेश करना आसान हो सकता है।

फरवरी 2025 में भारत और अमेरिका के नेताओं की ओर से जारी संयुक्त बयान में भी अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। इसमें अंतरिक्ष अन्वेषण, अंतरिक्ष सुरक्षा और पेशेवर आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने की बात कही गई थी। इससे यह संकेत मिलता है कि अंतरिक्ष अब दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक संबंधों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

भारत के लिए इस अनुमान का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश और निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कई नीतिगत बदलाव किए हैं। पहले अंतरिक्ष गतिविधियों में सरकारी संस्थानों की भूमिका प्रमुख थी, लेकिन अब निजी क्षेत्र को प्रक्षेपण सेवाओं,उपग्रह निर्माण,अंतरिक्ष आधारित संचार, डेटा सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में अवसर मिल रहे हैं। इससे भारत में एक व्यापक निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होने की उम्मीद है।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने अमेरिकी कंपनियों को भारत के अंतरिक्ष बाजार में उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने के लिए आगामी बेंगलुरु अंतरिक्ष एक्सपो में शामिल होने का भी आग्रह किया है। यह आयोजन 7 से 9 सितंबर तक होने वाला है। इसमें अंतरिक्ष उद्योग से जुड़े प्रमुख कारोबारी,विशेषज्ञ और नीति-निर्माता हिस्सा लेंगे। इस दौरान भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को अपनी तकनीकी क्षमताएं और उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा।

बेंगलुरु अंतरिक्ष एक्सपो को भारत और वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के बीच संपर्क बढ़ाने के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी कंपनियों की भागीदारी से दोनों देशों के बीच संभावित निवेश,तकनीकी साझेदारी और संयुक्त परियोजनाओं को बढ़ावा मिल सकता है। भारतीय कंपनियों के लिए भी यह वैश्विक बाजार तक पहुँच बनाने और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों के साथ सहयोग विकसित करने का अवसर होगा।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग का 10 प्रतिशत हिस्सेदारी का अनुमान भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य को दर्शाता है। इसे हासिल करने के लिए भारत को निजी निवेश,अनुसंधान एवं विकास,विनिर्माण क्षमता और वैश्विक साझेदारी को लगातार मजबूत करना होगा। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल को और सुगम बनाना भी महत्वपूर्ण होगा।

कुल मिलाकर,अमेरिका के इस अनुमान से भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की बढ़ती संभावनाओं को लेकर वैश्विक स्तर पर भरोसा दिखाई देता है। नीतिगत सुधारों,निजी कंपनियों के विस्तार और अमेरिका के साथ बढ़ते तकनीकी एवं कारोबारी सहयोग के कारण भारत अगले कुछ वर्षों में वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी स्थिति तेजी से मजबूत कर सकता है। यदि भारत की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से कम से बढ़कर 10 प्रतिशत तक पहुँचती है,तो यह न केवल अंतरिक्ष क्षेत्र में देश की आर्थिक क्षमता को बढ़ाएगा,बल्कि भारत को वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के प्रमुख केंद्रों में शामिल करने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित होगा।