नई दिल्ली,12 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई ) की ओर से विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने और कारोबार को व्यवस्थित बनाने के लिए उठाए गए नए कदमों का असर भारतीय रुपये पर दिखाई दिया। सोमवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती के साथ खुला और कारोबार के दौरान एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त के साथ 95.76 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुँच गया। ऑफशोर बाजार में भी भारतीय मुद्रा में मजबूती दर्ज की गई। हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुँच चुके रुपये के लिए केंद्रीय बैंक के इन फैसलों को राहत देने वाला कदम माना जा रहा है।
भारतीय मुद्रा पर दबाव के बीच रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार में कारोबार के नियमों को सख्त किया है। इन उपायों का उद्देश्य ऐसे लेनदेन पर नियंत्रण रखना है, जिनके कारण रुपये की विनिमय दर में अनावश्यक उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। केंद्रीय बैंक ने बिना हेजिंग वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों की सीमा घटाने,अनुबंधों की दोबारा बुकिंग पर प्रतिबंध लगाने और कुछ बड़े सौदों के लिए नकद रिजर्व रखने जैसे कदम उठाए हैं।
बाजार में रुपये की मजबूती ऐसे समय देखने को मिली,जब इससे पहले भारतीय मुद्रा 97 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुँच गई थी। रुपये की गिरावट से आयातकों,खासकर कच्चे तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं का आयात करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। ऐसे में केंद्रीय बैंक के कदमों का असर केवल मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका संबंध देश की आयात लागत, महँगाई और वित्तीय स्थिरता से भी है।
सोमवार को भारतीय मुद्रा में आई मजबूती का असर ऑफशोर बाजार में भी देखने को मिला। एक महीने के नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड बाजार में रुपया एक समय 94.17 प्रति डॉलर तक मजबूत हुआ। यह पिछले स्तर के मुकाबले लगभग 2.7 प्रतिशत की बढ़त थी। हालाँकि,बाद में रुपये की मजबूती कुछ कम हुई और बढ़त घटकर लगभग 0.7 प्रतिशत रह गई।
नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड यानी एनडीएफ बाजार में ऐसे विदेशी मुद्रा अनुबंधों का कारोबार होता है, जिनका वास्तविक भुगतान संबंधित मुद्रा में करने के बजाय आमतौर पर अंतर की राशि के आधार पर निपटान किया जाता है। इस बाजार में रुपये की चाल से विदेशी निवेशकों और कारोबारियों की अपेक्षाओं का संकेत मिल सकता है।
रुपये में आई तेजी को रिजर्व बैंक के नए नियामकीय उपायों से जोड़कर देखा जा रहा है। केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार में ऐसे सौदों पर नियंत्रण बढ़ाया है,जिनके जरिए कारोबारी बिना वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम के बड़े दांव लगा सकते हैं। इन नियमों से बाजार में सट्टेबाजी की गुंजाइश कम करने और रुपये की विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव पर अंकुश लगाने की कोशिश की गई है।
हालाँकि,मुद्रा बाजार में विनिमय दर केवल नियामकीय फैसलों से तय नहीं होती। डॉलर की वैश्विक स्थिति, विदेशी निवेशकों की गतिविधियाँ,आयातकों की माँग और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियाँ भी रुपये की चाल को प्रभावित करती हैं। इसलिए सोमवार की तेजी को रुपये की दीर्घकालिक मजबूती का संकेत मानने से पहले आगे के कारोबार पर नजर रखना जरूरी होगा।
रिजर्व बैंक ने अक्टूबर की शुरुआत में विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन से जुड़े कई नियामकीय बदलावों की घोषणा की थी। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कदम बिना हेजिंग वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों की सीमा को कम करना था। पहले जहाँ ऐसे सौदों की सीमा 10 करोड़ डॉलर थी,उसे घटाकर 50 लाख डॉलर कर दिया गया।
हेजिंग का इस्तेमाल कंपनियां और अन्य कारोबारी भविष्य में विनिमय दर में होने वाले बदलावों से अपने वित्तीय जोखिम को सीमित करने के लिए करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी भारतीय कंपनी को भविष्य में डॉलर में भुगतान करना है,तो वह विनिमय दर में संभावित बढ़ोतरी से बचने के लिए पहले से अनुबंध कर सकती है। इसके विपरीत,बिना किसी वास्तविक कारोबारी जोखिम के केवल विनिमय दर में बदलाव से लाभ कमाने के उद्देश्य से किए गए सौदों में सट्टेबाजी का तत्व अधिक हो सकता है।
रिजर्व बैंक के नए नियमों के तहत बिना हेजिंग वाले ऐसे सौदों की सीमा कम होने से कारोबारियों के लिए बड़े स्तर पर विदेशी मुद्रा बाजार में दांव लगाना मुश्किल हो सकता है। इससे केंद्रीय बैंक को उम्मीद है कि बाजार में अनावश्यक उतार-चढ़ाव कम करने में मदद मिलेगी।
हालाँकि,विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार का इस्तेमाल वास्तविक कारोबारी जरूरतों और जोखिम प्रबंधन के लिए भी किया जाता है। इसलिए नियामकीय बदलावों का असर कारोबारियों की रणनीति,उपलब्ध विकल्पों और बाजार में तरलता पर भी पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व यानी एफईआरआर नाम से एक नई व्यवस्था भी लागू की है। इसके तहत 20 लाख डॉलर से अधिक मूल्य वाले निर्धारित विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए अधिकृत डीलरों को अनुबंध की रुपये में समतुल्य राशि का 20 प्रतिशत नकद रिजर्व केंद्रीय बैंक के पास बनाए रखना होगा।
यह रिजर्व अनुबंध समाप्त होने तक प्रतिदिन बनाए रखना जरूरी होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य बड़े विदेशी मुद्रा सौदों से जुड़े जोखिम को नियंत्रित करना और बाजार में अनुशासन बढ़ाना है। नकद रिजर्व रखने की शर्त के कारण ऐसे लेनदेन करने वाले डीलरों के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध रखना आवश्यक होगा।
एफईआरआर के लागू होने से विदेशी मुद्रा बाजार में बड़े सौदों की लागत और उनके प्रबंधन के तरीके प्रभावित हो सकते हैं। इसका उद्देश्य कारोबारियों को संभावित जोखिमों के प्रति अधिक सतर्क बनाना और बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी को सीमित करना है।
केंद्रीय बैंक ने नियमों को दरकिनार करने के प्रयासों पर भी सख्त रुख अपनाया है। यदि कोई उपयोगकर्ता कई छोटे लेनदेन के जरिए निर्धारित सीमा से बचने की कोशिश करता है,तो इसे नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नए नियमों का पालन केवल कागजों पर नहीं,बल्कि वास्तविक कारोबार में भी हो।
रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों की दोबारा बुकिंग को लेकर भी निर्देश जारी किए हैं। नए नियमों के अनुसार,अधिकृत डीलर भारतीय रुपये से संबंधित ऐसे विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध को दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं देंगे,जिसे पहले रद्द किया जा चुका हो।
हालाँकि,अनुबंध की अवधि पूरी होने पर उसके रोलओवर की अनुमति जारी रहेगी। रोलओवर का अर्थ है किसी मौजूदा अनुबंध को समाप्त होने के बाद आगे की अवधि के लिए बढ़ाना,जबकि दोबारा बुकिंग के मामले में पहले रद्द किए गए अनुबंध को फिर से दर्ज करने की कोशिश की जाती है।
इसके अतिरिक्त,विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध करने वाले ग्राहकों से लिखित घोषणा लेना भी अनिवार्य किया गया है। इस घोषणा में ग्राहक को यह पुष्टि करनी होगी कि जिस मूल जोखिम के लिए हेजिंग की जा रही है, सके खिलाफ किसी दूसरे अधिकृत डीलर के साथ पहले से हेजिंग नहीं की गई है।
इस व्यवस्था से एक ही कारोबारी जोखिम के लिए कई जगह अनुबंध करने की संभावनाओं पर नियंत्रण लगाने में मदद मिल सकती है। इससे बाजार में वास्तविक जरूरतों और सट्टेबाजी से प्रेरित गतिविधियों के बीच अंतर करने में भी सहायता मिलेगी।
रिजर्व बैंक ने शनिवार को सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विशेष व्यवस्था शुरू करने सहित कई अन्य कदमों की घोषणा की थी। तेल कंपनियों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है। ऐसे में डॉलर की माँग बढ़ने पर रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
तेल आयात भारत के विदेशी मुद्रा बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल खरीदने के लिए डॉलर की माँग बढ़ती है,तो भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा,डॉलर महँगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है, जिसका असर घरेलू कीमतों और महँगाई पर पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक के हालिया कदम ऐसे समय उठाए गए हैं,जब रुपये की विनिमय दर पर दबाव बना हुआ था। पिछले सप्ताह केंद्रीय बैंक ने रेपो दर में भी बढ़ोतरी की थी और संकेत दिया था कि जरूरत पड़ने पर आगे मौद्रिक नीति को और सख्त किया जा सकता है।
रेपो दर वह ब्याज दर है,जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें बदलाव का असर अर्थव्यवस्था में कर्ज की लागत,माँग और महँगाई पर पड़ सकता है। हालाँकि,ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी मुद्रा बाजार के नियामकीय उपाय अलग-अलग माध्यम हैं,जिनका इस्तेमाल केंद्रीय बैंक आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों के अनुसार करता है।
रिजर्व बैंक के नए कदमों के बाद रुपये में आई मजबूती से बाजार को तत्काल राहत मिली है। लेकिन आगे भारतीय मुद्रा की दिशा कई कारकों पर निर्भर करेगी। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डॉलर की माँग,कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेश का प्रवाह और आयातकों की डॉलर संबंधी जरूरतें रुपये के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं।
केंद्रीय बैंक के नए नियम विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी को सीमित करने और कारोबार को व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकते हैं। हालाँकि,इनका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कारोबारी किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और वैश्विक परिस्थितियां कैसी रहती हैं।
फिलहाल रुपये की मजबूती ने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुँच चुकी भारतीय मुद्रा को कुछ राहत दी है। अब बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि रिजर्व बैंक के नियामकीय उपायों का असर कितने समय तक बना रहता है और आने वाले दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर किस दिशा में आगे बढ़ती है।
