नई दिल्ली,5 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक सोमवार से शुरू हो गई है। इस बैठक पर बाजार और अर्थजगत की नजर बनी हुई है,क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। ऊर्जा की बढ़ती लागत के साथ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने महँगाई के मोर्चे पर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंक के सामने आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने और महँगाई पर नियंत्रण बनाए रखने के बीच संतुलन कायम करने की चुनौती है।
मौद्रिक नीति समिति की बैठक में ब्याज दरों सहित मौद्रिक नीति के रुख पर चर्चा की जाएगी। बैठक में लिए गए फैसलों की घोषणा 7 अक्टूबर को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा करेंगे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केंद्रीय बैंक लंबे समय तक दरों में नरमी का रुख अपनाने के बाद अब रेपो रेट बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएगा या मौजूदा दर को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखेगा।
बाजार के जानकारों और अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मान रहा है कि महँगाई से जुड़े बढ़ते जोखिमों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक इस बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी शुरू कर सकता है। पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि यदि दरों में वृद्धि होती है,तो दिसंबर की बैठक में ऐसा फैसला लिया जा सकता है,लेकिन बदलते वैश्विक हालात और ऊर्जा कीमतों में तेजी के कारण अब अक्टूबर में ही कदम उठाए जाने की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।
बैंक ऑफ अमेरिका के विश्लेषण के अनुसार, ऊर्जा की ऊँची कीमतों, खाद्य पदार्थों में बढ़ती महँगाई और सामान्य कीमतों पर पड़ रहे दबाव के कारण केंद्रीय बैंक को पहले की अपेक्षा जल्द सख्त मौद्रिक नीति की ओर बढ़ना पड़ सकता है। इसके तहत अक्टूबर की बैठक में रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि करीब दो वर्षों तक मौद्रिक समर्थन देने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक अब धीरे-धीरे इस समर्थन को कम करने की शुरुआत कर सकता है।
इस संभावित बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह महँगाई से जुड़े जोखिम बताए जा रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल महँगा होने से आयात लागत बढ़ती है, जिसका असर परिवहन,उत्पादन और कई अन्य क्षेत्रों की लागत पर पड़ सकता है। इसका प्रभाव आगे चलकर विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
महँगाई के घरेलू आँकड़े भी दबाव बढ़ने के संकेत दे रहे हैं। जुलाई में खुदरा महँगाई दर 4.45 प्रतिशत थी,जो अगस्त में बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई। महँगाई में यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है,जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार में भी अनिश्चितता बनी हुई है। इसके अलावा मौसम से जुड़े जोखिम भी खाद्य महँगाई के लिए चिंता का कारण बन रहे हैं।
अल-नीनो की मजबूत स्थिति और अक्टूबर में सामान्य से कम बारिश की आशंका रबी फसलों के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। यदि कृषि उत्पादन पर मौसम का प्रतिकूल असर पड़ता है,तो आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक के लिए महँगाई के भविष्य के रुख का आकलन करना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
भारतीय स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट में भी मौद्रिक नीति के मोर्चे पर जल्द कदम उठाने की जरूरत की ओर संकेत किया गया है। रिपोर्ट में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिम और वैश्विक वित्तीय बाजारों में जोखिम के दोबारा आकलन को महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया है कि परिस्थितियाँ और चुनौतीपूर्ण होने का इंतजार करने के बजाय पहले से कदम उठाना अधिक उपयुक्त हो सकता है।
वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी भारतीय रिजर्व बैंक के लिए एक अतिरिक्त चुनौती है। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरों और बॉन्ड बाजार की गतिविधियों का असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ता है। वैश्विक निवेशकों के लिए विभिन्न बाजारों में निवेश का आकर्षण बदलने से पूँजी प्रवाह और वित्तीय बाजारों पर असर पड़ सकता है। ऐसे समय में केंद्रीय बैंक को घरेलू परिस्थितियों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पर भी नजर रखनी होती है।
यदि भारतीय रिजर्व बैंक रेपो रेट में बढ़ोतरी करता है तो इसका असर बैंकों की उधारी लागत और आगे चलकर कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर,दरों को स्थिर रखने का फैसला आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने में मदद कर सकता है,लेकिन लगातार बढ़ते महँगाई जोखिम के बीच केंद्रीय बैंक के लिए यह संतुलन आसान नहीं होगा।
रेपो रेट में आखिरी बार बदलाव कब हुआ था और महँगाई तथा विकास दर के ताजा आँकड़े मौद्रिक नीति समिति के फैसले के लिए अहम आधार बनेंगे। समिति के सामने एक ओर आर्थिक वृद्धि की गति बनाए रखने की जरूरत है,वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि ऊर्जा और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी व्यापक महँगाई का रूप न ले।
अब बाजार की नजर 7 अक्टूबर को होने वाली घोषणा पर है। उस दिन भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि केंद्रीय बैंक मौजूदा परिस्थितियों को किस तरह देख रहा है और आने वाले महीनों के लिए उसकी मौद्रिक नीति की दिशा क्या होगी। यदि रेपो रेट में बढ़ोतरी की जाती है,तो यह लंबे समय से चली आ रही नरम नीति के बाद रुख में बदलाव का संकेत होगी। वहीं दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का फैसला यह दर्शाएगा कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महँगाई और आर्थिक वृद्धि के बीच मौजूदा संतुलन को जारी रखना चाहता है। ऐसे में मौद्रिक नीति समिति का यह फैसला आने वाले समय में कर्ज, निवेश, बाजार और आम उपभोक्ताओं की वित्तीय लागत पर भी असर डाल सकता है।
