वाशिंगटन,28 जनवरी (युआईटीवी)- वैश्विक राजनीति और कूटनीति के बदलते परिदृश्य में भारत की भूमिका को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर लगातार चर्चाएँ होती रही हैं। इसी कड़ी में प्रसिद्ध अमेरिकी सिंगर और एक्ट्रेस मैरी मिलबेन ने भारत और अमेरिका के संबंधों,नेतृत्व की शैली और वैश्विक संतुलन पर एक विस्तृत और सशक्त दृष्टिकोण साझा किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत और अमेरिका के बीच जब रिश्तों में तनाव के संकेत दिखे,उस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस धैर्य,संयम और दूरदर्शिता के साथ परिस्थितियों को सँभाला,उसने न केवल भारत की स्थिति को मजबूत किया,बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत वैश्विक प्रतिष्ठा को भी नई ऊँचाई दी।
मैरी मिलबेन के अनुसार,आज की दुनिया में नेतृत्व केवल ताकत दिखाने या तीखे बयानों तक सीमित नहीं है,बल्कि असली नेतृत्व वही है जो दबाव में भी संतुलन बनाए रखे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति भावनात्मक प्रतिक्रिया पर आधारित नहीं रही,बल्कि सोच-समझकर और दीर्घकालिक रणनीति के तहत आगे बढ़ी। यही कारण है कि वैश्विक मंच पर उन्हें एक गंभीर,भरोसेमंद और सम्मानित नेता के रूप में देखा जा रहा है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक व्यक्तिगत समझ और संवाद का इतिहास रहा है। हालाँकि,मैरी मिलबेन का मानना है कि किसी भी सच्चे रिश्ते में आत्ममंथन और गलती स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। उनके शब्दों में,दोस्ती केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं होती,बल्कि जब परिस्थितियां गलत दिशा में जाएँ,तब सुधार की पहल करना भी उतना ही जरूरी होता है।
मैरी मिलबेन ने खुलकर कहा कि अमेरिका में बड़ी संख्या में लोग ऐसे हैं,जो भारत के प्रति हाल के समय में अपनाए गए कठोर रवैये से सहमत नहीं हैं। उन्होंने खुद को भी उन्हीं लोगों में शामिल बताया। उनका कहना है कि भारत जैसे मित्र और सहयोगी देश के साथ संबंधों में सम्मान और सहयोग की भावना होनी चाहिए,न कि दबाव और टकराव की। उन्होंने यह भी कहा कि वह लगातार राष्ट्रपति ट्रंप से आग्रह करती रही हैं और आगे भी करती रहेंगी कि भारत के साथ दोस्ती और साझेदारी के आधार पर व्यवहार किया जाए।
उनके अनुसार,भारत और अमेरिका के रिश्ते केवल सामरिक या आर्थिक हितों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश लोकतंत्र,स्वतंत्रता और संप्रभुता जैसे साझा मूल्यों से जुड़े हुए हैं। यही साझा मूल्य इन रिश्तों को गहराई और मजबूती प्रदान करते हैं। मैरी मिलबेन का मानना है कि यदि इन मूल्यों को नजरअंदाज किया गया,तो दोनों देशों के बीच बना विश्वास कमजोर पड़ सकता है।
अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए मैरी मिलबेन ने बताया कि वर्ष 2026 उनके लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा,क्योंकि तब अमेरिकी राष्ट्रपति पद के साथ उनके जुड़ाव के 20 वर्ष पूरे होंगे। उन्होंने याद किया कि यह सफर 2006 में शुरू हुआ था,जब उन्हें राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया गया था। इसके बाद उन्होंने लगातार पाँच अमेरिकी राष्ट्रपतियों और उनके प्रशासन के लिए प्रस्तुतियाँ दीं और उनके साथ निकटता से काम किया।
मैरी मिलबेन ने इस लंबे सफर को ईश्वर का आशीर्वाद बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति पद के साथ उनके जुड़ाव ने उन्हें न केवल अमेरिका की राजनीति को करीब से देखने का अवसर दिया,बल्कि दुनिया के कई बड़े नेताओं से मिलने और उन्हें समझने का मौका भी मिला। उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग,रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे वैश्विक नेताओं के साथ अपने संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि हर नेता की कार्यशैली और दृष्टिकोण अलग होता है,लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की सोच और मूल्यों ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया है।
मैरी मिलबेन ने बताया कि वह वर्षों से प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर प्रशंसा करती रही हैं। उनके अनुसार,प्रधानमंत्री की नैतिकता,विनम्रता,भारतीय जनता के प्रति करुणा और नवाचार के प्रति उनकी समझ उन्हें एक अलग पहचान देती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी केवल सत्ता में रहने वाले नेता नहीं हैं,बल्कि वे समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने की सोच रखते हैं।
हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों को लेकर खींचतान देखने को मिली। इस संदर्भ में मैरी मिलबेन ने प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका की विशेष रूप से सराहना की। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक दबाव और वैश्विक अनिश्चितता के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने न तो जल्दबाजी दिखाई और न ही आक्रामक प्रतिक्रिया दी। इसके बजाय उन्होंने संतुलित और रणनीतिक कूटनीति को प्राथमिकता दी।
मैरी मिलबेन के शब्दों में,दबाव की परिस्थितियों में भी प्रधानमंत्री मोदी का गरिमामय संयम उन्हें आज की भू-राजनीति में सबसे सम्मानित नेताओं में शामिल करता है। उन्होंने कहा कि जब पिछले वर्ष अमेरिका की नीति में भारत के प्रति अचानक बदलाव देखने को मिला,तब भी प्रधानमंत्री मोदी ने संयम नहीं छोड़ा। ऊँचे शुल्क लगाने की धमकियों के बीच भारत ने अपने विकल्प खुले रखे और वैश्विक स्तर पर नए साझेदारों के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
उन्होंने यह भी कहा कि कई बार प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी को कमजोरी समझ लिया जाता है,जबकि वास्तव में वही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उनका मानना है कि बिना शोर किए,शांत रहकर रणनीति बनाना और सही समय पर निर्णय लेना प्रधानमंत्री मोदी की नेतृत्व शैली का अहम हिस्सा है। इसी रणनीति के तहत भारत ने चीन,रूस और यूरोप के साथ अपने संबंधों को और अधिक मजबूत किया।
मैरी मिलबेन ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल में हुए व्यापार समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह केवल आर्थिक समझौता नहीं है,बल्कि वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत भी है। उनके अनुसार,यह समझौता दिखाता है कि आज भी संप्रभुता,सुरक्षा और स्वतंत्रता जैसे मूल्य लोकतंत्र और व्यापार की बुनियाद बने हुए हैं। उन्होंने इसे भारत की संतुलित और दूरदर्शी विदेश नीति का परिणाम बताया।
व्हाइट हाउस के साथ अपने वर्षों के जुड़ाव को याद करते हुए मैरी मिलबेन ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए काम करते हुए उन्होंने एक अहम बात सीखी है—दुनिया में कोई भी देश अकेले अपनी महाशक्ति की स्थिति को लंबे समय तक बनाए नहीं रख सकता। सच्चे मित्र और भरोसेमंद सहयोगी किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनके अनुसार,यदि अमेरिका अपने सहयोगियों से दूरी बनाएगा,तो उसकी वैश्विक भूमिका कमजोर पड़ सकती है।
भारत को सीधे संबोधित करते हुए मैरी मिलबेन ने कहा कि अमेरिका भारत का मित्र है और यह मित्रता दोनों देशों के हित में है। उन्होंने दोहराया कि वह राष्ट्रपति ट्रंप से लगातार कहती रहेंगी कि भारत के साथ रिश्ते दोस्ती,सम्मान और साझेदारी पर आधारित होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका, दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते,एक साझा इतिहास और जिम्मेदारी निभाते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति से सीधे अपील करते हुए मैरी मिलबेन ने भावुक लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब बदलाव का समय है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी से माफी मांगना और भारत के साथ रिश्तों को दोबारा मजबूत करना न केवल भारत-अमेरिका संबंधों के लिए जरूरी है,बल्कि अमेरिका की वैश्विक साख के लिए भी अहम है। उन्होंने अमेरिका में रहने वाले लाखों भारतीय मूल के नागरिकों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन रिश्तों का असर सीधे उन पर भी पड़ता है।
मैरी मिलबेन का मानना है कि यदि अमेरिका वास्तव में वैश्विक शांति का नेतृत्व करना चाहता है,तो उसे भारत,यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों के साथ सहयोग और शांति का रास्ता अपनाना होगा। उनके अनुसार,नीति में सकारात्मक बदलाव कमजोरी नहीं,बल्कि साहस और आत्मविश्वास का संकेत होता है।
अंत में उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका ने रक्षा,प्रौद्योगिकी और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा दी है। हालाँकि,व्यापार और नीतिगत मतभेद बने रहे हैं,लेकिन संवाद और आपसी सम्मान के जरिए इन मतभेदों को दूर किया जा सकता है। मैरी मिलबेन के अनुसार,भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में भारत और अमेरिका की साझेदारी तभी मजबूत होगी,जब दोनों देश एक-दूसरे को बराबरी के सहयोगी के रूप में देखें और साझा मूल्यों को प्राथमिकता दें।
