वाशिंगटन,18 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिका में 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की चुनावी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल तेज हो गए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के 19 सांसदों के एक समूह ने मेटा की चुनावी सुरक्षा तैयारियों को अपर्याप्त बताया है। सांसदों का आरोप है कि कंपनी की ओर से फैक्ट-चेकिंग व्यवस्था में कटौती,सुरक्षा से जुड़े जोखिमों की समीक्षा में ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बढ़ती निर्भरता अमेरिकी मतदाताओं के सामने डीपफेक और राजनीतिक गलत सूचना का खतरा बढ़ा सकती है।
सांसदों के समूह का नेतृत्व डेमोक्रेटिक सीनेटर केविन मुलिन ने किया है। उन्होंने मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग को पत्र लिखकर कंपनी की चुनावी सुरक्षा रणनीति पर विस्तृत जानकारी माँगी है। सांसदों ने विशेष रूप से फेसबुक,इंस्टाग्राम,थ्रेड्स और व्हाट्सऐप जैसे मेटा के प्रमुख प्लेटफॉर्म पर तेजी से बदलते ऑनलाइन खतरों से निपटने की कंपनी की तैयारी पर सवाल उठाए हैं।
केविन मुलिन ने कहा कि जेनरेटिव एआई ने विश्वसनीय दिखने वाले डीपफेक और दूसरे भ्रामक कंटेंट तैयार करना पहले की तुलना में काफी आसान बना दिया है। उनके मुताबिक,इन तकनीकों का इस्तेमाल पहले से ही अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने के प्रयासों में किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मेटा का मुख्यालय उनके जिले में है और पिछले कुछ वर्षों में कंपनी ने गलत सूचना को रोकने के लिए बनाए गए कई महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को वापस लिया है। ऐसे में यह गंभीर सवाल उठता है कि क्या कंपनी मौजूदा और तेजी से बदलते खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है।
सांसदों ने अपने पत्र में मेटा के अमेरिका में थर्ड पार्टी फैक्ट-चेकिंग कार्यक्रम बंद करने के फैसले को भी प्रमुखता से उठाया है। इस कार्यक्रम के तहत 90 से अधिक स्वतंत्र संगठन संभावित रूप से संदिग्ध और गलत जानकारी वाले कंटेंट की समीक्षा करते थे। मेटा ने इस व्यवस्था की जगह कम्युनिटी नोट्स मॉडल लागू किया है,जिसमें यूजर्स किसी पोस्ट में अतिरिक्त संदर्भ या जानकारी जोड़ सकते हैं।
सांसदों का कहना है कि इस बदलाव से गलत जानकारी की पहचान और उसे संदर्भित करने की जिम्मेदारी आम यूजर्स पर अधिक डाल दी गई है। उनका तर्क है कि हर यूजर के पास किसी जटिल राजनीतिक दावे की जाँच करने के लिए आवश्यक समय,संसाधन या विशेषज्ञता नहीं होती। ऐसे में केवल समुदाय आधारित व्यवस्था चुनावी अवधि में तेजी से फैलने वाली गलत जानकारी को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
सांसदों ने पत्र में कहा कि 2026 के चुनाव चक्र के लिए मेटा की मौजूदा रणनीति उन्हें अपर्याप्त लगती है। खासकर फैक्ट-चेकिंग में कटौती,जोखिम की समीक्षा के लिए ऑटोमेशन और मेटा के प्लेटफॉर्म पर एआई से तैयार होने वाले कंटेंट में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए सांसदों ने कंपनी से उसकी सुरक्षा व्यवस्था के बारे में स्पष्ट जवाब माँगा है।
पत्र में सांसदों ने एआई से तैयार किए गए राजनीतिक प्रभाव वाले फर्जी प्रोफाइल का उदाहरण भी दिया है। उन्होंने ‘एमिली हार्ट’ नाम की एक फर्जी कंजर्वेटिव और एमएजीए समर्थक इन्फ्लुएंसर का उल्लेख किया। रिपोर्टों के अनुसार,यह सिंथेटिक प्रोफाइल भारत के 22 वर्षीय एक मेडिकल छात्र ने एआई उपकरणों की मदद से तैयार की थी। इस फर्जी प्रोफाइल के जरिए गर्भपात विरोधी और आप्रवासन विरोधी विचारों को बढ़ावा दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक,इंस्टाग्राम से हटाए जाने से पहले इस प्रोफाइल को लाखों व्यूज और हजारों सब्सक्राइबर मिल चुके थे।
सांसदों का कहना है कि इस तरह के मामले दिखाते हैं कि एआई आधारित नकली पहचान कितनी तेजी से वास्तविक राजनीतिक प्रभाव पैदा कर सकती है। यदि किसी फर्जी प्रोफाइल को बड़ी संख्या में लोग वास्तविक व्यक्ति समझने लगें तो उसके जरिए राजनीतिक विचारों को प्रभावित करने,मतदाताओं को भ्रमित करने या किसी उम्मीदवार की छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की जा सकती है।
पत्र में टेक्सास और जॉर्जिया के सीनेट चुनावों से जुड़े कथित डीपफेक मामलों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें टेक्सास के सीनेट उम्मीदवार जेम्स तालारिको से जुड़ा एक ऐसा नकली वीडियो विज्ञापन शामिल है,जिसमें उन्हें कैमरे के सामने सीधे बात करते हुए दिखाया गया था। सांसदों ने ऐसे मामलों को इस बात का संकेत बताया कि एआई तकनीक के जरिए राजनीतिक उम्मीदवारों की आवाज और छवि की नकल करना अब पहले की तुलना में आसान हो गया है।
सांसदों ने मेटा से अमेरिकी चुनावों के दौरान अपने सुरक्षा संसाधनों को लेकर भी विस्तृत जानकारी मांगी है। उन्होंने कंपनी से 2020,2024 और 2026 के चुनावों की तुलना करते हुए यह बताने को कहा है कि चुनावी सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों की संख्या और इस काम के लिए निर्धारित बजट में कितना बदलाव हुआ है। इसके जरिए सांसद यह समझना चाहते हैं कि मेटा ने चुनावी सुरक्षा को लेकर अपनी प्राथमिकताओं और संसाधनों में किस तरह का बदलाव किया है।
इसके अलावा मेटा से डीपफेक वीडियो और सिंथेटिक ऑडियो से संबंधित उसकी मौजूदा नीतियों की जानकारी माँगी गई है। सांसदों ने यह भी पूछा है कि राजनीतिक हस्तियों की नकल करने वाले फर्जी अकाउंट्स की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए कंपनी के पास क्या व्यवस्था है। उनका कहना है कि केवल एआई से बने कंटेंट की पहचान करना पर्याप्त नहीं है,बल्कि ऐसे कंटेंट के राजनीतिक प्रभाव और उसके तेजी से प्रसार को रोकने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था जरूरी है।
सांसदों ने राजनीतिक इन्फ्लुएंसरों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि यदि किसी इन्फ्लुएंसर को राजनीतिक कंटेंट के लिए भुगतान किया जाता है,तो क्या उसे अपनी कमाई और फंडिंग के स्रोत का खुलासा करना पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि राजनीतिक विज्ञापनों में एआई से तैयार की गई भ्रामक तस्वीरों, वीडियो या ऑडियो की पहचान करना अनिवार्य है या नहीं।
चुनाव अधिकारियों की सुरक्षा और शिकायत व्यवस्था भी सांसदों की चिंताओं में शामिल है। पत्र में राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के लिए उपलब्ध शिकायत चैनल के बारे में जानकारी माँगी गई है। सांसद जानना चाहते हैं कि यदि किसी चुनाव अधिकारी को मेटा के प्लेटफॉर्म पर गलत या भ्रामक जानकारी मिलती है,तो वह कंपनी तक शिकायत कितनी आसानी से पहुँचा सकता है और उस शिकायत पर कितनी तेजी से कार्रवाई की जाती है।
इसके अलावा सांसदों ने मेटा से यह बताने को कहा है कि किसी भ्रामक कंटेंट की पहचान होने के बाद उसे हटाने या उस पर कार्रवाई करने में औसतन कितना समय लगता है। कम्युनिटी नोट्स व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर भी कंपनी से आँकड़े माँगे गए हैं। सांसदों का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कम्युनिटी नोट्स वास्तव में गलत जानकारी को रोकने में कितनी प्रभावी साबित हुई है और कितनी बार संदिग्ध राजनीतिक सामग्री पर सही संदर्भ उपलब्ध कराया गया है।
अमेरिकी राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। चुनावी अभियानों के दौरान उम्मीदवार और राजनीतिक संगठन मतदाताओं तक पहुँचने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में किसी उम्मीदवार की आवाज,चेहरे या बयान की एआई के जरिए नकल कर बनाई गई सामग्री कुछ ही समय में बड़ी संख्या में मतदाताओं तक पहुँच सकती है। यही वजह है कि 2026 के चुनाव से पहले डीपफेक और सिंथेटिक मीडिया को लेकर राजनीतिक और नियामकीय चिंताएँ बढ़ रही हैं।
सांसदों का कहना है कि गलत सूचना और डीपफेक का खतरा केवल किसी एक प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है। फेसबुक,इंस्टाग्राम और थ्रेड्स जैसे सार्वजनिक मंचों के साथ-साथ व्हाट्सऐप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर भी राजनीतिक सामग्री तेजी से साझा की जा सकती है। ऐसे में चुनावी सुरक्षा के लिए केवल कंटेंट हटाने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी,बल्कि फर्जी सामग्री की पहचान,उसके प्रसार पर निगरानी और चुनाव अधिकारियों के साथ त्वरित समन्वय भी जरूरी होगा।
मेटा को अब इन सवालों का जवाब देना होगा। सांसदों ने जुकरबर्ग से 18 सितंबर तक जवाब देने को कहा है। उनके सवालों का केंद्र यही है कि 2026 के चुनावों में कंपनी एआई आधारित गलत सूचना और डीपफेक के बढ़ते खतरे से किस तरह निपटेगी और क्या उसके पास पर्याप्त कर्मचारी,बजट,तकनीकी संसाधन और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था मौजूद है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है,जब अमेरिकी चुनावों में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है। एआई तकनीक के तेजी से विकास ने जहाँ राजनीतिक संचार के नए रास्ते खोले हैं,वहीं फर्जी और भ्रामक सामग्री तैयार करना भी आसान बना दिया है। ऐसे में मेटा की चुनावी सुरक्षा नीति पर उठे सवाल आने वाले अमेरिकी चुनावों में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और गलत सूचना से निपटने की रणनीति को लेकर व्यापक बहस को और तेज कर सकते हैं।
