दुमका में शुरू हुआ ऐतिहासिक राजकीय हिजला मेला, एक मिथ की वजह से कोई मंत्री-नेता नहीं करते इसका उद्घाटन

रांची, 25 फरवरी (युआईटीवी/आईएएनएस)| जिस जलसा-मेला-प्रदर्शनी में हजारों लोग इकट्ठा हों तो भला कौन मंत्री-नेता-अफसर मुख्य अतिथि बनने या उद्घाटन करने जैसा मौका चूकना चाहेगा, लेकिन झारखंड में 133 साल पुराने ऐतिहासिक और प्रसिद्ध हिजला मेला के साथ ऐसा मिथ जुड़ गया है कि नेता-मंत्री इसके उदघाटन से दूर रहना चाहते हैं। झारखंड की उपराजधानी दुमका में मयूराक्षी नदी के तट पर यह राजकीय शुक्रवार 24 फरवरी से शुरू हो गया, लेकिन इसके उदघाटन के लिए कोई मंत्री या बड़ा नेता उपलब्ध नहीं हुआ। ग्राम प्रधान सुनीराम हांसदा ने फीता काटकर इस राजकीय मेले का उद्घाटन किया।

दरअसल तीन दशक पहले जब यह इलाका संयुक्त बिहार का हिस्सा था, तब राज्यपाल, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री इस मेले का उद्घाटन किया करते थे। धीरे-धीरे यह मिथ स्थापित हो गया कि जिसने भी इसका उदघाटन किया, उसकी कुर्सी खतरे में पड़ गई। मसलन 1988 में बिहार के तत्कालीन सीएम बिंदेश्वरी दुबे ने इस मेले का उद्घाटन किया था और कुछ महीने बाद ही उनकी सीएम की कुर्सी चली गई थी। उनके बाद भागवत झा आजाद बिहार के सीएम बने और मेले का उद्घाटन करने के कुछ वक्त बाद उन्हें भी इस पद से हटना पड़ा। फिर सत्येंद्र नारायण सिंह बिहार के नए सीएम हुए और उन्हें इस मेले में आने के बाद कुर्सी से बेदखल होना पड़ा। 1989 में डॉ जगन्नाथ मिश्र तीसरी बार बिहार के सीएम बने थे और इस मेले का उद्घाटन करने के तीन महीने बाद वह सीएम नहीं रह पाए।

ऐसे में अब ग्राम प्रधान ही मुख्य अतिथि के तौर पर इसकी शुरूआत करते हैं। हालांकि दुमका के उपायुक्त रविशंकर शुक्ल कहते हैं कि जनजातीय इलाके की ग्राम स्वराज व्यवस्था की महत्ता की वजह से इसका उद्घाटन ग्राम प्रधान से कराया गया।

3 फरवरी 1890 को संथाल परगना के तत्कालीन अंग्रेज उपायुक्त जॉन राबर्ट्स कॉस्टेयर्स के समय इस मेले की परंपरा शुरू हुई थी। मेला लगाने का मकसद शासन के बारे में संथाल इलाके के लोगों का फीडबैक लेना था। जनजातीय समुदायों के मानिंद लोग इस मेले में जुटते थे और इलाके के उन मसलों का यहां निपटारा किया जाता था, जो गांव की पंचायतों में सुलझ नहीं पाता था। कहते हैं कि इसी वजह से इस मेले को अंग्रेजी हुकूमत ने ह्यहिज लॉ नाम दिया था। हालांकि कुछ लोगों की मान्यता है कि हिजला नामक गांव की वजह से इसका यह नाम रखा गया।

बहरहाल, साल दर साल की परंपरा ने इस मेले का संथाल इलाके का सबसे वृहत सांस्कृतिक-सामाजिक आयोजन बना दिया। झारखंड सहित कई राज्यों के लोक कलाकारों और कारीगरों का यहां जुटान होता है। परंपरागत जनजातीय वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच इस बार यह मेला आगामी 3 मार्च तक चलेगा। वर्ष 1975 में संताल परगना के तत्कालीन उपायुक्त गोविंद रामचंद्र पटवर्धन की पहल पर हिजला मेले के आगे जनजातीय शब्द जोड़ दिया गया। वर्ष 2008 में झारखंड सरकार ने इस मेले को महोत्सव के रूप में मनाने का निर्णय लिया और वर्ष 2015 में इसे राजकीय मेले का दर्जा दिया गया। इसके बाद यह मेला राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के रूप में जाना जाता है।

हिजला मेले में साझी विरासत की झलक दिखायी देती है। आम तौर पर माघ फागुन के शुक्ल पक्ष में मनाये जानेवाले इस मेले में बड़ी संख्या में ग्रामीण हिस्सा लेते हैं। मेला न केवल जनजातीय समुदाय बल्कि गैर जनजातीय समुदायों की भी साझी विरासत का दर्शन कराता है। त्रिकूट पर्वत से निकलनेवाली मयूराक्षी नदी तथा पहाड़-पर्वतों के बीच इस मेले का आयोजन इसे अनूठा सौंदर्य प्रदान करता है। यह मेला विविधता से परिपूर्ण है। मेले में खेल-कूद प्रतियोगिताओं के साथ खानपान और मनोरंजन से संबंधित कई तरह की दुकानें लगायी जाती हैं। मेले में सरकार की विविध योजनाओं से लोगों को रुबरु कराने के लिए विभिन्न विभागों की ओर से कई तरह के स्टॉल लगाये जाते हैं। इसके अलावा यहां नृत्य संगीत की कई प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है।

मेले के आयोजन को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य की जनता को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा है कि स्थानीय संस्कृति, इतिहास और सभ्यता को जीवंत करनेवाले इस मेले की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

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