मदुरै,7 अप्रैल (युआईटीवी)- तमिलनाडु के बहुचर्चित सथानकुलम कस्टोडियल टॉर्चर और मौत मामले में न्यायपालिका ने एक सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 9 दोषी पुलिसकर्मियों को फाँसी की सजा दी है। मदुरै जिला एवं सत्र न्यायालय के प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने यह निर्णय सुनाया,जिसने पूरे देश में पुलिस हिरासत में होने वाले अत्याचारों पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
यह मामला वर्ष 2020 में तमिलनाडु के सथानकुलम कस्बे में हुई एक दिल दहला देने वाली घटना से जुड़ा है,जिसमें एक पिता-पुत्र की पुलिस हिरासत में कथित तौर पर बेरहमी से पिटाई के बाद मौत हो गई थी। मृतकों की पहचान जयराज और उनके बेटे बेन्निक्स के रूप में हुई थी। इस घटना ने न केवल तमिलनाडु,बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
घटना 19 जून 2020 की है,जब सथानकुलम पुलिस ने जयराज को कथित तौर पर बिना उचित कारण के हिरासत में लिया था। इसके बाद उनके बेटे बेन्निक्स,जो अपने पिता के बारे में जानकारी लेने पुलिस स्टेशन पहुँचे थे,को भी बहस के बाद हिरासत में ले लिया गया। आरोप है कि 19 और 20 जून की दरम्यानी रात दोनों को पुलिसकर्मियों ने अमानवीय तरीके से प्रताड़ित किया और बेरहमी से पीटा।
गंभीर चोटों के कारण बेन्निक्स की 22 जून 2020 को मौत हो गई,जबकि उनके पिता जयराज ने 23 जून को दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद देशभर में आक्रोश फैल गया था और पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठने लगे थे। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक न्याय की माँग तेज हो गई थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए तमिलनाडु सरकार ने जाँच को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया था। सीबीआई ने तेजी से कार्रवाई करते हुए विस्तृत जाँच की और महज 90 दिनों के भीतर 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी। जाँच एजेंसी ने सबूतों और गवाहों के आधार पर यह साबित किया कि दोनों की मौत पुलिस अत्याचार का परिणाम थी।
इस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने भी स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ही टिप्पणी की थी कि यह मामला प्रथम दृष्टया हत्या का प्रतीत होता है। साथ ही,अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि मामले में सबूतों को नष्ट करने की कोशिश की गई। इसके बाद सीबीआई जाँच से पहले सीबी-सीआईडी को भी जाँच के निर्देश दिए गए थे।
अदालत ने जिन 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया है,उनमें सथानकुलम के तत्कालीन थाना प्रभारी (एसएचओ) एस श्रीधर,सब-इंस्पेक्टर पी रघुगनेश,सब-इंस्पेक्टर के बालकृष्णन,हेड कांस्टेबल एस मुरुगन,कांस्टेबल एस चेल्लादुरई,कांस्टेबल एम मुथुराजा, हेड कांस्टेबल ए समदुरई,कांस्टेबल एक्स थॉमस फ्रांसिस और कांस्टेबल एस वेलुमुथु शामिल हैं। अदालत ने इन सभी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 342 (गैरकानूनी हिरासत) और 201 (सबूत मिटाने) के तहत दोषी पाया।
फैसला सुनाए जाने के बाद अदालत परिसर में भावनात्मक दृश्य देखने को मिला। जब दोषी पुलिसकर्मियों को कोर्ट से केंद्रीय कारागार ले जाया जा रहा था,तब उनके परिवार के सदस्य रोते-बिलखते नजर आए। यह दृश्य इस मामले के मानवीय पक्ष को भी उजागर करता है,जहाँ एक ओर पीड़ित परिवार को न्याय मिला,वहीं दूसरी ओर दोषियों के परिवार भी इस सजा से प्रभावित हुए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा। पुलिस हिरासत में अत्याचार और मौत के मामलों में अक्सर न्याय मिलने में लंबा समय लगता है,लेकिन इस मामले में अदालत ने सख्ती दिखाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
यह फैसला उन सभी मामलों के लिए भी एक चेतावनी है, जहाँ कानून की रक्षा करने वाले ही कानून का उल्लंघन करते हैं। अदालत का यह निर्णय न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय है,बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक संदेश है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
सथानकुलम कांड पहले ही देशभर में पुलिस सुधारों की माँग को लेकर एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। अब इस फैसले के बाद उम्मीद की जा रही है कि पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए और ठोस कदम उठाए जाएंगे।
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था की मजबूती और निष्पक्षता को दर्शाता है। जयराज और बेन्निक्स के परिवार को भले ही अपने प्रियजनों को खोने का दुख हमेशा रहेगा,लेकिन अदालत के इस फैसले ने यह साबित कर दिया है कि न्याय देर से सही,लेकिन मिलता जरूर है।
