अमेरिका-इजराइल हमले

ईरान युद्ध पर अमेरिका का कड़ा रुख,चीन-रूस की शांति अपील ठुकराई; ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ में हजारों ठिकानों पर हमले का दावा

वॉशिंगटन,5 मार्च (युआईटीवी)- मिडिल ईस्ट में तेजी से बढ़ते सैन्य तनाव के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने चीन और रूस की उस अपील को खारिज कर दिया है,जिसमें दोनों देशों ने ईरान के साथ जारी युद्ध में तत्काल शांति और बातचीत की माँग की थी। अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह संघर्ष केवल ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और उसकी सैन्य क्षमताओं को लेकर है और इस मामले में बीजिंग या मॉस्को की कोई केंद्रीय भूमिका नहीं है।

पेंटागन में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग में अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका इस संघर्ष को लेकर चीन या रूस के साथ किसी तरह की वार्ता नहीं कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरे सैन्य अभियान का उद्देश्य केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी सैन्य शक्ति को सीमित करना है। हेगसेथ ने कहा कि उनके पास चीन या रूस के लिए कोई संदेश नहीं है और यह संघर्ष उनके साथ नहीं,बल्कि ईरान की नीतियों के साथ है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की चिंता केवल ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी है,जो क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह बयान ऐसे समय में आया है,जब अमेरिकी सेना का सैन्य अभियान चौथे दिन में प्रवेश कर चुका है। यह अभियान ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के नाम से चलाया जा रहा है,जिसके तहत ईरान के मिसाइल सिस्टम,नौसैनिक ठिकानों और सैन्य ढाँचे को निशाना बनाया जा रहा है। पेंटागन का दावा है कि इस अभियान का उद्देश्य ईरान की उस क्षमता को खत्म करना है,जिसके जरिए वह क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार कर सकता है या अमेरिकी बलों और सहयोगियों को खतरा पहुँचा सकता है।

हेगसेथ ने कहा कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से मिले संकेतों के बाद ही इस सैन्य अभियान को शुरू करने का फैसला लिया गया था। उनके अनुसार खुफिया आँकड़ों से यह संकेत मिला था कि तेहरान परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी प्रकार की वास्तविक और भरोसेमंद बातचीत करने के लिए तैयार नहीं था। उन्होंने कहा कि हालिया संघर्ष के दौरान मिले सबूतों से यह स्पष्ट हो गया है कि ईरान का इरादा परमाणु समझौते तक पहुँचने का नहीं था। अमेरिका का आरोप है कि ईरान लगातार ऐसे प्रयास कर रहा था,जिससे वह परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर सके।

हेगसेथ ने यह भी कहा कि ईरान के पास पहले से ही बड़ी संख्या में मिसाइलें मौजूद हैं,जो क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं। उनके अनुसार हजारों मिसाइलें ऐसी हैं,जिन्हें अमेरिका और उसके सहयोगियों की दिशा में लक्षित किया गया है। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन इस खतरे को गंभीरता से ले रहा है और उसे निष्क्रिय करने के लिए सैन्य कार्रवाई कर रहा है।

इस अभियान की सैन्य प्रगति के बारे में जानकारी देते हुए अमेरिकी संयुक्त सैन्य प्रमुख,एयर फोर्स जनरल डैन केन ने कहा कि अब तक अमेरिकी बलों ने ईरान के भीतर बड़ी संख्या में लक्ष्यों पर हमला किया है। उन्होंने बताया कि अब तक 2,000 से अधिक सैन्य ठिकानों और रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाया जा चुका है। इन हमलों में मिसाइल लॉन्च साइट,सैन्य अड्डे, नौसैनिक प्रतिष्ठान और लॉजिस्टिक सुविधाएँ शामिल हैं।

जनरल केन ने कहा कि इन हमलों का असर ईरान की सैन्य गतिविधियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। उनके अनुसार संघर्ष के पहले दिन की तुलना में ईरान द्वारा दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की संख्या में भारी गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि ईरानी थिएटर बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च में पहले दिन के मुकाबले लगभग 86 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिकी हमलों ने ईरान के मिसाइल ढाँचे को काफी नुकसान पहुँचाया है।

अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि यह अभियान केवल ईरान के अंदरूनी सैन्य ढाँचे को निशाना बनाने तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका उद्देश्य ईरान की उस रणनीतिक क्षमता को समाप्त करना है,जिसके जरिए वह अपनी सीमाओं के बाहर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करता है। जनरल केन के अनुसार अभियान का स्पष्ट लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान भविष्य में भी अपनी सीमाओं से बाहर जाकर सैन्य प्रभाव स्थापित न कर सके।

पेंटागन के मुताबिक इस अभियान में अमेरिका को क्षेत्र के कई सहयोगी देशों का समर्थन भी मिल रहा है। मध्य पूर्व के कई देश ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के खिलाफ रक्षा में अमेरिका की मदद कर रहे हैं। इनमें सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,कतर,बहरीन और जॉर्डन शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इन देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।

हालाँकि,शुरुआती दिनों में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं,लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया है कि युद्ध अभी अपने शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में स्थिति और जटिल हो सकती है। जनरल केन ने कहा कि संघर्ष शुरू हुए अभी लगभग 100 घंटे ही हुए हैं और इतने कम समय में युद्ध के अंतिम परिणाम के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह रुख यह दिखाता है कि वाशिंगटन इस संघर्ष को केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं,बल्कि वैश्विक सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देख रहा है। अमेरिका लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है और साथ ही क्षेत्र में कई समूहों के जरिए अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।

पिछले कुछ महीनों में वाशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और उसके सहयोगियों पर हमलों का समर्थन किया है। इसके अलावा ईरान पर यह भी आरोप लगाया गया है कि वह अपनी मिसाइल और ड्रोन तकनीक को लगातार मजबूत कर रहा है,जिससे मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।

दूसरी ओर,ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है और उसका कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। हालाँकि,अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि तेहरान के कार्यक्रम में कई ऐसे पहलू हैं,जो परमाणु हथियार विकास की दिशा में संकेत देते हैं।

इन परिस्थितियों में अमेरिका का सैन्य अभियान क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में बड़ा प्रभाव डाल सकता है। चीन और रूस की शांति अपील को ठुकराने के बाद यह संकेत मिल रहा है कि अमेरिका फिलहाल सैन्य दबाव के जरिए ही ईरान को रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है।

मिडिल ईस्ट में बढ़ता यह संघर्ष आने वाले दिनों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना रह सकता है। अमेरिका द्वारा चलाया जा रहा सैन्य अभियान और ईरान की प्रतिक्रिया दोनों ही इस क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता पर गहरा असर डाल सकते हैं। फिलहाल पेंटागन का कहना है कि अभियान जारी रहेगा और उसका लक्ष्य स्पष्ट है—ईरान की परमाणु और सैन्य क्षमताओं को सीमित करना ताकि वह अमेरिका,उसके सहयोगियों और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों के लिए खतरा न बन सके।