वॉशिंगटन,24 अप्रैल (युआईटीवी)- डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़े और बहुचर्चित कदम के तहत पर्चे वाली दवाओं की कीमतों को कम करने के लिए प्रमुख दवा कंपनियों के साथ व्यापक समझौतों की घोषणा की है। व्हाइट हाउस में दिए गए अपने संबोधन में ट्रंप ने इसे अमेरिका के इतिहास में दवाओं की कीमतों में “सबसे बड़ी कटौती” बताया। उनके अनुसार,इस पहल का उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों को लंबे समय से झेलनी पड़ रही महँगी दवाओं की समस्या से राहत दिलाना है और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाना है।
ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि कई प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियाँ अब “मोस्ट फेवर्ड नेशन” यानी सबसे अनुकूल राष्ट्र मूल्य निर्धारण मॉडल को अपनाने पर सहमत हो गई हैं। इस मॉडल के तहत अमेरिका में दवाओं की कीमतें दुनिया के उन देशों के बराबर या उससे भी कम होंगी,जहाँ ये दवाएँ सबसे सस्ती मिलती हैं। उन्होंने विशेष रूप से रीजेनेरॉन का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी इस व्यवस्था के तहत अपनी दवाएँ देने के लिए तैयार हो गई है। ट्रंप के मुताबिक,इस कदम के बाद दवाओं की कीमतें ऐसे स्तर तक गिर सकती हैं,जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।
इस घोषणा के पीछे ट्रंप का तर्क है कि दशकों से अमेरिकी नागरिकों को दवाओं के लिए दुनिया में सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी उपभोक्ता लंबे समय से इस असंतुलन का सामना कर रहे हैं,जहाँ अन्य देशों की तुलना में उन्हें समान दवाओं के लिए कई गुना अधिक भुगतान करना पड़ता है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि यह नई नीति इस असमानता को दूर करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
इस पहल को समर्थन देते हुए रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर,जो स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के प्रमुख हैं, ने इसे “लंबे समय से जारी लूट” के खिलाफ कार्रवाई करार दिया। उन्होंने आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका,जिसकी वैश्विक आबादी में हिस्सेदारी केवल 4.2 प्रतिशत है,फार्मास्युटिकल उद्योग के लगभग 75 प्रतिशत मुनाफे का स्रोत रहा है। उनके अनुसार,यह स्थिति न केवल आर्थिक रूप से असंतुलित है,बल्कि नैतिक दृष्टि से भी सवाल खड़े करती है।
इसी संदर्भ में मेहमत ओज़,जो सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज के प्रशासक हैं, ने इस नीति के सामाजिक प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अमेरिका में हर तीन में से एक व्यक्ति अक्सर दवाओं की ऊँची कीमतों के कारण उन्हें खरीद नहीं पाता और बिना दवा लिए ही लौट जाता है। उनके अनुसार,नई नीति का मुख्य उद्देश्य इस समस्या को समाप्त करना और हर नागरिक को आवश्यक उपचार उपलब्ध कराना है।
ट्रंप प्रशासन ने कुछ विशेष उदाहरणों के माध्यम से इस नीति के संभावित प्रभाव को भी रेखांकित किया। एक कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करने वाली दवा की कीमत,जो पहले 537 डॉलर थी,अब घटकर 225 डॉलर तक आ सकती है। इसी तरह,वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक लोकप्रिय दवा की कीमत 1,350 डॉलर प्रति माह से घटकर केवल 199 डॉलर प्रति माह तक आने की संभावना जताई गई है। ये आँकड़ें इस बात का संकेत देते हैं कि यदि समझौते पूरी तरह लागू होते हैं,तो आम नागरिकों के स्वास्थ्य खर्च में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
फार्मा उद्योग की ओर से भी इस पहल को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। रीजेनेरॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लियोनार्ड श्लाइफ़र ने कहा कि उनकी कंपनी वैश्विक मूल्य संतुलन के प्रयासों का समर्थन करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कंपनी पर इस समझौते के लिए कोई दबाव नहीं डाला गया,बल्कि वह स्वेच्छा से इसमें शामिल हुई है क्योंकि यह दवाओं की कीमतें कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार,यह सहयोग उद्योग और सरकार के बीच एक नए प्रकार के संबंध का संकेत देता है।
इस घोषणा के साथ ही रीजेनेरॉन ने एक और महत्वपूर्ण पहल की जानकारी दी। कंपनी ने एक दुर्लभ प्रकार के बहरापन के लिए जीन थेरेपी विकसित की है,जिसे पात्र बच्चों को सीमित अवधि के लिए मुफ्त उपलब्ध कराया जाएगा। इस थेरेपी के विकास में शामिल वैज्ञानिक जॉर्ज यानकोपोलोस ने इसे अपने प्रकार की पहली जीन थेरेपी बताया,जो बच्चों को सुनने की क्षमता प्रदान कर सकती है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि इस उपचार के जरिए एक बच्चे ने पहली बार अपनी माँ की आवाज सुनी,जो चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
इस उपचार से लाभान्वित एक बच्चे की माँ सिएरा स्मिथ ने अपने अनुभव को साझा करते हुए इसे “जीवन बदल देने वाला” बताया। उन्होंने कहा कि उनका दो वर्षीय बेटा,जो पहले सुन नहीं सकता था,अब सामान्य रूप से आवाजें सुन पा रहा है। उनके अनुसार,यह परिवर्तन न केवल उनके बच्चे के जीवन में,बल्कि पूरे परिवार के लिए एक नई शुरुआत जैसा है।
इस पूरी पहल का आर्थिक पहलू भी काफी महत्वपूर्ण है। हावर्ड लटनिक,जो वाणिज्य सचिव हैं,ने कहा कि यह नीति केवल दवाओं की कीमतों को कम करने तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को भी बढ़ावा देना है। उन्होंने अनुमान जताया कि इस पहल के परिणामस्वरूप लगभग 448 अरब डॉलर का दवा निर्माण अमेरिका में स्थानांतरित हो सकता है,जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
व्हाइट हाउस के अनुसार,इन समझौतों के तहत अब ब्रांडेड फार्मास्युटिकल बाजार के लगभग 86 प्रतिशत हिस्से को कवर किया जा चुका है और शेष कंपनियों के साथ बातचीत जारी है। प्रशासन को उम्मीद है कि आने वाले समय में और अधिक कंपनियाँ इस पहल में शामिल होंगी,जिससे इसका प्रभाव और व्यापक होगा।
हालाँकि,इस नीति को लेकर कुछ विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने की सलाह भी दी है। उनका मानना है कि कीमतों में इतनी बड़ी कटौती से फार्मा कंपनियों के अनुसंधान और विकास पर असर पड़ सकता है। यदि कंपनियों के मुनाफे में कमी आती है,तो नई दवाओं के विकास की गति धीमी पड़ सकती है। इसके अलावा,वैश्विक बाजार में मूल्य संतुलन बनाए रखना भी एक जटिल चुनौती हो सकता है।
इसके बावजूद,ट्रंप प्रशासन इस नीति को एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। यदि यह पहल सफल होती है,तो यह न केवल अमेरिका के स्वास्थ्य तंत्र को बदल सकती है,बल्कि वैश्विक फार्मा उद्योग में भी एक नई दिशा तय कर सकती है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये समझौते कितनी प्रभावी ढंग से लागू होते हैं और उनका वास्तविक असर आम लोगों के जीवन पर कितना पड़ता है।
