नई दिल्ली,21 सितंबर (युआईटीवी)- टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के बोर्ड के बीच विवाद गहरा गया है। टाटा ट्रस्ट्स ने रविवार को 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के लिए पारित प्रस्ताव की वैधता पर सवाल उठाया। ट्रस्ट्स का कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन यानी एओए के तहत इस प्रस्ताव को वैध रूप से पारित करने के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत का सकारात्मक समर्थन जरूरी था, जो इस मामले में हासिल नहीं हुआ।
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और उसके दो नामित निदेशक कंपनी के बोर्ड में हैं। ट्रस्ट्स ने अपने बयान में कहा कि एओए के तहत किसी प्रस्ताव के प्रभावी होने के लिए उसके नामित निदेशकों में से कम से कम बहुमत का समर्थन आवश्यक है। चूंकि बोर्ड में ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशक हैं, इसलिए ट्रस्ट्स के अनुसार बहुमत का अर्थ दोनों निदेशकों का प्रस्ताव के पक्ष में होना है। 17 सितंबर की बैठक में इनमें से एक निदेशक ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया। इसलिए ट्रस्ट्स का तर्क है कि एओए में निर्धारित अनिवार्य शर्त पूरी नहीं हुई।
ट्रस्ट्स ने साफ तौर पर कहा कि दो नामित निदेशकों के मामले में बहुमत एक नहीं,बल्कि दो होता है। उसके मुताबिक बोर्ड में प्रस्ताव के पक्ष में कुल कितने निदेशकों ने मतदान किया, यह इस मुद्दे पर निर्णायक नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 17 सितंबर को चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव पर बोर्ड का मतदान 4:1 रहा था। टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि कुल बोर्ड वोट का यह आँकड़ा उस अलग शर्त को पूरा नहीं कर सकता,जो एओए में ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के लिए निर्धारित है।
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू बोर्ड के चेयरमैन के कास्टिंग वोट से जुड़ा है। टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि चेयरमैन का कास्टिंग वोट केवल उस स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है, जब पूरे बोर्ड के स्तर पर वोट बराबर हो जाएं। ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बीच समर्थन की अनिवार्य शर्त पर यह नियम लागू नहीं होता। इसलिए ट्रस्ट्स के अनुसार कास्टिंग वोट के जरिए उस कमी को दूर नहीं किया जा सकता,जो उसके नामित निदेशकों के आवश्यक समर्थन के अभाव में पैदा हुई है।
ट्रस्ट्स ने इस मामले को बोर्ड में गतिरोध की स्थिति मानने से भी इनकार किया है। उसका कहना है कि कंपनी के बोर्ड के सामने एक प्रस्ताव रखा गया और एओए में मौजूद प्रावधानों के आधार पर उस प्रस्ताव के लिए जरूरी शर्त पूरी नहीं हुई। ट्रस्ट्स के मुताबिक अपने ही संविधान में दिए गए सुरक्षा अधिकार का इस्तेमाल करना किसी कंपनी को ठप करने वाला गतिरोध नहीं,बल्कि एओए में लिखे प्रावधानों का इस्तेमाल है। इसी आधार पर ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को कानूनी प्रभाव से रहित बताया है।
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने तर्क के समर्थन में साइरस मिस्त्री से जुड़े पुराने मामले का भी हवाला दिया है। यह मामला टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री को 2016 में पद से हटाए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा था। उस मुकदमे में टाटा संस के एओए में मौजूद ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के विशेष मतदान अधिकार भी महत्वपूर्ण मुद्दा बने थे। ट्रस्ट्स के अनुसार आर्टिकल 104बी और 121 के तहत दिए गए इन अधिकारों को राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण ने दमनकारी माना था और उन्हें हटाने या सीमित करने की मांग की गई थी।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि उस समय टाटा संस ने इन अधिकारों का बचाव किया था। कंपनी ने अदालत के सामने दलील दी थी कि ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों को दिए गए ये अधिकार शेयरधारकों के बीच तय की गई वैध सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। ट्रस्ट्स के मुताबिक टाटा संस ने यह भी तर्क दिया था कि ये अधिकार दमनकारी नहीं हैं,बल्कि बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के अधिकारों से जुड़े हैं। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के पक्ष को स्वीकार करते हुए उन प्रावधानों को दमनकारी बताने वाले फैसले को पलट दिया था।
अब टाटा ट्रस्ट्स इसी पुराने मामले को मौजूदा विवाद से जोड़ रहा है। उसका कहना है कि टाटा संस ने जिन सुरक्षा अधिकारों का बचाव सुप्रीम कोर्ट में किया था,वह अब उन्हीं अधिकारों की अलग व्याख्या नहीं कर सकती। ट्रस्ट्स के अनुसार एओए में मौजूद प्रावधान तब भी लागू थे और अब भी लागू हैं। इसलिए कंपनी के लिए उन अधिकारों को मौजूदा विवाद में नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर यह विवाद ऐसे समय सामने आया है,जब टाटा संस के भविष्य के प्रशासन और कंपनी से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर भी चर्चा चल रही है। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन को एक और पाँच साल के कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए रखने के साथ कंपनी की संभावित सार्वजनिक सूचीबद्धता की दिशा में आगे बढ़ने से जुड़ा फैसला भी सामने आया था। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से दोनों मुद्दों को लेकर असहमति सामने आई है।
चंद्रशेखरन को 2017 में टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया गया था। उनका मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद आगे की जिम्मेदारी को लेकर पहले से ही चर्चा चल रही थी। अब बोर्ड के फैसले को टाटा ट्रस्ट्स द्वारा चुनौती दिए जाने के बाद कंपनी के नेतृत्व से जुड़ा मामला कॉरपोरेट कानून और एओए की व्याख्या के दायरे में पहुँच गया है।
फिलहाल विवाद का केंद्र यह सवाल है कि टाटा संस के एओए में टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों को दिए गए विशेष मतदान अधिकारों की व्याख्या किस तरह की जाए और क्या इन अधिकारों की अनिवार्य शर्त पूरी हुए बिना बोर्ड चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को प्रभावी मान सकता है। टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में प्रस्ताव को अमान्य बताया है,जबकि पूरे मामले में आगे की कानूनी और कॉरपोरेट प्रक्रिया यह निर्धारित करेगी कि 17 सितंबर का बोर्ड निर्णय किस रूप में लागू होता है।
