मेटा (तस्वीर क्रेडिट@IndianInfoGuid)

मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री वाले विज्ञापनों का आरोप,अमेरिकी सीनेटर ने मार्क जुकरबर्ग से माँगा जवाब

वॉशिंगटन,20 अगस्त (युआईटीवी)- अमेरिकी सीनेटर मार्क वॉर्नर ने मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग से कंपनी के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कथित तौर पर बाल यौन शोषण सामग्री और बिना सहमति के बनाए गए अंतरंग चित्रों से जुड़े पेड विज्ञापनों को लेकर जवाब माँगा है। वॉर्नर ने इस मामले को बेहद गंभीर और अस्वीकार्य बताते हुए मेटा से यह स्पष्ट करने को कहा है कि इस तरह के विज्ञापन कंपनी की विज्ञापन समीक्षा प्रणाली से कैसे गुजर गए और क्या मेटा ने इन विज्ञापनों से आर्थिक लाभ भी कमाया। उन्होंने कंपनी से विज्ञापनों की पहचान,हटाने,रिपोर्टिंग और उनसे हुई कमाई से संबंधित विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है।

वर्जीनिया से डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर मार्क वॉर्नर ने 18 अगस्त को मार्क जुकरबर्ग को एक पत्र भेजा। इसमें उन्होंने मेटा की विज्ञापन प्रणाली और उसके सुरक्षा उपायों पर गंभीर सवाल उठाए। सीनेटर ने कहा कि मेटा ने अपनी विभिन्न सोशल मीडिया सेवाओं पर ऐसे पेड विज्ञापनों को चलने दिया,जिनमें कथित तौर पर बाल यौन शोषण सामग्री और गैर-सहमति वाले अंतरंग चित्र शामिल थे। उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री का किसी भी सोशल मीडिया मंच पर दिखाई देना ही गंभीर चिंता का विषय है,लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि कंपनी ने कथित तौर पर ऐसी सामग्री से राजस्व अर्जित किया।

वॉर्नर ने अपने पत्र में मेटा से पूछा कि ये विज्ञापन उसकी आंतरिक समीक्षा प्रणाली से कैसे गुजर गए। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि इन विज्ञापनों से कंपनी को कितनी आय हुई और इस प्रकार की आपत्तिजनक तथा संभावित रूप से अवैध सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के लिए मेटा ने क्या कदम उठाए। सीनेटर ने कंपनी को 26 अगस्त तक जवाब देने की समयसीमा दी है। उनके सवालों का दायरा केवल विज्ञापनों की मौजूदगी तक सीमित नहीं है,बल्कि इसमें मेटा की जिम्मेदारी, निगरानी व्यवस्था,विज्ञापन से होने वाली कमाई और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को रिपोर्टिंग की प्रक्रिया भी शामिल है।

सीनेटर ने अपने पत्र में टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट की एक शोध रिपोर्ट का हवाला दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक,मेटा ने करीब नौ महीने की अवधि में फेसबुक,इंस्टाग्राम,मैसेंजर और थ्रेड्स जैसे प्लेटफॉर्म पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार बाल यौन शोषण सामग्री वाले दर्जनों पेड विज्ञापन चलने दिए। शोधकर्ताओं के अनुसार,मेटा की सार्वजनिक विज्ञापन लाइब्रेरी में बच्चों के शोषण से संबंधित 50 से अधिक तस्वीरों और वीडियो वाले विज्ञापन पाए गए। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें से कुछ विज्ञापन नवंबर 2025 से अगस्त 2026 की शुरुआत तक प्रसारित होते रहे।

शोध रिपोर्ट के अनुसार, इन विज्ञापनों को केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रखा गया था। कथित तौर पर अमेरिका,ब्रिटेन और यूरोप के एक दर्जन से अधिक देशों में रहने वाले उपयोगकर्ताओं को ऐसे विज्ञापन दिखाए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कम से कम एक विज्ञापन यूरोप में 2,500 से अधिक सोशल मीडिया खातों तक पहुँचा। इस तरह के आँकड़ों ने मेटा की विज्ञापन निगरानी प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं।

रिपोर्ट में विज्ञापनों के स्वरूप को लेकर भी गंभीर दावे किए गए हैं। कुछ विज्ञापन ऐसे ऐप या वेबसाइटों की ओर उपयोगकर्ताओं को ले जाते थे,जो किसी व्यक्ति की तस्वीर को कृत्रिम रूप से नग्न दिखाने वाले चित्र तैयार करने का दावा करते थे। ऐसी सेवाओं को आम तौर पर ‘न्यूडिफाई’ तकनीक के रूप में जाना जाता है। इसमें किसी व्यक्ति की वास्तविक तस्वीर में कृत्रिम तरीके से बदलाव कर उसे नग्न या यौन स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि संबंधित व्यक्ति ने ऐसी तस्वीर बनाने या इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी होती।

कुछ अन्य विज्ञापनों में बच्चों की तस्वीरों का इस्तेमाल ऐसे थंबनेल के रूप में किया गया था,जो आगे चलकर वयस्कों के लिए आपत्तिजनक सामग्री की ओर ले जाते थे। कुछ मामलों में बच्चों के चेहरों को वयस्क शरीरों पर जोड़ने जैसी तकनीकों के इस्तेमाल का भी दावा किया गया। इस तरह की सामग्री को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल संपादन तकनीकों के माध्यम से वास्तविक लोगों,खासकर बच्चों और नाबालिगों,की तस्वीरों का दुरुपयोग बेहद आसान हो सकता है।

मार्क वॉर्नर ने मेटा की अपनी विज्ञापन नीति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कंपनी की नीतियां स्पष्ट रूप से विज्ञापनों में नग्नता,यौन गतिविधि या यौन संकेतात्मक मुद्राओं और गतिविधियों को प्रतिबंधित करती हैं। ऐसे में सीनेटर ने सवाल उठाया कि अगर कंपनी की अपनी नीतियाँ इस प्रकार की सामग्री को प्रतिबंधित करती हैं तो फिर इन विज्ञापनों को स्वीकृति कैसे मिली। उनके अनुसार,यह मामला केवल किसी तकनीकी चूक का नहीं,बल्कि मेटा की विज्ञापन समीक्षा और निगरानी प्रणाली की गंभीर कमियों का संकेत हो सकता है।

वॉर्नर ने यह भी सवाल उठाया कि क्या मेटा ने जानबूझकर या अनजाने में ऐसी सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह दी और क्या कंपनी ने इससे आर्थिक फायदा उठाया। उन्होंने मेटा से यह बताने को कहा है कि प्रत्येक विज्ञापन की पहचान कब हुई,उसे कब हटाया गया और उसकी सूचना गुमशुदा एवं शोषित बच्चों के लिए राष्ट्रीय केंद्र को कब दी गई। इसके साथ ही उन्होंने यह भी पूछा है कि यदि किसी विज्ञापन की पहचान होने और संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट किए जाने के बीच समय का अंतर था,तो उस देरी की वजह क्या थी।

सीनेटर के सवालों में यह भी शामिल है कि क्या मेटा ने किसी भी तरह की बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार,प्रचार या विज्ञापन किया। इसमें कंप्यूटर से तैयार की गई सामग्री भी शामिल है। यह सवाल ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो जाता है,जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए बेहद वास्तविक दिखाई देने वाली तस्वीरें और वीडियो बनाए जा सकते हैं। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों के ऑनलाइन शोषण और डिजिटल दुरुपयोग को रोकने के लिए मौजूदा कानूनों और सुरक्षा प्रणालियों की क्षमता को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

वॉर्नर ने 11 चीनी पुनर्विक्रेताओं से संबंधित विज्ञापनों के बारे में भी विस्तृत जानकारी माँगी है। बताया गया है कि इन विज्ञापनों को बाल शोषण, उत्पीड़न या ‘न्यूडिफाई’ सेवाओं से संबंधित मेटा की नीतियों के उल्लंघन के कारण हटाया गया था। सीनेटर ने कंपनी से इन विज्ञापनों के प्रसारण की तारीख,उन्हें किस तरह के उपयोगकर्ताओं को लक्षित किया गया,उन्हें कुल कितनी बार देखा गया और अमेरिका में उन्हें कितने दर्शक मिले, इसकी जानकारी देने को कहा है।

इसके अलावा,वॉर्नर ने मेटा से यह भी पूछा है कि इन विज्ञापनों के लिए कंपनी को कितना भुगतान प्राप्त हुआ। उन्होंने विशेष रूप से यह जानना चाहा है कि क्या मेटा ने ऐसे विज्ञापनों से प्राप्त राजस्व अपने पास रखा। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर कोई कंपनी अपनी नीतियों के खिलाफ जाने वाली सामग्री को हटाने में विफल रहती है और उसी सामग्री से उसे वित्तीय लाभ भी होता है,तो इससे कंपनी की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।

सीनेटर ने वर्ष 2025 और 2026 के दौरान अमेरिका में 13 से 18 वर्ष की आयु के किशोर उपयोगकर्ताओं को दिखाए गए उन पेड विज्ञापनों का आँकड़ा भी माँगा है,जिन्हें बाद में नग्नता या शोषणकारी सामग्री के कारण चिह्नित किया गया था। इस जानकारी के जरिए यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर नाबालिगों को इस प्रकार की सामग्री के संपर्क में आने का जोखिम कितना है और कंपनी की विज्ञापन प्रणाली उम्र के आधार पर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के लिए कितनी प्रभावी है।

इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मेटा को कथित तौर पर शोधकर्ताओं की ओर से जानकारी मिलने के बाद भी नए विज्ञापन मिलते रहे। वॉर्नर ने इस बात को विशेष रूप से गंभीरता से लिया है। बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने जुलाई 2026 में मेटा को इस समस्या की जानकारी दी थी। यह जानकारी भारत में इंस्टाग्राम पर इसी तरह के विज्ञापनों के संचालन का खुलासा करने वाली ब्रिटिश प्रसारक की एक जांच के बाद सामने आई थी।

भारत से जुड़े इस मामले ने भी मेटा की विज्ञापन प्रणाली पर सवाल खड़े किए थे। अब अमेरिकी सीनेटर द्वारा उसी तरह के मामलों को लेकर कंपनी से जवाब मांगने से यह मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों की मौजूदा विज्ञापन समीक्षा प्रणालियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए तैयार की गई आपत्तिजनक सामग्री की पहचान करने में पर्याप्त सक्षम हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास ने जहाँ रचनात्मक और व्यावसायिक क्षेत्रों में नए अवसर पैदा किए हैं, वहीं इसके दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। विशेष रूप से ऐसे एआई उपकरण जो वास्तविक तस्वीरों में बदलाव करके किसी व्यक्ति को नग्न या यौन स्वरूप में दिखा सकते हैं, उनके दुरुपयोग को लेकर दुनिया के कई देशों में चिंता व्यक्त की जा रही है। यदि इन तकनीकों का इस्तेमाल बच्चों की तस्वीरों के साथ किया जाता है तो मामला और अधिक गंभीर हो जाता है।

मार्क वॉर्नर पहले भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को लेकर सक्रिय रहे हैं। उन्होंने जुलाई में ‘सेफ एआई एक्ट’ नामक विधेयक पेश किया था। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य ऐसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों पर रोक लगाना है,जो बाल यौन शोषण सामग्री या बिना सहमति वाले अंतरंग चित्र तैयार कर सकती हैं। प्रस्तावित कानून में उन सॉफ्टवेयर पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान बताया गया है,जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े सुरक्षा नियंत्रणों को दरकिनार करने में मदद करते हैं।

वॉर्नर का मानना है कि एआई तकनीक को लेकर केवल कंपनियों की स्वैच्छिक नीतियाँ पर्याप्त नहीं हो सकतीं और जहाँ आवश्यक हो वहाँ कानून के जरिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए। बाल यौन शोषण सामग्री के खिलाफ मौजूदा कानूनों को एआई से तैयार सामग्री के संदर्भ में भी प्रभावी बनाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। इस बहस में सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि उनके प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में उपयोगकर्ता और विज्ञापनदाता सक्रिय हैं।

मेटा की ओर से विज्ञापन सामग्री की समीक्षा के लिए स्वचालित प्रणालियों और मानव समीक्षा दोनों का इस्तेमाल किए जाने का दावा किया जाता है। इसके बावजूद अगर प्रतिबंधित सामग्री वाले विज्ञापन लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर चलते रहे हों,तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कंपनी की निगरानी व्यवस्था में कहां कमी रह गई। खासकर तब, जब विज्ञापनदाता भुगतान करके ऐसी सामग्री को बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं तक पहुँचा सकते हैं।

इस मामले में सीनेटर की ओर से माँगी गई जानकारी मेटा के लिए महत्वपूर्ण होगी। कंपनी को न केवल यह बताना होगा कि विज्ञापन उसकी समीक्षा प्रक्रिया से कैसे गुजर गए, बल्कि उसे यह भी स्पष्ट करना पड़ सकता है कि उसने ऐसे मामलों को रोकने के लिए क्या सुधार किए हैं। साथ ही,विज्ञापन से होने वाली आय और संबंधित अधिकारियों को रिपोर्टिंग की प्रक्रिया पर भी कंपनी को जवाब देना पड़ सकता है।

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू मेटा की जवाबदेही से जुड़ा है। सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर यह तर्क देती हैं कि अरबों पोस्ट,तस्वीरों और विज्ञापनों की निगरानी करना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है,लेकिन आलोचकों का कहना है कि भुगतान लेकर चलाए जाने वाले विज्ञापनों के मामले में कंपनियों की जिम्मेदारी और अधिक होनी चाहिए, क्योंकि विज्ञापन सामान्य उपयोगकर्ता सामग्री की तुलना में पहले से समीक्षा और स्वीकृति की प्रक्रिया से गुजरते हैं।

मार्क वॉर्नर ने इसी बिंदु को उठाते हुए सवाल किया है कि जब मेटा स्वयं दावा करती है कि वह सभी विज्ञापनों की समीक्षा और स्वीकृति करती है,तब इतनी स्पष्ट रूप से आपत्तिजनक और कथित तौर पर अवैध सामग्री उसके प्लेटफॉर्म पर कैसे पहुँचीं। उनके अनुसार,यह विश्वास करना मुश्किल है कि ऐसी सामग्री अनजाने में इतनी लंबी अवधि तक प्लेटफॉर्म पर मौजूद रही होगी।

अब सबकी नजर मेटा के जवाब पर है। 26 अगस्त तक कंपनी को सीनेटर के सवालों का जवाब देना है। इस जवाब से यह स्पष्ट हो सकता है कि मेटा ने कितने विज्ञापनों की पहचान की, उन्हें कब हटाया,उनसे कितना राजस्व प्राप्त हुआ और क्या कंपनी ने संबंधित मामलों की सूचना कानून प्रवर्तन या बाल संरक्षण संस्थाओं को दी।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है,जब दुनियाभर में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है। सोशल मीडिया,कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल संपादन तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों के शोषण के नए रास्ते पैदा किए हैं। ऐसे में सरकारों और तकनीकी कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि तकनीकी विकास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था कैसे बनाई जाए।

अमेरिकी सीनेटर की कार्रवाई से संकेत मिलता है कि सोशल मीडिया कंपनियों पर इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और नियामकीय दबाव बढ़ सकता है। यदि जाँच में यह साबित होता है कि प्रतिबंधित सामग्री वाले विज्ञापनों से कंपनियों ने आर्थिक लाभ कमाया या उन्हें हटाने में जानबूझकर देरी की गई,तो इसके गंभीर कानूनी और नियामकीय परिणाम हो सकते हैं। वहीं,यदि मामला तकनीकी और समीक्षा प्रणाली की विफलता का निकलता है,तो कंपनियों को अपने विज्ञापन निगरानी तंत्र में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

फिलहाल,मेटा से माँगी गई जानकारी इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। खास तौर पर यह पता लगाना जरूरी होगा कि कथित आपत्तिजनक विज्ञापन कितने समय तक सक्रिय रहे,कितने लोगों तक पहुँचे,उनमें कितने नाबालिग शामिल थे और उनसे कंपनी को कितना आर्थिक लाभ हुआ। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि मेटा भविष्य में ऐसी सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म पर आने से रोकने के लिए कौन से ठोस कदम उठाती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में बाल सुरक्षा का मुद्दा केवल तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रह गया है। सरकारों,कानून प्रवर्तन एजेंसियों,सोशल मीडिया कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बढ़ रही है। मार्क वॉर्नर की ओर से उठाए गए सवाल इसी व्यापक चिंता का हिस्सा हैं। अब मेटा के जवाब और आगे की संभावित जाँच से यह तय होगा कि कंपनी की मौजूदा नीतियाँ और सुरक्षा प्रणालियाँ इस तरह के गंभीर दुरुपयोग से निपटने के लिए कितनी प्रभावी हैं और भविष्य में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर क्या नए कदम उठाए जाते हैं।