अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ

अमेरिकी हाउस कमेटी ने टीआरएफ को विदेशी आतंकी संगठन घोषित करने के फैसले का किया समर्थन,पाकिस्तान पर बढ़ा अंतर्राष्ट्रीय दबाव

वाशिंगटन,21 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिकी हाउस कमेटी ऑन फॉरेन अफेयर्स ने द रेसिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) को विदेशी आतंकवादी संगठन (एफटीओ) घोषित करने के अमेरिकी विदेश विभाग के फैसले का जोरदार समर्थन किया है। कमेटी ने कहा कि इस संगठन द्वारा किए गए हिंसक और बर्बर कृत्यों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निंदा की जानी चाहिए और दोषियों को हर हाल में न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए। कमेटी ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर लिखा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे सही कहा है। द रेसिस्टेंस फ्रंट एक आतंकवादी संगठन है और इसे यह दर्जा मिलना ही चाहिए,जो लोग निर्दोष नागरिकों की हत्या करते हैं,उन्हें छूट नहीं मिल सकती। उन्हें न्याय का सामना करना ही पड़ेगा।”

यह बयान ऐसे समय में आया है,जब अमेरिकी विदेश विभाग ने हाल ही में टीआरएफ को विदेशी आतंकवादी संगठन (एफटीओ) और विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी (एसडीजीटी) घोषित किया है। यह संगठन पाकिस्तान-आधारित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का सहयोगी माना जाता है। टीआरएफ ने हाल ही में 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली थी। इस हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की मौत हो गई थी। यह हमला 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत में नागरिकों पर हुआ सबसे घातक आतंकी हमला माना जा रहा है।

अमेरिकी विदेश विभाग ने अपने बयान में कहा कि यह कदम राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा के प्रति ट्रंप प्रशासन की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। विभाग के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप की पहलगाम हमले के दोषियों को सख्त सजा दिलाने की प्रतिबद्धता इस कार्रवाई के पीछे की मुख्य वजह है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ इस तरह की सख्त कार्रवाइयां ही वैश्विक आतंकवाद को समाप्त करने का रास्ता साफ कर सकती हैं।

टीआरएफ का नाम पहली बार 2019 में सामने आया था,जब इसे लश्कर-ए-तैयबा का एक नया चेहरा माना गया। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और लश्कर-ए-तैयबा ने मिलकर इस संगठन को सक्रिय किया,ताकि अंतर्राष्ट्रीय दबाव से बचा जा सके और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को जारी रखा जा सके। टीआरएफ के आतंकवादी ज्यादातर भारतीय मुसलमान युवाओं को भर्ती करते हैं,ताकि पाकिस्तान की भूमिका को छुपाया जा सके,लेकिन भारत लगातार इस बात को रेखांकित करता रहा है कि टीआरएफ और अन्य आतंकी संगठन सीधे पाकिस्तान की धरती से संचालित होते हैं और उन्हें वहाँ की सरकार और सेना से समर्थन मिलता है।

अमेरिका द्वारा टीआरएफ को एफटीओ और एसडीजीटी घोषित किए जाने के बाद पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ना तय है। भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर लश्कर-ए-तैयबा और उसके सहयोगी संगठनों को पनाह देने और आर्थिक सहायता देने का आरोप लगाता रहा है। इस नए कदम के बाद पाकिस्तान को वैश्विक मंचों पर एक बार फिर कठघरे में खड़ा किया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में पहले भी भारत ने कई बार पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाने की माँग की थी,लेकिन अब अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की खुली कार्रवाई से इस दिशा में नई ऊर्जा मिलेगी।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी कदम का स्वागत किया है। भारत ने कहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है और इससे पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश गया है कि आतंकी संगठनों को समर्थन देने की नीति अब और ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी। भारत ने उम्मीद जताई है कि अन्य देश भी इसी तरह के कदम उठाएँगे,ताकि सीमा पार से जारी आतंकवाद को खत्म किया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से न केवल पाकिस्तान पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा,बल्कि इससे कश्मीर में सक्रिय आतंकी नेटवर्क को भी झटका लगेगा। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान अब पाकिस्तान से उसके आतंकी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट माँग सकते हैं। इसके अलावा,अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद भारत को आतंकवाद विरोधी अभियानों में और अधिक वैश्विक समर्थन मिलने की संभावना है।

अभी यह देखना बाकी है कि पाकिस्तान इस दबाव का कैसे जवाब देता है। क्या वह वास्तव में इन आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करेगा या केवल अंतर्राष्ट्रीय दबाव को कम करने के लिए दिखावटी कदम उठाएगा,लेकिन इतना तो तय है कि द रेसिस्टेंस फ्रंट को लेकर अमेरिकी रुख ने एक बार फिर पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत को एक मजबूत सहयोगी मिला है।