अरविंद केजरीवाल और मोहन भागवत (तस्वीर क्रेडिट@LegendEconomist)

अरविंद केजरीवाल ने नए साल पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर भाजपा को लेकर ये सवाल पूछे

नई दिल्ली,1 जनवरी (युआईटीवी)- दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत को नए साल पर एक पत्र लिखी। उन्होंने इस पत्र में भाजपा को लेकर कई सवाल उठाए हैं। अरविंद केजरीवाल ने इस पत्र में भाजपा द्वारा हाल के दिनों में किए गए कुछ कार्यों पर सवाल खड़े किए और पूछा कि क्या आरएसएस इन कार्रवाइयों का समर्थन करता है। केजरीवाल ने मोहन भागवत से पूछा कि, “भा​जपा ने जो भी गलत किया है,क्या आरएसएस उसका समर्थन करता है?” इसके बाद उन्होंने भाजपा नेताओं पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे खुलेआम पैसे बाँट रहे हैं,क्या आरएसएस वोट खरीदने की इन कार्रवाइयों का समर्थन करता है? इसके साथ ही उन्होंने पूछा कि क्या आरएसएस को नहीं लगता कि बड़े स्तर पर दलितों और पूर्वांचलियों के वोट काटे जा रहे हैं? क्या आरएसएस को यह सही लगता है कि इस तरह के कामों से जनतंत्र कमजोर हो रहा है?

अरविंद केजरीवाल ने मोहन भागवत से यह सवाल भी किया कि क्या आरएसएस को यह नहीं लगता कि भाजपा जनतंत्र को कमजोर कर रही है? केजरीवाल ने इस पत्र के माध्यम से भाजपा की कुछ नीतियों और कार्यों पर आरएसएस से जवाब की माँग की है। उनका मानना है कि आरएसएस को इन मुद्दों पर स्पष्ट राय देनी चाहिए,क्योंकि देश की राजनीति में आरएसएस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इससे पहले,दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना को दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी ने एक पत्र लिखकर मंदिरों और बौद्ध धार्मिक स्थलों को तोड़े जाने का मुद्दा उठाया था। आतिशी ने उपराज्यपाल पर आरोप लगाया कि दिल्ली में स्थित मंदिरों और बौद्ध धार्मिक स्थलों को उपराज्यपाल के आदेश पर तोड़ने के निर्देश दिए गए थे। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि दिल्ली में किसी भी मंदिर या धार्मिक स्थल को तोड़ा नहीं जाना चाहिए। उनका कहना था कि बौद्ध धार्मिक स्थलों से दलित समुदाय की आस्था जुड़ी हुई है और ऐसे किसी भी स्थल को तोड़ने से लोगों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं।

आतिशी ने यह भी आरोप लगाया कि धार्मिक कमिटी ने बिना मुख्यमंत्री को जानकारी दिए मंदिरों को तोड़ने की फाइल उपराज्यपाल को भेजी थी,जो संविधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन था। उनका कहना था कि इस तरह के कदम से दिल्ली की धार्मिक समरसता पर असर पड़ सकता है। उन्होंने उपराज्यपाल से अपील की कि दिल्ली के धार्मिक स्थलों की रक्षा की जाए और इस मुद्दे को संवेदनशीलता से निपटाया जाए।

इससे पहले,सोमवार को भी आतिशी ने उपराज्यपाल वीके सक्सेना की एक टिप्पणी पर पत्र लिखकर जवाब दिया था। उपराज्यपाल ने अरविंद केजरीवाल द्वारा आतिशी को “कामचलाऊ मुख्यमंत्री” करार दिए जाने पर चिंता व्यक्त की थी और इसे “संविधान में निहित लोकतांत्रिक भावना और मूल्यों की घोर अवहेलना” बताया था। मुख्यमंत्री आतिशी ने इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि यह टिप्पणी पूरी तरह से गलत थी और इससे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अपमान हो रहा था,जिन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री नियुक्त किया। उन्होंने यह भी कहा कि यह उपराज्यपाल का भी अपमान है,क्योंकि वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि दिल्ली की राजनीति में विवाद गहरा रहा है, खासकर धार्मिक स्थलों और संवैधानिक मुद्दों को लेकर। मुख्यमंत्री केजरीवाल और आतिशी के द्वारा उठाए गए सवाल और आरोपों से यह प्रतीत होता है कि दिल्ली की सरकार और उपराज्यपाल के बीच तालमेल में खटास आ गई है। इन घटनाओं ने दिल्ली में राजनीतिक वातावरण को और भी तनावपूर्ण बना दिया है। अब यह देखना होगा कि इन मुद्दों पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या कोई ठोस समाधान निकलता है।