प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप

रूसी तेल पर भारत की सहमति के बाद अमेरिका का बड़ा फैसला: 25 प्रतिशत टैरिफ हटेगा,भारत-अमेरिका व्यापार रिश्तों में नया मोड़

वाशिंगटन,3 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका ने संकेत दिया है कि भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताए जाने के बाद उससे जुड़े 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ को हटा लिया जाएगा। व्हाइट हाउस ने सोमवार को इसकी पुष्टि करते हुए इसे भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा,व्यापार और भू-राजनीतिक सहयोग के लिहाज से एक अहम कदम बताया। यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हाल ही में हुई फोन पर बातचीत के बाद सामने आया है,जिसमें दोनों देशों ने व्यापक व्यापार समझौते पर सहमति जताई है।

व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत द्वारा रूसी तेल आयात समाप्त करने के समझौते के तहत रूसी तेल से जुड़ा 25 प्रतिशत टैरिफ हटा लिया जाएगा। अधिकारी के अनुसार,यह अतिरिक्त शुल्क सीधे तौर पर भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़ा हुआ था और नई दिल्ली की ओर से आयात रोकने की प्रतिबद्धता के बाद इसे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। इस बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि वाशिंगटन अपनी व्यापार नीति को अब ऊर्जा और भू-राजनीतिक उद्देश्यों से और अधिक मजबूती से जोड़ रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की जानकारी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक विस्तृत पोस्ट के जरिए दी। उन्होंने कहा कि इस समझौते के तहत अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर लगाए जाने वाले पारस्परिक टैरिफ को तुरंत 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा। ट्रंप ने इसे द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में एक बड़ा बदलाव करार देते हुए कहा कि यह कदम ऊर्जा सहयोग को मजबूत करने और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

अपने पोस्ट में ट्रंप ने यह भी कहा कि दोनों नेताओं के बीच व्यापार के अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका से,तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से,अधिक तेल आयात करने पर सहमति जताई है। ट्रंप के अनुसार,इससे न केवल भारत-अमेरिका ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा मिलेगा,बल्कि रूस की तेल आय पर भी दबाव पड़ेगा,जो यूक्रेन में जारी युद्ध को खत्म करने की दिशा में मददगार साबित हो सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बातचीत के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत होने की जानकारी से उन्हें खुशी हुई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि जब दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ और सबसे बड़े लोकतंत्र साथ मिलकर काम करते हैं,तो इससे दोनों देशों के लोगों को सीधा लाभ मिलता है और पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग के नए अवसर खुलते हैं। उन्होंने इस फैसले को भारत-अमेरिका साझेदारी को नई ऊँचाइयों पर ले जाने वाला कदम बताया।

अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ भारत की रूसी तेल खरीद को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से लगाया गया था। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका लगातार अपने सहयोगी और साझेदार देशों से यह आग्रह करता रहा है कि वे रूसी ऊर्जा की खरीद कम करें या पूरी तरह बंद करें,ताकि रूस की युद्ध क्षमता को कमजोर किया जा सके। इस रणनीति के तहत वाशिंगटन ने कई देशों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव बनाया और प्रतिबंधों के जरिए रूसी तेल और गैस से होने वाली आय को सीमित करने की कोशिश की।

दूसरी ओर,भारत ने युद्ध के बाद अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी। भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल सस्ता और आसानी से उपलब्ध विकल्प बनकर उभरा,जिससे घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली। भारतीय अधिकारियों का हमेशा से यह रुख रहा है कि ऊर्जा से जुड़े फैसले राष्ट्रीय हित,उपभोक्ताओं की जरूरतों और वैश्विक बाजार परिस्थितियों के आधार पर लिए जाते हैं,न कि किसी एक देश के दबाव में।

हालाँकि,भारत ने इस पूरे समय रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर संतुलित रुख अपनाया है। नई दिल्ली ने एक ओर संवाद और कूटनीति के जरिए युद्ध समाप्त करने की वकालत की,तो दूसरी ओर रूस और पश्चिमी देशों—दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रखे। इसी संतुलन नीति के तहत भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भी लगातार बातचीत जारी रखी,ताकि ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी दोनों को साथ लेकर चला जा सके।

व्हाइट हाउस की ओर से आई यह स्पष्टता ऐसे समय में सामने आई है,जब भारत और अमेरिका व्यापार और निवेश सहयोग को और गहरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं। दोनों देशों के अधिकारियों के मुताबिक,द्विपक्षीय वार्ताएँ अंतिम चरण के करीब हैं और कई अहम मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। हालाँकि,भारतीय पक्ष की ओर से अभी इस समझौते को लेकर कोई औपचारिक और विस्तृत घोषणा नहीं की गई है,लेकिन संकेत साफ हैं कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में नई गति देखने को मिल सकती है।

ऊर्जा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। अमेरिका ने भारत को कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की है और खुद को भारत के लिए एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित किया है। अमेरिकी तेल और गैस कंपनियाँ भारतीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने को उत्सुक हैं,जबकि भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविधतापूर्ण बनाकर किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करना चाहता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी तेल पर निर्भरता कम करने और अमेरिका से आयात बढ़ाने का कदम भारत के लिए रणनीतिक संतुलन साधने का प्रयास भी हो सकता है। इससे एक ओर भारत को पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने में मदद मिलेगी,वहीं दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए और भरोसेमंद विकल्प भी मिलेंगे। हालाँकि,यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत किस गति और किस पैमाने पर रूसी तेल आयात में कटौती करता है,क्योंकि घरेलू बाजार और रिफाइनरियों की जरूरतें भी इस फैसले को प्रभावित करेंगी।

इस टैरिफ फैसले पर भारतीय नीति निर्माताओं,उद्योग जगत—खासकर तेल रिफाइनरियों,निर्यातकों और ऊर्जा कंपनियों और वैश्विक ऊर्जा बाजारों की करीबी नजर बनी हुई है। निर्यातकों को उम्मीद है कि 25 प्रतिशत टैरिफ हटने और 18 प्रतिशत की नई दर लागू होने से अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। वहीं ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ यह आकलन कर रहे हैं कि तेल आयात के स्रोतों में बदलाव से भारत की कुल आयात लागत और घरेलू ईंधन कीमतों पर क्या असर पड़ेगा।

इसी बीच,सोमवार को भारत के विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस सप्ताह वाशिंगटन का दौरा करेंगे। इस यात्रा के दौरान वह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ में हिस्सा लेंगे। मंत्रालय के अनुसार,यह बैठक आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती,स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और महत्वपूर्ण खनिजों में रणनीतिक सहयोग पर केंद्रित होगी। जयशंकर की अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात भी प्रस्तावित है,जिससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा और तकनीकी सहयोग को और विस्तार मिलने की उम्मीद है।

पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका संबंध रक्षा,प्रौद्योगिकी,व्यापार और आर्थिक क्षेत्रों में लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से इस साझेदारी को आने वाले वर्षों में अपनी सबसे अहम रणनीतिक साझेदारियों में से एक बताया है। मौजूदा घटनाक्रम से यह साफ है कि व्यापार और ऊर्जा सहयोग इस रिश्ते के केंद्र में रहने वाले हैं और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक संकट भी इस साझेदारी की दिशा और स्वरूप को प्रभावित कर रहे हैं।

रूसी तेल की खरीद पर भारत की सहमति और उसके बदले अमेरिका द्वारा 25 प्रतिशत टैरिफ हटाने का फैसला केवल एक व्यापारिक कदम नहीं है,बल्कि यह वैश्विक राजनीति,ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन से जुड़ा हुआ निर्णय है। आने वाले समय में यह समझौता भारत-अमेरिका संबंधों को किस दिशा में ले जाता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर कैसे पड़ता है,इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।