संयुक्त राष्ट्र,10 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दिया है कि आतंकवाद के मुद्दे पर परमाणु हथियारों की धमकी देकर नई दिल्ली को अपने रुख से पीछे नहीं हटाया जा सकता। जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत के स्थायी मिशन के वरिष्ठ सलाहकार अनमोल शेर बेदी ने कहा कि भारत अपनी सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी तरह के दबाव में नहीं आएगा और देश के खिलाफ होने वाले आतंकी हमलों का जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद को अंजाम देने वालों और उन्हें समर्थन देने वालों के बीच भारत कोई अंतर नहीं करेगा। बेदी ने पाकिस्तान की परमाणु नीति, आतंकवाद से जुड़े आरोपों,सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका और परमाणु तकनीक के प्रसार को लेकर भी सवाल उठाए।
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति की बैठक के दौरान भारत ने यह रुख सामने रखा। बेदी पाकिस्तान के जिनेवा स्थित स्थायी प्रतिनिधि ताहिर अंद्राबी के बयान का जवाब दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि परमाणु हथियारों को सामान्य राजनीतिक या सैन्य नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार,यदि कोई देश सीमित स्तर की सैन्य कार्रवाई या हमले के जवाब से बचने के लिए परमाणु हथियारों का डर दिखाता है,तो इससे क्षेत्रीय तनाव कम होने के बजाय बढ़ सकता है।
भारत की ओर से दिए गए इस बयान का मुख्य संदेश यह था कि आतंकवाद और परमाणु धमकियों को एक साथ जोड़कर भारत की जवाबी कार्रवाई को रोकने की कोशिश सफल नहीं होगी। बेदी ने कहा कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने पाकिस्तान की ओर से परमाणु हथियारों का मुद्दा उठाए जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी धमकियाँ क्षेत्र की स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती हैं।
अपने संबोधन में अनमोल शेर बेदी ने पिछले वर्ष चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की थी। पहलगाम हमले में 26 नागरिकों की जान गई थी। भारत ने इस कार्रवाई को आत्मरक्षा के अधिकार के तहत उठाया गया कदम बताया था।
बेदी के मुताबिक,ऑपरेशन सिंदूर के दौरान की गई कार्रवाई को इस तरह अंजाम दिया गया कि उसका दायरा नियंत्रित रहे और तनाव को अनावश्यक रूप से बढ़ने से रोका जा सके। उन्होंने इसे संतुलित और सटीक कार्रवाई बताते हुए कहा कि भारत का उद्देश्य आतंकवाद से उत्पन्न खतरे का जवाब देना था। भारत का कहना है कि जब देश की सुरक्षा और नागरिकों के जीवन पर हमला होता है,तब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे खतरों को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
बेदी ने अपने वक्तव्य में यह भी रेखांकित किया कि भारत आतंकवाद को केवल हमले को अंजाम देने वाले लोगों तक सीमित करके नहीं देखता। उनके अनुसार,आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने,उनकी योजना बनाने या उन्हें संचालित करने में भूमिका निभाने वालों को भी जवाबदेही से अलग नहीं रखा जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि परमाणु हथियारों का डर दिखाकर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को रोकने की कोशिश क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ावा दे सकती है।
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर मतभेद रहे हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के मंच पर दिया गया यह बयान भारत की उस नीति को दोहराता है, जिसके तहत वह सीमा पार से होने वाले आतंकवादी हमलों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता है। भारत का पक्ष है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से जुड़ी नीति दो अलग-अलग विषय हैं,जिन्हें एक-दूसरे के साथ जोड़कर जवाबदेही से बचने का रास्ता नहीं बनाया जाना चाहिए।
अनमोल शेर बेदी ने भारत की परमाणु क्षमता को लेकर भी अपना पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारत के परमाणु हथियार किसी एक देश को निशाना बनाने के उद्देश्य से विकसित नहीं किए गए हैं। भारत की परमाणु नीति उसकी सुरक्षा आवश्यकताओं पर आधारित है और इसका स्वरूप रक्षात्मक है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुरूप नीति का पालन करता है।
भारत ने ‘पहले परमाणु हमला नहीं’ यानी नो-फर्स्ट-यूज की नीति घोषित कर रखी है। इसका सामान्य अर्थ यह है कि भारत परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल नहीं करने की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। भारत की घोषित नीति और पाकिस्तान के साथ परमाणु हथियारों को लेकर उसके मतभेद इस क्षेत्र की सुरक्षा चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
बेदी ने कहा कि परमाणु हथियारों को किसी देश की सामान्य सैन्य रणनीति या राजनीतिक दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करना उचित नहीं है। उनके अनुसार,यदि परमाणु खतरे का इस्तेमाल इस उद्देश्य से किया जाता है कि किसी देश को सीमित हमले या आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ प्रतिक्रिया देने से रोका जा सके,तो इससे सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में गलत आकलन,जवाबी कदम और बढ़ते तनाव का खतरा बना रहता है।
परमाणु हथियारों से जुड़े मामलों में भारत का कहना है कि जिम्मेदारी,संयम और स्पष्ट नीति आवश्यक हैं। बेदी के वक्तव्य में इसी बात पर जोर दिया गया कि परमाणु क्षमता को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई रोकने के लिए दबाव बनाने के साधन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत की नीति को रक्षात्मक बताते हुए यह संदेश दिया कि देश अपनी सुरक्षा से जुड़े फैसले स्वयं लेने के लिए प्रतिबद्ध है।
संयुक्त राष्ट्र की बैठक में बेदी ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम और परमाणु तकनीक के प्रसार से जुड़े पुराने विवादों का भी उल्लेख किया। उन्होंने वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान से जुड़े नेटवर्क का हवाला देते हुए देशों को आगाह किया कि परमाणु और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सहयोग करते समय पूरी सावधानी बरती जानी चाहिए।
अब्दुल कदीर खान नेटवर्क पर अतीत में विभिन्न देशों को परमाणु हथियार विकसित करने से संबंधित तकनीक और उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप लगे थे। इस नेटवर्क को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई थीं। उत्तर कोरिया के साथ परमाणु सामग्री और मिसाइल तकनीक से जुड़े संभावित आदान-प्रदान के आरोप भी इस विवाद का हिस्सा रहे हैं। बेदी ने इन घटनाओं का संदर्भ देते हुए कहा कि परमाणु प्रसार का इतिहास इस बात की याद दिलाता है कि संवेदनशील तकनीक के हस्तांतरण में लापरवाही के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत परमाणु प्रसार के मामले में ए.क्यू. खान नेटवर्क के इतिहास की ओर ध्यान दिलाना चाहता है। उनके अनुसार,इसी तरह की चिंताओं के कारण लगभग दो दशक पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 1540 को अपनाया था। इस प्रस्ताव का उद्देश्य सामूहिक विनाश के हथियारों और उनसे संबंधित सामग्री को आतंकवादी संगठनों तथा अन्य गैर-राज्य तत्वों तक पहुँचने से रोकना है।
बेदी ने जिम्मेदार देशों और तकनीक की आपूर्ति करने वाली संस्थाओं से अधिकतम सतर्कता बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि परमाणु और उन्नत सैन्य तकनीक से जुड़ा सहयोग केवल व्यावसायिक या रणनीतिक लाभ के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए। संबंधित देशों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि संवेदनशील तकनीक का इस्तेमाल ऐसे उद्देश्यों के लिए न हो,जो अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।
उनकी अपील का आशय यह था कि परमाणु सहयोग की प्रक्रिया में उचित जाँच,निगरानी और जवाबदेही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। बेदी के अनुसार, इस तरह की सतर्कता केवल भारत के हित में नहीं,बल्कि उन सभी देशों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है जो परमाणु तकनीक या उन्नत हथियारों के हस्तांतरण में शामिल होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वर्ष 2004 में प्रस्ताव 1540 को अपनाया था। इसके तहत सभी सदस्य देशों की जिम्मेदारी है कि वे गैर-राज्य तत्वों,विशेषकर आतंकवादी संगठनों को परमाणु,रासायनिक और जैविक हथियार हासिल करने,विकसित करने या उनके प्रसार में सहायता मिलने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ। प्रस्ताव में ऐसे हथियारों से संबंधित सामग्री और तकनीक की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।
इस प्रस्ताव के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए 1540 समिति का गठन किया गया था। इसका काम सदस्य देशों की ओर से उठाए गए कदमों की समीक्षा करना और प्रस्ताव के उद्देश्यों को लागू करने में सहयोग करना है। परमाणु प्रसार से जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में यह व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है,क्योंकि सामूहिक विनाश के हथियारों की तकनीक या सामग्री गैर-राज्य तत्वों के हाथों में पहुँचने से अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
बेदी ने प्रस्ताव 1540 का उल्लेख करते हुए कहा कि जब परमाणु सहयोग और उन्नत हथियारों के हस्तांतरण की माँगी की जाती है,तो उससे जुड़े सुरक्षा जोखिमों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि उनके फैसलों से संवेदनशील तकनीक के गलत इस्तेमाल की आशंका न बढ़े।
बेदी ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भारत के अनुभव में क्षेत्रीय संकट अक्सर एक जैसे घटनाक्रम के साथ सामने आते हैं। उनके अनुसार,पहले उकसावे वाली कार्रवाई होती है,फिर उसकी जिम्मेदारी से इनकार किया जाता है और जब जवाबी कार्रवाई होती है,तब संयम बरतने की अपील की जाती है।
उन्होंने कहा कि इस तरह का घटनाक्रम क्षेत्रीय अस्थिरता को राजनीतिक दबाव बनाने के साधन में बदल सकता है। बेदी के मुताबिक,यदि आतंकवादी गतिविधियों के बाद जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती,तो संकट बार-बार पैदा होने का खतरा बना रहता है। उन्होंने इसे दक्षिण एशिया में तनाव की एक प्रमुख वजह के रूप में प्रस्तुत किया।
भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने के आरोप लगाता रहा है। पाकिस्तान इन आरोपों को लेकर अलग रुख रखता है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर बेदी की टिप्पणियाँ इसी व्यापक विवाद के संदर्भ में आईं। भारत की ओर से यह संदेश दिया गया कि आतंकवाद के मुद्दे पर जवाबदेही तय किए बिना क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना कठिन होगा।
बेदी ने यह भी कहा कि परमाणु हथियारों की धमकी और आतंकवाद से जुड़े संकट एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। यदि परमाणु खतरे का इस्तेमाल जवाबी कार्रवाई को रोकने के लिए किया जाता है,तो इससे गलत संदेश जाने की आशंका है। उनके अनुसार, क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को परमाणु दबाव से अलग रखा जाए और अंतर्राष्ट्रीय नियमों तथा जिम्मेदारियों का पालन किया जाए।
अपने संबोधन में बेदी ने पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था और सेना की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान में वास्तविक सत्ता का बड़ा हिस्सा सेना के पास है और महत्वपूर्ण फैसलों में सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका निर्णायक रहती है। उनके अनुसार,जब निर्णय लेने वाले लोगों पर जनता के प्रति जवाबदेही का दबाव कम होता है,तो सुरक्षा संकट राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक साधन बन सकते हैं।
बेदी ने कहा कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना को समझने के लिए सेना की भूमिका पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने यह तर्क भी रखा कि जिन लोगों के पास वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति होती है,उनकी जवाबदेही और उन फैसलों के परिणामों के बीच संबंध स्पष्ट होना चाहिए। यह टिप्पणी पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था को लेकर भारत के दृष्टिकोण को सामने रखती है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की पाकिस्तान यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौरान सेना प्रमुख असीम मुनीर से हुई मुलाकात को भी इस संदर्भ में देखा जा सकता है। बेदी ने इसे पाकिस्तान में सैन्य नेतृत्व की भूमिका का उदाहरण बताया। हालाँकि,किसी राजनयिक मुलाकात को लेकर अलग-अलग पक्षों की व्याख्या अलग हो सकती है,लेकिन भारत के प्रतिनिधि ने इसका इस्तेमाल पाकिस्तान की सत्ता संरचना पर अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया।
बेदी ने भारत की ओर से सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि यह समझौता आपसी विश्वास और सहयोग की भावना पर आधारित था,लेकिन भारत के अनुसार पाकिस्तान ने इन मूल सिद्धांतों को कमजोर किया। इसी संदर्भ में भारत ने संधि को स्थगित करने के अपने फैसले का पक्ष रखा।
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच जल संसाधनों के बँटवारे से जुड़ा महत्वपूर्ण समझौता रही है। दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ यह मुद्दा भी विवाद का विषय बना हुआ है। बेदी के बयान से स्पष्ट हुआ कि भारत इस मामले को केवल जल प्रबंधन के रूप में नहीं,बल्कि द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास और सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों के संदर्भ में भी देखता है।
कश्मीर के मुद्दे पर बेदी ने कहा कि पाकिस्तान विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाता रहता है,भले ही संबंधित बैठक का एजेंडा कुछ भी हो। उन्होंने भारत के आधिकारिक रुख को दोहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। साथ ही,उन्होंने पाकिस्तान से उन क्षेत्रों को खाली करने की मांग दोहराई, जिन्हें भारत अपने कब्जे में बताया गया क्षेत्र मानता है।
इस तरह संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में भारत के बयान में आतंकवाद,परमाणु हथियारों की भूमिका,परमाणु प्रसार,पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था और द्विपक्षीय विवादों जैसे कई मुद्दे शामिल रहे। अनमोल शेर बेदी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से यह रेखांकित किया कि भारत अपनी घोषित परमाणु नीति और सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ेगा। उन्होंने परमाणु धमकियों को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई रोकने का उचित साधन मानने से इनकार किया और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से संवेदनशील तकनीक के हस्तांतरण में सावधानी बरतने की अपील की।
भारत के इस रुख का केंद्रीय संदेश यही रहा कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आतंकवाद से जुड़े आरोपों की जाँच,जवाबदेही और परमाणु जोखिमों को कम करने के प्रयास साथ-साथ चलने चाहिए। वहीं,भारत और पाकिस्तान के बीच आतंकवाद,कश्मीर तथा जल समझौते को लेकर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दिए गए बयान दोनों देशों के सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
