बेसल,28 अक्टूबर (युआईटीवी)- स्विट्जरलैंड के दिग्गज टेनिस खिलाड़ी स्टेन वावरिंका ने अपने दो दशक से अधिक लंबे पेशेवर करियर को अलविदा कह दिया है। 41 वर्षीय वावरिंका ने घरेलू टूर्नामेंट स्विस इंडोर्स बेसल में चेक गणराज्य के जिरी लेहेका के खिलाफ हार के बाद टेनिस से संन्यास लेने का फैसला किया। अपनी दमदार खेल शैली और एक हाथ के बैकहैंड के लिए दुनिया भर में पहचान बनाने वाले वावरिंका ने अपने करियर में कई ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कीं। तीन ग्रैंड स्लैम एकल खिताब,ओलंपिक स्वर्ण पदक और डेविस कप ट्रॉफी उनके शानदार सफर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं।
वावरिंका का करियर ऐसे दौर में रहा,जब पुरुष टेनिस पर रोजर फेडरर,राफेल नडाल और नोवाक जोकोविच का दबदबा था। इन तीनों दिग्गजों के बीच अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था,लेकिन वावरिंका ने बड़े मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन कर साबित किया कि वह दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उनके करियर की खास बात यह रही कि उन्होंने अपने तीनों ग्रैंड स्लैम एकल खिताब उस समय दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी को हराकर जीते।
स्टेन वावरिंका ने वर्ष 2014 में अपने करियर का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीता। उन्होंने ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में स्पेन के राफेल नडाल को हराकर खिताब अपने नाम किया। इस जीत ने उन्हें विश्व टेनिस में एक नई पहचान दिलाई। नडाल जैसे दिग्गज खिलाड़ी के खिलाफ मिली सफलता उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई और उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
इसके बाद वर्ष 2015 में वावरिंका ने फ्रेंच ओपन में शानदार प्रदर्शन किया। फाइनल मुकाबले में उन्होंने सर्बिया के नोवाक जोकोविच को हराकर दूसरी बार ग्रैंड स्लैम ट्रॉफी जीती। जोकोविच उस समय विश्व टेनिस के सबसे मजबूत खिलाड़ियों में शामिल थे। उनके खिलाफ वावरिंका की जीत को उनके करियर के यादगार प्रदर्शनों में गिना जाता है।
वर्ष 2016 में वावरिंका ने एक बार फिर जोकोविच को मात देकर अपनी क्षमता साबित की। इस बार उन्होंने अमेरिकी ओपन के फाइनल में सर्बियाई खिलाड़ी को हराकर तीसरा ग्रैंड स्लैम एकल खिताब जीता। लगातार बड़े टूर्नामेंटों में शीर्ष खिलाड़ियों को हराने की उनकी क्षमता ने उन्हें पुरुष टेनिस के सबसे खतरनाक प्रतिद्वंद्वियों में शामिल कर दिया। इन तीनों उपलब्धियों ने वावरिंका को उन चुनिंदा खिलाड़ियों की श्रेणी में पहुँचाया,जिन्होंने फेडरर,नडाल और जोकोविच के दबदबे वाले दौर में भी ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर अपनी अलग जगह बनाई।
वावरिंका ने अपने पेशेवर करियर में टूर स्तर के 590 मुकाबलों में जीत दर्ज की। इसके अलावा उन्होंने 16 टूर स्तर के खिताब अपने नाम किए। वर्ष 2014 उनके करियर के सबसे यादगार वर्षों में से एक रहा,जब उन्होंने पहली बार ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने के साथ विश्व रैंकिंग में भी बड़ी छलांग लगाई। इसी वर्ष वह एटीपी एकल रैंकिंग में करियर के सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान पर पहुंचे।
वावरिंका की उपलब्धियों में वर्ष 2014 में मोंटे कार्लो में जीता गया एटीपी मास्टर्स 1000 खिताब भी शामिल है। उन्होंने फाइनल में अपने हमवतन और महान खिलाड़ी रोजर फेडरर को हराकर यह ट्रॉफी जीती थी। यह उनके करियर का एकमात्र मास्टर्स 1000 खिताब रहा,लेकिन इस जीत ने बड़े मंच पर उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता को एक बार फिर उजागर किया।
वावरिंका की पहचान सिर्फ उनके खिताबों तक सीमित नहीं रही। उनका एक हाथ का बैकहैंड टेनिस जगत में काफी चर्चित रहा। उनकी ताकतवर शॉट लगाने की क्षमता, कोर्ट पर आक्रामक अंदाज और दबाव के क्षणों में वापसी करने का जज्बा उन्हें अन्य खिलाड़ियों से अलग बनाता था। बड़े मुकाबलों में उनका प्रदर्शन अक्सर दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता था।
ग्रैंड स्लैम खिताबों के अलावा वावरिंका ने स्विट्जरलैंड के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं। वर्ष 2008 में चीन की राजधानी बीजिंग में आयोजित ओलंपिक खेलों में उन्होंने रोजर फेडरर के साथ पुरुष युगल स्पर्धा में हिस्सा लिया। दोनों स्विस खिलाड़ियों की जोड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता। यह उपलब्धि वावरिंका के करियर के सबसे खास पलों में से एक रही।
इसके बाद वर्ष 2014 में वावरिंका और फेडरर ने स्विट्जरलैंड को उसका पहला डेविस कप खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इस सफलता ने राष्ट्रीय टीम के लिए वावरिंका के योगदान को और महत्वपूर्ण बना दिया। व्यक्तिगत स्तर पर ग्रैंड स्लैम जीतने के साथ-साथ देश के लिए प्रमुख टीम प्रतियोगिता का खिताब जीतना उनके करियर की उपलब्धियों को और व्यापक बनाता है।
अपने संन्यास के बारे में बात करते हुए वावरिंका ने कहा कि पिछले 20 वर्षों में एक खिलाड़ी के रूप में उन्हें लेकर लोगों की अलग-अलग राय रही,लेकिन उनका अपना लक्ष्य हमेशा पूरी क्षमता के साथ खेलना रहा। उन्होंने बताया कि वह हर मुकाबले में अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहते थे,लगातार संघर्ष करना चाहते थे और अपने करियर में किसी तरह का पछतावा नहीं रखना चाहते थे।
वावरिंका के मुताबिक,अपने प्रति,प्रतिद्वंद्वी के प्रति,टूर्नामेंट और प्रशंसकों के प्रति सम्मान बनाए रखना उनके लिए हमेशा सबसे महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने कहा कि दो दशक से अधिक समय तक यही सोच उनके खेल का आधार बनी रही। उनके अनुसार,खेल को बिना पछतावे के छोड़ने का यही एकमात्र तरीका है।
