भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब (तस्वीर क्रेडिट@DDNewsOdia)

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की भूमिका पर चर्चा तेज,फिनलैंड राष्ट्रपति ने मध्यस्थता का दिया सुझाव

नई दिल्ली/हेलसिंकी,18 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। इस तनावपूर्ण माहौल में अब भारत की संभावित कूटनीतिक भूमिका को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। अलेक्जेंडर स्टब ने सुझाव दिया है कि भारत इस संकट को कम करने में एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।

ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में अलेक्जेंडर स्टब ने कहा कि वर्तमान स्थिति में सबसे जरूरी कदम तत्काल युद्धविराम यानी सीजफायर है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि वैश्विक समुदाय को दुश्मनी को रोकने और संवाद के रास्ते खोलने पर ध्यान देना चाहिए। इस संदर्भ में उन्होंने भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, “हमें सीजफायर की जरूरत है। मैं सोच रहा हूँ कि क्या भारत इसमें सक्रिय भूमिका निभा सकता है। हमने देखा है कि भारत के विदेश मंत्री ने पहले भी शांति की अपील की है।”

फिनलैंड के राष्ट्रपति की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है,जब भारत लगातार इस संकट पर सक्रिय कूटनीतिक पहल कर रहा है। भारत न केवल स्थिति पर नजर बनाए हुए है,बल्कि संबंधित देशों के साथ संवाद भी बनाए हुए है,ताकि तनाव को कम किया जा सके।

हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में दोनों नेताओं ने क्षेत्र में तेजी से बदलते हालात पर चर्चा की। ईरानी विदेश मंत्री ने भारत को मौजूदा घटनाक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि यह संघर्ष अमेरिका और इजरायल के हमलों का परिणाम है।

अब्बास अराघची ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान अपने आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह संघर्ष जारी रहता है,तो इसके व्यापक क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव हो सकते हैं। इस बयान ने यह संकेत दिया है कि स्थिति अभी और गंभीर हो सकती है।

भारत इस पूरे घटनाक्रम को बेहद सतर्कता से देख रहा है। भारत के लिए पश्चिम एशिया का क्षेत्र कई कारणों से महत्वपूर्ण है। यहाँ न केवल बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं,बल्कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से पूरा होता है।

इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से भी बातचीत की। इस बातचीत में प्रधानमंत्री ने बढ़ते संघर्ष और आम नागरिकों की हो रही मौतों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्र में शांति बनाए रखना बेहद जरूरी है।

नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके अलावा,उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक गतिविधियों का निर्बाध जारी रहना देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में भारत किसी भी तरह के अवरोध को लेकर सतर्क है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की “संतुलित कूटनीति” उसे इस क्षेत्र में एक संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। भारत के अमेरिका,इजरायल और ईरान—तीनों देशों के साथ अच्छे संबंध हैं,जो उसे संवाद के लिए एक विश्वसनीय मंच प्रदान करते हैं। यही कारण है कि अलेक्जेंडर स्टब जैसे अंतर्राष्ट्रीय नेता भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

पश्चिम एशिया में जारी इस तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला पर खतरे ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है,तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

भारत ने हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर शांति और संवाद का समर्थन किया है। एस.जयशंकर ने भी कई बार स्पष्ट किया है कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। यही वजह है कि भारत इस संकट में भी संयमित और संतुलित रुख अपनाए हुए है।

फिलहाल,स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है और किसी भी समय हालात और बिगड़ सकते हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब उन देशों पर टिकी हैं,जो इस संकट को शांत करने में भूमिका निभा सकते हैं। भारत का नाम इस सूची में प्रमुखता से उभर रहा है,जो उसकी बढ़ती वैश्विक साख और कूटनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत वास्तव में इस संघर्ष को कम करने में कोई ठोस भूमिका निभाता है या नहीं। फिलहाल,वैश्विक स्तर पर एक ही माँग जोर पकड़ रही है—तत्काल सीजफायर और शांति की बहाली।