संयुक्त राष्ट्र/नई दिल्ली,22 अक्टूबर (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र में दाऊद इब्राहिम के ठिकाने को लेकर पेश की गई एक रिपोर्ट ने भारत और संयुक्त राष्ट्र के विशेष विशेषज्ञ के बीच विवाद खड़ा कर दिया है। भारत ने आतंकवाद और मानवाधिकारों से जुड़े एक विशेष रिपोर्टर की रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि इसमें वांछित आतंकवादी दाऊद इब्राहिम को भारत में रहने वाला बताया गया है,जबकि वह लंबे समय से भारत से बाहर है। भारत का कहना है कि इस तरह की तथ्यात्मक गलतियाँ न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भ्रम पैदा करती हैं,बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रतिष्ठित संस्था की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव रघु पुरी ने बुधवार को इस मामले को उठाते हुए रिपोर्ट की विषयवस्तु और उसे तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। उन्होंने आतंकवाद और मानवाधिकार मामलों के विशेष रिपोर्टर बेन सॉल की ओर से जुलाई में जारी रिपोर्ट की आलोचना की। पुरी ने कहा कि रिपोर्ट में ऐसी गंभीर गलतियां हैं, जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। उनके मुताबिक,रिपोर्ट तैयार करते समय तथ्यों की सही तरीके से जाँच नहीं की गई और संबंधित आधिकारिक जानकारी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
भारत ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति की स्थिति,उसके ठिकाने और उसके खिलाफ जारी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लेख करते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। भारत का तर्क है कि जब किसी रिपोर्ट में किसी वांछित आतंकवादी के संबंध में अधूरी या भ्रामक जानकारी दी जाती है,तो उससे वास्तविक स्थिति की गलत तस्वीर सामने आ सकती है।
बेन सॉल की जुलाई में जारी रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम को आतंकवादी संबंधों वाले भारत-आधारित आपराधिक संगठन डी-कंपनी का प्रमुख बताया गया था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि अल-कायदा से संबंधों के कारण दाऊद इब्राहिम को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया था।
भारत ने रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए भारत-आधारित शब्द पर विशेष आपत्ति जताई है। भारतीय प्रतिनिधि रघु पुरी के अनुसार,इस विवरण को अलग से पढ़ने पर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि दाऊद इब्राहिम भारत में रह रहा है या उसके संगठन का संचालन देश के भीतर से हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रस्तुति वास्तविक परिस्थितियों को स्पष्ट करने के बजाय गलत धारणा पैदा कर सकती है।
पुरी ने कहा कि डी-कंपनी और उसका प्रमुख दाऊद इब्राहिम वर्ष 1993 में भारत में हुए आतंकवादी हमलों के मामलों में वांछित हैं। भारत लंबे समय से दाऊद इब्राहिम की तलाश कर रहा है और उसके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कार्रवाई की माँग करता रहा है। भारतीय पक्ष का कहना है कि रिपोर्ट में इन तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए था,ताकि पाठकों को उसके संबंध में पूरी जानकारी मिल सके।
भारत ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के तहत उपलब्ध आधिकारिक विवरण में दाऊद इब्राहिम से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज हैं। इसके बावजूद विशेष रिपोर्टर की रिपोर्ट में उन तथ्यों को उचित तरीके से शामिल नहीं किया गया। रघु पुरी के अनुसार,रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि दाऊद इब्राहिम भारत के बाहर रहता है और भारतीय एजेंसियाँ उसे लंबे समय से तलाश रही हैं।
उन्होंने इस चूक को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र के विशेष पदों पर काम करने वाले लोगों से निष्पक्षता,तथ्यात्मक सटीकता और जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है। यदि ऐसे पदों पर तैयार की गई रिपोर्ट में गंभीर गलतियाँ रह जाती हैं,तो इससे अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठ सकते हैं।
दाऊद इब्राहिम भारत के सबसे अधिक वांछित अपराधियों में शामिल है। भारत में वर्ष 1993 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद से ही उसका नाम आतंकवाद और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में प्रमुखता से सामने आता रहा है। भारतीय एजेंसियाँ लंबे समय से उसकी गिरफ्तारी के प्रयास कर रही हैं।
भारत के आग्रह पर इंटरपोल ने दाऊद इब्राहिम के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया है। इस नोटिस का उद्देश्य सदस्य देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों को किसी वांछित व्यक्ति का पता लगाने और लागू कानूनी प्रक्रियाओं के तहत उसकी गिरफ्तारी या प्रत्यर्पण की दिशा में कार्रवाई करने में सहयोग देना है। हालाँकि,रेड कॉर्नर नोटिस अपने आप में अंतर्राष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट नहीं होता।
रघु पुरी ने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाते हुए दाऊद इब्राहिम की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घोषित स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दाऊद इब्राहिम वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र की ओर से अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किए जाने से काफी पहले भारत छोड़ चुका था। उनके मुताबिक, भारत से बाहर रहने के दौरान ही उसे अल-कायदा और ओसामा बिन लादेन से संबंधों के आधार पर प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया था।
पुरी ने कहा कि दाऊद इब्राहिम आज भी भारत में वांछित है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में दर्ज जानकारी का हवाला देते हुए उसके ठिकाने से जुड़े विवरण की ओर ध्यान दिलाया। भारतीय प्रतिनिधि का मुख्य तर्क था कि रिपोर्ट में केवल उसके आपराधिक संगठन और आतंकवादी संबंधों का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं था,बल्कि उसके भारत से बाहर रहने की स्थिति को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए था।
भारत का मानना है कि आतंकवाद से संबंधित किसी भी अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज में शब्दों का चयन और तथ्यों की प्रस्तुति बेहद महत्वपूर्ण होती है। किसी संगठन को किसी देश से जोड़ने और उसके प्रमुख के वास्तविक ठिकाने का उल्लेख करने के बीच अंतर है। इसलिए रिपोर्ट तैयार करने वालों को ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जिससे किसी व्यक्ति की मौजूदगी या गतिविधियों के संबंध में गलत निष्कर्ष निकाले जा सकें।
इस विवाद के बीच विशेष रिपोर्टर बेन सॉल की फंडिंग से संबंधित जानकारी भी चर्चा में आई है। निगरानी संगठन यूएन वॉच के एक डेटाबेस के अनुसार,सॉल को चीन से एक लाख पचास हजार डॉलर की फंडिंग मिली है। संगठन के मुताबिक,सिडनी विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर और ऑस्ट्रेलियाई रिसर्च काउंसिल के फ्यूचर फेलो रहे सॉल को विभिन्न संस्थानों से कुल मिलाकर लगभग 17 लाख डॉलर का वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ है।
बताए गए वित्तीय सहयोग में उनके विश्वविद्यालय के अलावा अमेरिका के तीन विश्वविद्यालयों तथा स्विट्जरलैंड और स्पेन की संस्थाओं का योगदान भी शामिल है। हालाँकि,किसी विशेषज्ञ को किसी देश या संस्था से वित्तीय सहायता मिलने का तथ्य अपने आप में उसके काम में पक्षपात या अनुचित प्रभाव का प्रमाण नहीं है। ऐसे मामलों में फंडिंग का उद्देश्य,उसकी शर्तें और संबंधित विशेषज्ञ के काम में संभावित हितों के टकराव की स्थिति को अलग-अलग आधारों पर परखना आवश्यक होता है।
विशेष रिपोर्टरों की भूमिका भी इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रक्रियाओं के तहत नियुक्त विशेषज्ञ मानवाधिकारों और संबंधित विषयों पर स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। वे अपनी रिपोर्ट में उपलब्ध जानकारी,संबंधित पक्षों के विवरण और अपने निष्कर्षों को प्रस्तुत करते हैं। वे सामान्य तौर पर संयुक्त राष्ट्र के नियमित कर्मचारियों की तरह वेतनभोगी पद पर कार्य नहीं करते।
भारत ने इस संदर्भ में कहा कि विशेष रिपोर्टरों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय ईमानदारी,निष्पक्षता और पारदर्शिता के उच्चतम मानकों का पालन करें। रघु पुरी ने विशेष रिपोर्टर के कार्यालय को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्टों पर भी चिंता जताई और कहा कि ऐसे पदों पर काम करने वालों को अपने काम की विश्वसनीयता बनाए रखनी चाहिए।
भारत की आपत्ति का केंद्र यह है कि मानवाधिकारों से संबंधित रिपोर्टों में आतंकवाद के मामलों को प्रस्तुत करते समय तथ्यों को अधूरा या भ्रामक रूप में नहीं दिखाया जाना चाहिए। भारतीय पक्ष के मुताबिक,किसी भी रिपोर्ट का मूल्यांकन उसकी निष्पक्षता और तथ्यात्मक सटीकता के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल उसके विषय या निष्कर्षों के आधार पर।
भारत ने कहा- मानवाधिकारों के नाम पर आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता
रघु पुरी ने अपने संबोधन में आतंकवाद और मानवाधिकारों के बीच संबंधों पर भी भारत का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों का ढांचा आतंकवादियों या कट्टरपंथ और उग्रवाद को बढ़ावा देने वालों के लिए शरणस्थली नहीं बन सकता। उनके मुताबिक, आतंकवाद को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए।
भारत लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी और समन्वित कार्रवाई की मांग करता रहा है। भारतीय पक्ष का कहना है कि आतंकवाद से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को स्पष्ट मानदंड अपनाने चाहिए और किसी भी देश या संगठन के मामले में तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।
पुरी की टिप्पणी इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत चाहता है कि आतंकवाद से संबंधित रिपोर्टों में संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ उपलब्ध आधिकारिक जानकारी, प्रतिबंधों की स्थिति और उनके ठिकाने से जुड़े तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत किया जाए। भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, गलत जानकारी के कारण आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की गंभीरता प्रभावित हो सकती है।
इस मामले में विवाद केवल दाऊद इब्राहिम के ठिकाने तक सीमित नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया,उनकी जवाबदेही और तथ्यात्मक गलतियों को सुधारने की आवश्यकता जैसे मुद्दों को भी सामने लाता है। ऐसी रिपोर्टों का उपयोग सरकारों, शोधकर्ताओं और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से किया जा सकता है, इसलिए उनकी भाषा और तथ्यों की सटीकता का विशेष महत्व है।
संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान रघु पुरी ने पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का मुद्दा उठाए जाने पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भारत के खिलाफ लगाए जाने वाले आरोप संकीर्ण राजनीतिक हितों से प्रेरित हैं। उनके मुताबिक,पाकिस्तान की ओर से इन क्षेत्रों को लेकर की जाने वाली टिप्पणियाँ वास्तविक तथ्यों के बजाय राजनीतिक प्रचार का हिस्सा हैं।
पुरी ने पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के खिलाफ इस तरह के आरोप वहाँ की सेना की ओर से लगाए जा रहे हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत की स्थिति दोहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख देश के अभिन्न अंग हैं और हमेशा रहेंगे।
भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। भारत लगातार कहता आया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उसके अभिन्न हिस्से हैं, जबकि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में पुरी की टिप्पणी इसी पुरानी कूटनीतिक तनातनी के बीच आई है।
भारतीय प्रतिनिधि ने दाऊद इब्राहिम से जुड़ी रिपोर्ट पर आपत्ति और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख पर भारत का पक्ष रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर तथ्यात्मक सटीकता की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत का कहना है कि आतंकवाद,मानवाधिकार और क्षेत्रीय विवादों जैसे संवेदनशील विषयों पर किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले उपलब्ध आधिकारिक तथ्यों की पूरी जाँच की जानी चाहिए।
दाऊद इब्राहिम के ठिकाने को लेकर उठे इस विवाद ने संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और स्वतंत्र विशेषज्ञों की जवाबदेही पर बहस को फिर सामने ला दिया है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की तथ्यात्मक चूक को सामान्य गलती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही,भारतीय पक्ष ने उम्मीद जताई है कि संयुक्त राष्ट्र के विशेष पदों पर कार्यरत विशेषज्ञ अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय निष्पक्षता,पारदर्शिता और सटीकता के मानकों का पालन करेंगे,ताकि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं पर लोगों का भरोसा बना रहे।
