नई दिल्ली,2 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारतीय रिजर्व बैंक की आगामी मौद्रिक नीति बैठक से पहले ब्याज दरों को लेकर बाजार और अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वालों की निगाहें एक बार फिर केंद्रीय बैंक के फैसले पर टिक गई हैं। भारतीय स्टेट बैंक की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक,मौजूदा परिस्थितियों में जोखिमों का संतुलन अब 25 आधार अंक यानी 0.25 प्रतिशत की रेपो दर बढ़ोतरी के पक्ष में निर्णायक रूप से झुक गया है। रिपोर्ट में महँगाई के बढ़ते दबाव,वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव, कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिम,रुपये पर दबाव और वैश्विक स्तर पर जोखिमों के दोबारा बढ़ने को इसके प्रमुख कारणों में गिनाया गया है।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक 5 से 7 अक्टूबर तक होनी है। इसी बैठक में बेंचमार्क रेपो दर को लेकर फैसला किया जाएगा। केंद्रीय बैंक ने पिछली चार नीतिगत बैठकों में रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा है। इससे पहले 2025 में रेपो दर में कुल 125 आधार अंक की कटौती की गई थी। अब अक्टूबर की बैठक में दर बढ़ाने की संभावना पर बाजार में चर्चा तेज हो गई है।
भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक तनाव,कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिम और वैश्विक बाजारों में जोखिम के नए सिरे से आकलन को देखते हुए नीतिगत कदम पहले से उठाना बेहतर होगा। रिपोर्ट का तर्क है कि अगर महँगाई और बाहरी जोखिमों के बढ़ने का इंतजार किया गया,तो बाद में केंद्रीय बैंक के सामने अधिक कठिन परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसलिए रिपोर्ट में एहतियाती तौर पर 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। यह एसबीआई रिसर्च का आकलन है,अंतिम फैसला मौद्रिक नीति समिति ही करेगी।
रेपो दर को लेकर बदलते अनुमान के पीछे सबसे प्रमुख कारण महँगाई का बढ़ना है। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महँगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इससे महँगाई को लेकर आरबीआई की चिंता बढ़ सकती है। हालिया आँकड़ों पर आधारित विश्लेषणों में भी यह बात सामने आई है कि कीमतों का दबाव अब अर्थव्यवस्था के ज्यादा हिस्सों में दिखाई देने लगा है।
एसबीआई की रिपोर्ट ने महँगाई के साथ-साथ कच्चे तेल की कीमतों को भी अहम जोखिम बताया है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है,इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महँगा होने पर आयात बिल,रुपये की विनिमय दर और घरेलू कीमतों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँची रहती हैं, तो महँगाई के अनुमान भी प्रभावित हो सकते हैं।
इससे पहले एसबीआई रिसर्च ने सितंबर में भी अक्टूबर और दिसंबर में 25-25 आधार अंक की दर बढ़ोतरी का अनुमान जताया था। उस समय रिपोर्ट में ऊँची कच्चे तेल की कीमतों,बाहरी झटकों और महँगाई के व्यापक होने की आशंका को इसके पीछे प्रमुख कारण बताया गया था।
एसबीआई की ताजा रिपोर्ट में भारतीय रुपये की कमजोरी और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली को भी महत्वपूर्ण जोखिम बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, डॉलर सूचकांक में मजबूती के बीच रुपया दबाव में है। साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की ओर से लगातार निकासी ने बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनाया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि एक सप्ताह में करीब 4.45 अरब डॉलर की निकासी हुई।
ऐसी स्थिति में आरबीआई के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। केंद्रीय बैंक के पास रुपये की अस्थिरता को कम करने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार और अन्य नीतिगत साधनों का इस्तेमाल करने की क्षमता है, लेकिन वैश्विक बाजारों में बड़े स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति पैदा होने पर दबाव बढ़ सकता है।
हालिया आर्थिक विश्लेषणों में भी रुपये की कमजोरी और वैश्विक ब्याज दरों के बीच अंतर को लेकर चिंता जताई गई है। कुछ विश्लेषकों के मुताबिक,यदि अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भी ब्याज दरें बढ़ती हैं,तो भारत के लिए अपनी मुद्रास्फीति और मुद्रा स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।
एसबीआई की रिपोर्ट ने इस साल के मानसून को लेकर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 का मानसून वर्ष 2000 के बाद चौथा सबसे कम बारिश वाला रहा और बारिश दीर्घकालिक औसत के केवल 87 प्रतिशत के आसपास रही। करीब 43 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि मजबूत अल नीनो परिस्थितियाँ और अक्टूबर में सामान्य से कम बारिश रबी फसलों के उत्पादन के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।
कम बारिश का असर कृषि उत्पादन पर पड़ने की स्थिति में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। खासतौर पर रबी फसलों के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ने पर आने वाले महीनों में खाद्य महँगाई का जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि मौद्रिक नीति के लिए मानसून और कृषि उत्पादन की स्थिति भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
हालाँकि,अगस्त में आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का फैसला किया था। उस समय समिति ने कहा था कि महँगाई में संभावित बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन जैसी आपूर्ति संबंधी वजहों से हो सकती है और उस समय तक मूल महँगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित थी। समिति ने वैश्विक परिस्थितियों,मानसून, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितताओं पर भी नजर रखने की बात कही थी।
एसबीआई की रिपोर्ट में बैंकिंग प्रणाली की तरलता को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार,कुल तरलता भले ही पर्याप्त दिखाई दे रही हो,लेकिन प्रभावी तरलता का वास्तविक स्तर उतना अधिक नहीं है। विशेष विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा के तहत रिकॉर्ड 143.5 अरब डॉलर के प्रवाह के बावजूद बैंकों के लिए उपलब्ध धन का पूरा इस्तेमाल करना आसान नहीं है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नकद आरक्षित अनुपात, वैधानिक तरलता अनुपात और तरलता कवरेज अनुपात जैसी नियामकीय आवश्यकताएं बैंकों के पास मौजूद अतिरिक्त जमा राशि के इस्तेमाल को सीमित करती हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था में उपलब्ध कुल तरलता और वास्तव में ऋण देने के लिए उपलब्ध प्रभावी तरलता के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
एसबीआई का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में यदि ऋण वृद्धि करीब 16 प्रतिशत रहती है तो बैंकों को उसे समर्थन देने के लिए जमा सृजन में लगभग 8.2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त अंतर पूरा करना पड़ सकता है। इसका अर्थ यह है कि बैंकिंग क्षेत्र के सामने ऋण की माँग और जमा वृद्धि के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी रह सकती है।
एसबीआई की रिपोर्ट ने आगामी मौद्रिक नीति बैठक में आरबीआई के आर्थिक अनुमानों में बदलाव की भी संभावना जताई है। रिपोर्ट के अनुसार,केंद्रीय बैंक वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि के अनुमान में 30 आधार अंक और महँगाई के अनुमान में 20 आधार अंक की बढ़ोतरी कर सकता है।
यह अनुमान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को लेकर हालिया आँकड़े अपेक्षाकृत मजबूत रहे हैं। दूसरी ओर, महँगाई, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण आर्थिक परिदृश्य में जोखिम भी बने हुए हैं। ऐसे में आरबीआई के सामने आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने और महँगाई को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन कायम करने की चुनौती होगी।
फिलहाल बाजार में भी अक्टूबर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की संभावना को लेकर उम्मीद बढ़ी है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षणों में अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने अक्टूबर की बैठक में रेपो दर को 5.50 प्रतिशत तक बढ़ाए जाने का अनुमान जताया है। हालाँकि,यह बाजार और अर्थशास्त्रियों की अपेक्षा है,आरबीआई का आधिकारिक फैसला नहीं।
एसबीआई की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत को घबराने की जरूरत नहीं है,लेकिन नीति निर्माताओं और नियामकों को संभावित बाहरी झटकों के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि वैश्विक परिस्थितियां और महंगाई का दबाव आगे और बढ़ता है तो मौद्रिक नीति में अपेक्षाकृत असामान्य या सख्त कदमों की जरूरत पड़ सकती है।
अब सभी की नजर 5 से 7 अक्टूबर के बीच होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक पर है। बैठक में रेपो दर के साथ-साथ महंगाई, आर्थिक वृद्धि, वैश्विक बाजार,रुपये की स्थिति,तरलता और कच्चे तेल की कीमतों को लेकर आरबीआई के आकलन पर भी ध्यान रहेगा। 7 अक्टूबर को सामने आने वाला फैसला यह बताएगा कि केंद्रीय बैंक मौजूदा जोखिमों को किस तरह संतुलित करता है और आने वाले महीनों के लिए उसकी मौद्रिक नीति की दिशा क्या रहती है।
