प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तस्वीर क्रेडिट@BJP4India)

मोदी ने याद दिलाया इतिहास: सोमनाथ मंदिर पर नेहरू की आपत्तियाँ और पटेल का संकल्प

नई दिल्ली,5 जनवरी (युआईटीवी)- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अपने ब्लॉग में स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रसंग को याद किया। उन्होंने बताया कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे और उनका मानना था कि सरकार तथा संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को इस कार्य से दूर रहना चाहिए। मोदी ने लिखा कि यह बहस केवल एक मंदिर के पुनर्निर्माण तक सीमित नहीं थी,बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान,ऐतिहासिक स्मृति और आधुनिक राज्य की भूमिका से जुड़ा प्रश्न था।

प्रधानमंत्री ने अपने लेख में विस्तार से बताया कि आज़ादी के बाद जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का मुद्दा उठा तो इसकी जिम्मेदारी तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल पर आई। गुजरात के इस ऐतिहासिक मंदिर पर 1026 ईस्वी में आक्रमण हुआ था और समय के साथ यह खंडहर में बदल गया। मोदी ने लिखा कि 1947 की दीपावली पर,जब सरदार पटेल सोमनाथ गए और उन्होंने मंदिर की जर्जर स्थिति देखी,तो उनका मन गहराई से विचलित हो उठा। उसी भावनात्मक क्षण ने एक संकल्प को जन्म दिया—कि इसी स्थान पर मंदिर को एक बार फिर भव्य रूप में खड़ा किया जाएगा।

मोदी के अनुसार,पुनर्निर्माण का निर्णय केवल धार्मिक आस्था नहीं,बल्कि सभ्यता की स्मृतियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास था। उन्होंने लिखा कि सरदार पटेल का सपना केवल पत्थरों और दीवारों का निर्माण नहीं था,बल्कि टूटे आत्मविश्वास को फिर से खड़ा करने का था। दुर्भाग्य से पटेल इस ऐतिहासिक परियोजना के पूर्ण होने से पहले ही दुनिया से विदा हो गए,लेकिन उनके संकल्प को आगे बढ़ाने वालों ने काम नहीं रोका।

प्रधानमंत्री ने बताया कि 11 मई 1951 को जब सोमनाथ मंदिर जनता के लिए खोला गया,तो उस अवसर पर देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वयं उपस्थित थे। यह समारोह प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था,क्योंकि यह केवल मंदिर उद्घाटन का क्षण नहीं,बल्कि उस विचार का उत्सव था,जिसमें इतिहास की चोटों के बावजूद उठ खड़े होने का भरोसा निहित था।

मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि केंद्र सरकार आधिकारिक रूप से सोमनाथ के पुनर्निर्माण से न जुड़े। वे यह भी नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति या मंत्रिमंडल के सदस्य उद्घाटन समारोह में शामिल हों। नेहरू का तर्क था कि इससे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत की छवि पर गलत संदेश जाएगा,लेकिन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इस तर्क से सहमति नहीं दिखाई और स्पष्ट किया कि वे इस आयोजन में निजी नागरिक के रूप में भी जाना उचित समझते हैं। प्रधानमंत्री ने लिखा, “राजेंद्र बाबू अडिग रहे और फिर जो हुआ,उसने एक नया इतिहास रचा।”

मोदी ने उल्लेख किया कि सोमनाथ मंदिर की कहानी का जिक्र यदि के.एम. मुंशी के बिना किया जाए,तो वह अधूरी रह जाती है। मुंशी,जो उस समय के प्रमुख राजनेता और लेखक थे,ने पटेल के साथ मिलकर पुनर्निर्माण की पूरी प्रक्रिया को दिशा दी। प्रधानमंत्री ने उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ को अत्यंत ज्ञानवर्धक बताते हुए कहा कि इसका शीर्षक ही उस सभ्यतागत दृष्टि को सामने लाता है,जिसमें आत्मा और विचारों की अमरता पर विश्वास किया जाता है।

अपने लेख में मोदी ने भगवद्गीता के श्लोक “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि,नैनं दहति पावकः” का संदर्भ देते हुए कहा कि सोमनाथ का भौतिक ढाँचा भले नष्ट हो गया,लेकिन उसकी चेतना कभी नहीं मरी। इसी चेतना ने भारतीय समाज को बार-बार संकट से उबरने और स्वयं को पुनः गढ़ने की ताकत दी। उन्होंने लिखा कि यह ताकत आज भी भारत की प्रगति के पीछे काम कर रही है—चाहे वह विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र की उपलब्धियाँ हों या सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का वैश्विक विस्तार।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि आज दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। हमारे युवा नवाचार के नए आयाम गढ़ रहे हैं,भारतीय कला,संगीत और त्यौहार वैश्विक सांस्कृतिक परिदृश्य का हिस्सा बनते जा रहे हैं। योग और आयुर्वेद ने दुनिया में स्वास्थ्य के वैकल्पिक और समग्र मॉडल के प्रति रुचि बढ़ाई है। उनके अनुसार,यह सब उसी सभ्यतागत आत्मविश्वास का परिणाम है,जिसकी प्रतीकात्मक शुरुआत सोमनाथ जैसे पुनरुत्थान से दिखाई देती है।

मोदी के इस ब्लॉग ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और ऐतिहासिक विमर्श को फिर से जीवंत कर दिया है। एक ओर इसे स्वतंत्रता के बाद के वैचारिक मतभेदों की याद के रूप में देखा जा रहा है,तो दूसरी ओर इसे अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु के रूप में भी समझा जा रहा है—जहाँ राज्य,धर्म और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन का प्रश्न हमेशा चर्चा में रहा है।

प्रधानमंत्री ने लेख के अंत में कहा कि सोमनाथ की कहानी केवल अतीत की गाथा नहीं,बल्कि भारत के भविष्य के लिए प्रेरणा है। यह इस बात का प्रमाण है कि भौतिक संरचनाएँ गिर सकती हैं,लेकिन यदि समाज अपनी चेतना और विश्वास को बचाए रखे,तो वह हर बार नए सिरे से उठ खड़ा हो सकता है। उनके अनुसार,यही भावना आज भारत की विकास यात्रा का आधार बन रही है—जहाँ आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं और दुनिया आने वाले समय में भारत से समाधान,सहयोग और स्थिरता की उम्मीद लगाए बैठी है।