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भारत-अमेरिका व्यापार में बढ़ा असंतुलन: 54.91 अरब डॉलर के घाटे ने बढ़ाई वाशिंगटन की चिंता

वाशिंगटन,3 अप्रैल (युआईटीवी)- अमेरिका और भारत के बीच तेजी से बढ़ते व्यापारिक संबंध अब एक नए आर्थिक विमर्श का विषय बन गए हैं। ताजा सरकारी आँकड़ों के मुताबिक,पिछले 12 महीनों में अमेरिका को भारत के साथ व्यापार में 54.91 अरब डॉलर का घाटा हुआ है। इस बड़े अंतर के चलते भारत अब उन प्रमुख देशों की सूची में शामिल हो गया है,जिनके साथ व्यापार में अमेरिका को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह आँकड़ा न केवल दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक लेन-देन को दर्शाता है,बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन में बदलाव की ओर भी इशारा करता है।

फरवरी 2026 के आँकड़ों ने इस स्थिति को और स्पष्ट कर दिया है। इस महीने अमेरिका का कुल व्यापार घाटा बढ़कर 57.35 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया,जो जनवरी के मुकाबले 2.67 बिलियन डॉलर अधिक है। हालाँकि,यह आँकड़ा पिछले 12 महीनों के औसत से करीब 11 प्रतिशत कम है,फिर भी यह संकेत देता है कि अमेरिका के आयात और निर्यात के बीच संतुलन अभी भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है। इस असंतुलन की मुख्य वजह यह रही कि आयात की गति निर्यात से कहीं अधिक तेज रही।

महीने के दौरान अमेरिका का कुल निर्यात 314.8 बिलियन डॉलर रहा,जबकि आयात 372.1 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि अमेरिका की घरेलू माँग को पूरा करने के लिए विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता लगातार बनी हुई है। खासकर वस्तु व्यापार के क्षेत्र में अमेरिका को 84.60 अरब डॉलर का घाटा हुआ,जबकि सेवाओं के क्षेत्र में 27.26 अरब डॉलर का अधिशेष दर्ज किया गया। यह स्थिति अमेरिका की अर्थव्यवस्था की संरचना को भी दर्शाती है,जहाँ सेवाएँ मजबूत बनी हुई हैं,लेकिन विनिर्माण और वस्तु उत्पादन में चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

भारत के साथ व्यापारिक संबंधों की बात करें तो फरवरी महीने में ही अमेरिका ने भारत के साथ लगभग 3.5 अरब डॉलर का वस्तु व्यापार घाटा दर्ज किया। पिछले 12 महीनों के आँकड़ों में यह हिस्सा अमेरिका के कुल वस्तु व्यापार घाटे का लगभग 5.01 प्रतिशत रहा है। यह दर्शाता है कि भारत अब अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बन चुका है,लेकिन यह साझेदारी संतुलित नहीं है।

भारत से अमेरिका में होने वाले आयात में खास तौर पर फार्मास्यूटिकल्स,इंजीनियरिंग उत्पाद और अन्य विनिर्मित वस्तुओं का बड़ा योगदान है। पिछले एक साल में अमेरिका ने भारत से लगभग 101.97 बिलियन डॉलर के सामान आयात किए। यह आँकड़ा भारतीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है,खासकर दवा उद्योग और इंजीनियरिंग सेक्टर में। इसके अलावा,इन आयातों से अमेरिकी कस्टम ड्यूटी के रूप में 12.34 बिलियन डॉलर की आय भी हुई,जिसमें औसत टैरिफ दर 12.12 प्रतिशत रही।

हालाँकि,भारत के साथ बढ़ता व्यापार घाटा अमेरिका के लिए चिंता का विषय है,लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका के व्यापार असंतुलन में अन्य देशों की भूमिका अधिक बड़ी है। मेक्सिको,वियतनाम और चीन जैसे देशों के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा अभी भी सबसे अधिक है और कुल वस्तु व्यापार घाटे में उनका योगदान सबसे बड़ा बना हुआ है।

फरवरी के दौरान निर्यात में वृद्धि देखने को मिली,जिसका मुख्य कारण औद्योगिक आपूर्ति और सामग्री की शिपमेंट में बढ़ोतरी रही। इसमें नॉन-मॉनेटरी सोना और प्राकृतिक गैस जैसे उत्पाद शामिल थे। सेवाओं के निर्यात में भी हल्की वृद्धि दर्ज की गई,जो अमेरिका की मजबूत सेवा अर्थव्यवस्था को दर्शाती है। इसके बावजूद आयात में अधिक तेजी देखने को मिली, जिसका कारण पूँजीगत वस्तुओं,कंप्यूटर, सेमीकंडक्टर, कच्चे तेल और फार्मास्यूटिकल तैयारियों की बढ़ती माँग रही।

पिछले साल के व्यापार पैटर्न पर नजर डालें तो अमेरिका के मुख्य निर्यात में सिविलियन एयरक्राफ्ट,फार्मास्यूटिकल उत्पाद और नॉन-मॉनेटरी सोना शामिल रहे। वहीं आयात के क्षेत्र में फार्मास्यूटिकल्स,कंप्यूटर और यात्री वाहनों का दबदबा रहा। यह पैटर्न दर्शाता है कि अमेरिका उच्च तकनीक और उन्नत उत्पादों के निर्यात में मजबूत है,लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों और औद्योगिक उत्पादन के लिए उसे बाहरी बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है।

हालाँकि,हालिया आँकड़ों में मासिक आधार पर घाटा बढ़ा है,लेकिन दीर्घकालिक रुझान कुछ राहत देने वाले हैं। साल-दर-साल के आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले वर्ष की तुलना में व्यापार घाटा कुछ कम हुआ है। इसका मुख्य कारण निर्यात में वृद्धि और आयात में वार्षिक आधार पर कमी है। यह संकेत देता है कि अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों और उत्पादन क्षमता को बेहतर बनाने की दिशा में प्रयास कर रहा है।

फरवरी 2026 में अमेरिका ने आयात शुल्क के रूप में 21.24 बिलियन डॉलर की वसूली की,जो 12 महीने के औसत से लगभग 13 प्रतिशत कम है। इस दौरान औसत लागू टैरिफ दर 8.48 प्रतिशत रही। यह आँकड़ा दर्शाता है कि व्यापार नीति में कुछ लचीलापन अपनाया गया है, जिससे आयात को प्रोत्साहन मिला है,लेकिन इसके साथ ही व्यापार घाटा भी बढ़ा है।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों का यह नया स्वरूप आने वाले समय में दोनों देशों की आर्थिक नीतियों को प्रभावित कर सकता है। जहाँ एक ओर भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपने निर्यात को और बढ़ाए,वहीं अमेरिका के लिए यह चुनौती है कि वह अपने घरेलू उत्पादन को मजबूत कर संतुलन स्थापित करे।

भारत-अमेरिका व्यापार में बढ़ता यह असंतुलन वैश्विक व्यापार के बदलते समीकरणों को दर्शाता है। यह न केवल आर्थिक आँकड़ों की कहानी है,बल्कि यह भी बताता है कि कैसे विकासशील और विकसित देशों के बीच व्यापारिक संबंध नई दिशा ले रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश इस असंतुलन को कम करने के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं और क्या यह साझेदारी अधिक संतुलित और टिकाऊ रूप ले पाती है।