भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

महँगाई का दबाव बढ़ा,आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मुद्रास्फीति अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा

नई दिल्ली,7 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई ) ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महँगाई के अनुमान को 5.2 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि देश में महँगाई की स्थिति अब पिछले वर्ष की तुलना में उतनी अनुकूल नहीं रह गई है। खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिमों ने भी चिंता बढ़ाई है। मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की घोषणा करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महँगाई के मौजूदा रुझान और आने वाले महीनों की संभावित स्थिति को लेकर विस्तार से जानकारी दी।

केंद्रीय बैंक के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 4.9 प्रतिशत रह सकती है। इसके बाद तीसरी तिमाही में इसके बढ़कर 6 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। वहीं वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही के लिए खुदरा महँगाई का अनुमान 5.6 प्रतिशत रखा गया है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाली कुछ तिमाहियों में महँगाई पर दबाव बना रह सकता है और कीमतों में स्थिरता हासिल करना केंद्रीय बैंक के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

संजय मल्होत्रा ने कहा कि महँगाई और उसका परिदृश्य अब पिछले साल की तरह अनुकूल नहीं है। उनके मुताबिक खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के साथ आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिम भी बढ़े हैं। ऐसे में आने वाले समय में कीमतों पर दबाव को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत है। गवर्नर ने बताया कि अगले तीन तिमाहियों के दौरान औसत सीपीआई मुद्रास्फीति करीब 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है,जबकि कोर मुद्रास्फीति लगभग 4.4 प्रतिशत के आसपास रह सकती है।

महँगाई में हालिया तेजी का असर अगस्त के आँकड़ों में भी दिखाई दिया। आरबीआई के मुताबिक अगस्त में सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई,जबकि इससे पहले यह 4.5 प्रतिशत थी। केंद्रीय बैंक ने बताया कि इस बढ़ोतरी के पीछे खाद्य और ईंधन कीमतों में तेजी प्रमुख कारण रही। इसके साथ ही कोर मुद्रास्फीति में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कोर महँगाई में खाद्य और ईंधन जैसे अस्थिर घटकों को आम तौर पर अलग रखा जाता है,इसलिए इसमें वृद्धि को अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों में भी कीमतों का दबाव बढ़ने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

अगस्त में कोर मुद्रास्फीति 4.2 प्रतिशत रही। वहीं कीमती धातुओं को अलग रखने के बाद कोर मुद्रास्फीति 2.9 प्रतिशत दर्ज की गई। आरबीआई के आकलन के मुताबिक खाद्य महँगाई अब कुछ सीमित वस्तुओं तक ही केंद्रित नहीं रह गई है। चीनी और प्याज जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने खाद्य मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ाया है। दूसरी ओर ईंधन क्षेत्र में महँगाई बढ़ने के पीछे प्रतिकूल आधार प्रभाव भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा।

केंद्रीय बैंक ने आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिमों को लेकर भी सतर्क किया है। आरबीआई के मुताबिक आने वाले महीनों में कमजोर मानसून, अल नीनो की स्थिति, ऊँची ऊर्जा कीमतें और अन्य जिंसों की कीमतों में मजबूती महँगाई के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। अगर खाद्य उत्पादन और आपूर्ति पर मौसम संबंधी परिस्थितियों का असर पड़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव खाद्य कीमतों पर देखने को मिल सकता है। इसी तरह वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी घरेलू बाजार में परिवहन और उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती है।

आरबीआई के आँकड़ों में एक और महत्वपूर्ण संकेत सामने आया है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की टोकरी में शामिल उन वस्तुओं का हिस्सा,जिनकी महँगाई दर 4 प्रतिशत से अधिक है, अगस्त में बढ़कर लगभग 37 प्रतिशत हो गया। यह स्थिति बताती है कि महँगाई का दबाव अब कुछ चुनिंदा उत्पादों तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के अधिक हिस्सों में इसका असर दिखाई देने लगा है। केंद्रीय बैंक के लिए यह रुझान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यापक आधार वाली महँगाई को नियंत्रित करना केवल कुछ वस्तुओं की कीमतों में राहत मिलने से संभव नहीं होता।

इसी बदलते महँगाई परिदृश्य के बीच आरबीआई ने मौद्रिक नीति में भी बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक ने रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। रेपो दर वह प्रमुख नीतिगत ब्याज दर है,जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्प अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। इस दर में बदलाव का असर बैंकिंग प्रणाली के साथ-साथ कर्ज की लागत और व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

संजय मल्होत्रा ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए नीतिगत ब्याज दरों का पुनर्संतुलन जरूरी हो गया था। महँगाई के बढ़ते दबाव और आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिमों के बीच आरबीआई का ध्यान कीमतों में स्थिरता बनाए रखने पर है। हालाँकि,ब्याज दरों में बदलाव का व्यापक अर्थव्यवस्था पर असर समय के साथ दिखाई देता है, इसलिए केंद्रीय बैंक आने वाले आँकड़ों और महँगाई के रुझान पर लगातार नजर रखेगा।

कुल मिलाकर आरबीआई के ताजा आकलन से संकेत मिलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने महँगाई को नियंत्रित रखने की चुनौती फिर बढ़ रही है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी,ऊर्जा लागत, मौसम संबंधी अनिश्चितता और वैश्विक जिंस बाजार में उतार-चढ़ाव आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण कारक बने रह सकते हैं। ऐसे में महँगाई का वास्तविक रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और व्यापक आर्थिक परिस्थितियों में कितना सुधार होता है। केंद्रीय बैंक ने फिलहाल 5.2 प्रतिशत का वार्षिक अनुमान रखा है,लेकिन तिमाही अनुमानों से साफ है कि निकट भविष्य में महँगाई पर दबाव बना रहने की संभावना है।