मुंबई,17 अगस्त (युआईटीवी)- मेगास्टार अमिताभ बच्चन ने अपने चर्चित सरनेम ‘बच्चन’ के पीछे की एक दिलचस्प और भावनात्मक कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि उनके पिता और प्रसिद्ध हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन बचपन से ही जातिवाद के विरोधी थे और उन्होंने परिवार की जातिगत पहचान के बजाय ‘बच्चन’ को सरनेम के रूप में अपनाया। यह किस्सा उस समय सामने आया,जब लोकप्रिय क्विज शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के 18वें सीजन के एक एपिसोड में अमिताभ बच्चन ने अपनी शुरुआती जिंदगी और स्कूल के दिनों से जुड़ी यादें साझा कीं।
कार्यक्रम के दौरान अमिताभ बच्चन को पता चला कि प्रतियोगी डॉ. जागृति की जड़ें प्रयागराज से जुड़ी हैं और उन्होंने उसी सेंट मैरी कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई की है,जहाँ अमिताभ बच्चन भी छात्र रह चुके हैं। स्कूल का नाम सुनते ही अमिताभ बच्चन पुरानी यादों में चले गए। उन्होंने प्रतियोगी से कहा कि यह उनका भी पहला स्कूल था। इसी बातचीत के दौरान उन्होंने अपने सरनेम से जुड़ा वह प्रसंग बताया,जिसने उनके परिवार की सोच और उनके पिता के सामाजिक दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण झलक सामने रखी।
अमिताभ बच्चन ने स्कूल में दाखिले की प्रक्रिया को याद करते हुए बताया कि जब उनके माता-पिता उन्हें सेंट मैरी कॉन्वेंट लेकर गए थे,तब दाखिले के फॉर्म में कई जानकारियाँ भरनी होती थीं। उसी फॉर्म में एक कॉलम जाति का भी था। अमिताभ ने बताया कि उनके पिता हरिवंश राय बच्चन बचपन से ही जातिवाद के खिलाफ थे और उन्हें जाति आधारित पहचान बिल्कुल पसंद नहीं थी। ऐसे में जब फॉर्म में जाति लिखने की बारी आई,तो उन्होंने एक अलग फैसला लिया।
अमिताभ के मुताबिक,उनके पिता ने जाति के कॉलम में ‘बच्चन’ लिखने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि हरिवंश राय बच्चन ने कहा था कि उनकी जाति ‘बच्चन’ है और इसी नाम से फॉर्म भरा गया। इस तरह अमिताभ बच्चन की सार्वजनिक पहचान में ‘बच्चन’ नाम आगे आया। अमिताभ ने इस घटना को याद करते हुए बताया कि उनके पिता ने जातिगत पहचान को स्वीकार करने के बजाय अपने साहित्यिक नाम को ही परिवार की पहचान के तौर पर स्थापित किया।
अमिताभ बच्चन के जन्म के समय उनका नाम अमिताभ श्रीवास्तव था। उनका जन्म 11 अक्टूबर 1942 को तत्कालीन इलाहाबाद,वर्तमान प्रयागराज में हुआ था। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन श्रीवास्तव परिवार से ताल्लुक रखते थे,लेकिन साहित्य की दुनिया में वह ‘बच्चन’ नाम से प्रसिद्ध हुए। आगे चलकर यही नाम उनके परिवार की पहचान का हिस्सा बन गया और अमिताभ बच्चन ने इसी नाम से भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।
हरिवंश राय बच्चन आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में ‘मधुशाला’ का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उनकी रचनाओं ने हिंदी कविता को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। ‘मधुकलश’, ‘निशा निमंत्रण’, ‘सतरंगिनी’ जैसी रचनाएँ भी उनके साहित्यिक योगदान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनकी कई कविताएँ आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। ‘अग्निपथ’ और ‘जो बीत गई सो बात गई’ जैसी रचनाओं ने उन्हें आम पाठकों तक पहुँचाया।
हरिवंश राय बच्चन के साहित्य में केवल व्यक्तिगत भावनाएँ और दार्शनिक विचार ही नहीं, बल्कि देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना की झलक भी दिखाई देती थी। देश के सामाजिक और राजनीतिक दौर का प्रभाव उनकी रचनाओं में देखने को मिलता था। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी उन्होंने देश के सैनिकों के साहस और संघर्ष को लेकर प्रभावशाली पंक्तियाँ लिखीं। हिंदी साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1976 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था।
अमिताभ बच्चन की माँ तेजी बच्चन भी एक प्रभावशाली और शिक्षित महिला थीं। उनका जन्म तेजी सूरी के रूप में लायलपुर में हुआ था,जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। उनका संबंध पंजाबी सिख परिवार से था। उन्होंने लाहौर में शिक्षा हासिल की और मनोविज्ञान का अध्ययन भी किया। कला और रंगमंच में उनकी गहरी रुचि थी। इसी रुचि के कारण उन्होंने हरिवंश राय बच्चन की साहित्यिक और रंगमंचीय गतिविधियों में भी साथ दिया।
हरिवंश राय बच्चन और तेजी की मुलाकात लाहौर में एक कॉलेज कार्यक्रम के दौरान हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच संबंध मजबूत हुए और वर्ष 1941 में इलाहाबाद में दोनों ने विवाह किया। तेजी बच्चन ने रंगमंच में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने हरिवंश राय बच्चन द्वारा किए गए शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘मैकबेथ’ के हिंदी रूपांतरण में लेडी मैकबेथ की भूमिका निभाई थी। इस दंपति के दो बेटे हुए,अमिताभ और उनके छोटे भाई अजिताभ बच्चन।
अमिताभ बच्चन ने अपने करियर की शुरुआत हिंदी सिनेमा में की,लेकिन शुरुआती दौर उनके लिए आसान नहीं रहा। लंबे कद और भारी आवाज के बावजूद उन्हें फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। उनके करियर के शुरुआती वर्षों में कई फिल्में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकीं। हालाँकि,उन्होंने लगातार काम किया और अपनी अभिनय क्षमता को साबित करने का प्रयास जारी रखा।
उनके करियर का बड़ा मोड़ ‘जंजीर’ से आया। इस फिल्म में उनके व्यक्तित्व और अभिनय ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’, ‘काला पत्थर’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक ऐसे अभिनेता के रूप में स्थापित किया,जिसकी स्क्रीन मौजूदगी अलग थी। उनके अभिनय में गंभीरता,संवाद अदायगी और किरदारों की आक्रामकता ने उन्हें दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया।
सत्तर के दशक के उत्तरार्ध और अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों में अमिताभ बच्चन का स्टारडम लगातार मजबूत होता गया। वह धीरे-धीरे भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो गए। उनके किरदारों और फिल्मों ने उस दौर के युवा दर्शकों के बीच खास प्रभाव छोड़ा। इसी दौर में उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में भी पहचान मिली। संघर्ष, व्यवस्था से टकराव और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले उनके किरदारों ने उन्हें आम दर्शकों से जोड़ दिया।
अमिताभ बच्चन का फिल्मी सफर कई दशकों में फैला है। उन्होंने अलग-अलग दौर में विभिन्न तरह के किरदार निभाए और समय के साथ खुद को बदला। अभिनय के साथ-साथ उन्होंने टेलीविजन पर भी अपनी मजबूत पहचान बनाई। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने उनके व्यक्तित्व के एक अलग पहलू को दर्शकों के सामने रखा। शो में प्रतियोगियों से उनकी बातचीत,व्यक्तिगत किस्से और जीवन से जुड़ी यादें अक्सर दर्शकों का ध्यान खींचती हैं।
इसी शो के 18वें सीजन में सामने आई ‘बच्चन’ सरनेम की कहानी भी उनके निजी जीवन और पारिवारिक विचारधारा की झलक देती है। इस प्रसंग से यह भी पता चलता है कि उनके पिता हरिवंश राय बच्चन के लिए जातिगत पहचान से अधिक मानवीय और व्यक्तिगत पहचान महत्वपूर्ण थी। एक स्कूल फॉर्म के छोटे से कॉलम में लिया गया वह फैसला आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक की पहचान बन गया।
अमिताभ बच्चन के निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने अभिनेत्री जया भादुड़ी से विवाह किया,जो बाद में जया बच्चन के नाम से जानी गईं। दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया और भारतीय सिनेमा की चर्चित जोड़ियों में शामिल रहे। उनके परिवार की अगली पीढ़ी ने भी फिल्म और सार्वजनिक जीवन में अपनी पहचान बनाई है।
आज ‘बच्चन’ नाम भारतीय सिनेमा की दुनिया में एक बेहद प्रतिष्ठित पहचान है,लेकिन इसके पीछे की कहानी केवल एक अभिनेता के सरनेम से जुड़ी नहीं है। यह उनके पिता हरिवंश राय बच्चन की उस सोच से भी जुड़ी है,जिसमें जातिगत पहचान के बजाय अपनी बनाई हुई पहचान को महत्व दिया गया। अमिताभ बच्चन द्वारा साझा किया गया यह पुराना किस्सा बताता है कि परिवार के नाम का यह हिस्सा किस तरह एक विचार से शुरू होकर आगे चलकर भारतीय मनोरंजन जगत की सबसे पहचानी जाने वाली पहचान बन गया।
