नितेश सिवाच (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

एशियन गेम्स 2026 में नितेश सिवाच ने रचा इतिहास,ग्रीको-रोमन कुश्ती में 64 साल बाद भारत को दिलाया रजत

नागोयाई,2 अक्टूबर (युआईटीवी)- एशियन गेम्स 2026 में भारत के नितेश सिवाच ने ग्रीको-रोमन कुश्ती में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। गुरुवार को नागोया सिटी इनाए स्पोर्ट्स सेंटर में खेले गए पुरुषों के 97 किलोग्राम भार वर्ग के फाइनल में नितेश को जापान के यूरी नकाजातो के खिलाफ 0-4 से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के कारण वह स्वर्ण पदक से चूक गए,लेकिन फाइनल तक पहुँचकर उन्होंने भारतीय कुश्ती के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया।

नितेश साल 1962 के बाद एशियन गेम्स में ग्रीको-रोमन कुश्ती के फाइनल में पहुँचने वाले पहले भारतीय पहलवान बने। इससे पहले 1962 के एशियन गेम्स में मारुति माने ने इसी भार वर्ग में रजत पदक जीता था। ऐसे में नितेश की उपलब्धि भारतीय ग्रीको-रोमन कुश्ती के लिए लंबे अंतराल के बाद आई एक बड़ी सफलता है।

फाइनल मुकाबले में जापानी पहलवान यूरी नकाजातो ने शुरुआत से ही आक्रामक रणनीति अपनाई। उन्होंने नितेश को अपनी पकड़ बनाने और अपनी तकनीक का इस्तेमाल करने का ज्यादा मौका नहीं दिया। मुकाबले के शुरुआती चरण में दोनों पहलवान एक-दूसरे को परखते नजर आए,लेकिन धीरे-धीरे नकाजातो ने मुकाबले पर अपना नियंत्रण मजबूत करना शुरू कर दिया।

पहले राउंड के बीच में नितेश को निष्क्रियता के लिए पेनाल्टी मिली। इसके बाद नकाजातो को दो अंक हासिल हुए और उन्होंने 2-0 की बढ़त बना ली। बढ़त मिलने के बाद जापानी पहलवान ने अपनी रणनीति में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। उन्होंने नितेश को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रखने की कोशिश की।

नितेश ने भी शुरुआती बढ़त के बावजूद मुकाबला हाथ से जाने नहीं दिया। भारतीय पहलवान ने जापानी प्रतिद्वंद्वी के हमलों का लगातार सामना किया और पहले राउंड में अंतर को ज्यादा बढ़ने नहीं दिया। ब्रेक तक नकाजातो 2-0 से आगे थे और नितेश के सामने दूसरे हिस्से में वापसी करने की चुनौती थी।

दूसरे राउंड में नितेश को मुकाबले का रुख बदलने के लिए आक्रामक होना जरूरी था। हालाँकि,नकाजातो ने भारतीय पहलवान को खुलकर हमला करने का अवसर नहीं दिया। जापानी पहलवान ने मुकाबले की गति को अपने नियंत्रण में रखा और नितेश को लगातार दबाव में बनाए रखा।

नकाजातो ने एक मौके पर नितेश को नीचे गिराकर दो और अंक हासिल कर लिए। इससे उनकी बढ़त 4-0 हो गई। इसके बाद जापानी पहलवान ने मुकाबला जल्द खत्म करने के लिए नितेश को पिन करने की कोशिश भी की। हालाँकि,भारतीय पहलवान ने शानदार प्रतिरोध किया और जापानी पहलवान को तुरंत मुकाबला समाप्त करने में सफल नहीं होने दिया।

नितेश ने अंत तक हार नहीं मानी और लगातार वापसी की कोशिश करते रहे। लेकिन नकाजातो की मजबूत रक्षात्मक रणनीति और मुकाबले पर नियंत्रण के कारण भारतीय पहलवान को स्कोर बराबर करने का मौका नहीं मिला। अंतिम सीटी बजने के साथ ही नकाजातो ने 4-0 से मुकाबला अपने नाम कर स्वर्ण पदक जीत लिया, जबकि नितेश को रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

हालाँकि,फाइनल में नितेश को हार का सामना करना पड़ा,लेकिन उनका एशियन गेम्स अभियान शानदार रहा। उन्होंने क्वार्टर फाइनल से अपने नॉकआउट अभियान की शुरुआत की थी। इस मुकाबले में उनका सामना तुर्कमेनिस्तान के अमनबेर्डी अगामामेदोव से हुआ, जिसे भारतीय पहलवान ने 7-1 से हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया।

क्वार्टर फाइनल में जीत के बाद नितेश ने सेमीफाइनल में मंगोलिया के गनबातारिन गनखुयाग के खिलाफ और भी प्रभावशाली प्रदर्शन किया। उन्होंने इस मुकाबले में एकतरफा अंदाज में 9-0 से जीत दर्ज की। इस शानदार जीत के साथ नितेश ने फाइनल में जगह बनाई और भारत के लिए पदक पक्का किया।

नितेश का फाइनल तक पहुँचना इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत का एशियन गेम्स फाइनल तक पहुँचने का इंतजार छह दशक से अधिक समय तक चला। 1962 में मारुति माने के रजत पदक के बाद अब नितेश ने उसी भार वर्ग में रजत पदक जीतकर इस ऐतिहासिक उपलब्धि को दोहराया है।

नितेश स्वर्ण पदक हासिल नहीं कर सके,लेकिन उन्होंने भारतीय ग्रीको-रोमन कुश्ती को एशियन गेम्स के सबसे बड़े मंच पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर दिलाई। क्वार्टर फाइनल से लेकर फाइनल तक उनका प्रदर्शन यह दिखाता है कि उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में मजबूत प्रतिस्पर्धा पेश की। जापान के पहलवान के खिलाफ फाइनल में भले ही उन्हें अंक नहीं मिल सके,लेकिन रजत पदक के साथ उनका एशियन गेम्स अभियान भारतीय कुश्ती के लिए यादगार बन गया।