अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर (तस्वीर क्रेडिट@NaijaTodayHQ)

नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर भड़के ट्रंप,नॉर्वे के पीएम को भेजा संदेश—ग्रीनलैंड पर ‘पूरे नियंत्रण’ की जताई मंशा

नई दिल्ली, 20 जनवरी (युआईटीवी)- नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गए हैं। इस बार उनका गुस्सा सीधे नॉर्वे तक जा पहुँचा है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर ने सोमवार को पुष्टि की कि उन्हें राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से एक संदेश प्राप्त हुआ है,जिसमें ट्रंप ने न केवल नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर नाराजगी जाहिर की,बल्कि यह भी कहा कि अब वह शांति के लिए खुद को बाध्य नहीं मानते और ग्रीनलैंड पर अमेरिका का “पूरा नियंत्रण” चाहते हैं। इस संदेश के सामने आने के बाद यूरोप और अमेरिका के रिश्तों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर के अनुसार,यह संदेश रविवार दोपहर उन्हें मिला था। उन्होंने नॉर्वे के स्थानीय अखबार ‘वीजे’ को इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि करते हुए बताया कि यह मैसेज राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से सीधे भेजा गया था। स्टोर ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संदेश दिन में पहले उनके और फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब की ओर से ट्रंप को भेजे गए एक संक्षिप्त संदेश के जवाब में आया। हालाँकि,ट्रंप के जवाब का लहजा और उसमें कही गई बातें सामान्य कूटनीतिक संवाद से काफी अलग मानी जा रही हैं।

ट्रंप के संदेश में नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर उनकी नाराजगी खुलकर सामने आई। उन्होंने नॉर्वे के प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए लिखा कि चूँकि उनके देश ने उन्हें आठ युद्धों को रोकने के बावजूद नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया है,इसलिए अब उन्हें शांति के बारे में सोचने की कोई विशेष जरूरत महसूस नहीं होती। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि शांति की अवधारणा हमेशा हावी रहेगी,लेकिन अब वह यह सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए क्या “अच्छा और सही” है। इस कथन को कई विश्लेषक अमेरिका की पारंपरिक विदेश नीति से हटकर एक सख्त और राष्ट्र-केंद्रित रुख के संकेत के रूप में देख रहे हैं।

इसी संदेश में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी पुरानी और विवादास्पद माँग को फिर दोहराया। उन्होंने लिखा कि जब तक अमेरिका के पास ग्रीनलैंड पर पूरा नियंत्रण नहीं होगा,तब तक दुनिया सुरक्षित नहीं हो सकती। ट्रंप ने डेनमार्क की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि डेनमार्क उस जमीन को रूस या चीन से नहीं बचा सकता और वैसे भी उसके पास वहाँ का मालिकाना हक क्यों होना चाहिए। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि ग्रीनलैंड पर डेनमार्क के स्वामित्व को साबित करने के लिए कोई ठोस लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं हैं और यह दावा महज सैकड़ों साल पहले वहाँ एक नाव के पहुँचने की कहानी पर आधारित है। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी नावें भी वहाँ उतरी थीं,इसलिए अमेरिका का दावा कमतर नहीं है।

अपने संदेश में ट्रंप ने नाटो का जिक्र करते हुए कहा कि नाटो के गठन के बाद से किसी भी अन्य नेता की तुलना में उन्होंने इस सैन्य गठबंधन के लिए सबसे ज्यादा किया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब समय आ गया है कि नाटो संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कुछ करे। ग्रीनलैंड के संदर्भ में यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।

यह पहली बार नहीं है,जब डोनाल्ड ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर नॉर्वे को निशाने पर लिया हो। इससे पहले भी वह सार्वजनिक मंचों से यह कहते रहे हैं कि उन्हें इस पुरस्कार से वंचित किया गया,जबकि उनके अनुसार उन्होंने कई बड़े संघर्षों को टालने में अहम भूमिका निभाई है। ट्रंप लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने कम-से-कम आठ युद्धों को रोका है और इसी आधार पर उन्होंने कई बार नोबेल पुरस्कार के लिए खुद का पक्ष मजबूत बताया है।

हालाँकि,इस पूरे विवाद में एक अहम तथ्य यह भी है कि नोबेल शांति पुरस्कार देने का फैसला नॉर्वे सरकार नहीं करती। यह निर्णय ओस्लो स्थित एक स्वतंत्र नोबेल समिति द्वारा लिया जाता है। इसके बावजूद ट्रंप का गुस्सा बार-बार नॉर्वे और उसके नेतृत्व पर केंद्रित रहा है,जिसे कई लोग तथ्यों की अनदेखी और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक,ट्रंप की पसंद के अनुसार यह संदेश नाटो देशों के अन्य नेताओं के साथ भी साझा किया गया। यह संदेश ऐसे समय में सामने आया है,जब ट्रंप द्वारा हाल ही में उठाए गए कुछ कदमों को लेकर कई यूरोपीय नेताओं ने आपातकालीन बैठक की थी। माना जा रहा है कि इस संदेश ने पहले से ही तनावपूर्ण माहौल को और जटिल बना दिया है।

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का रुख पहले भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद का कारण बन चुका है। वह कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अमेरिका को ग्रीनलैंड हासिल करना चाहिए,क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक संतुलन के लिहाज से जरूरी है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार ने पहले ही इस विचार को सिरे से खारिज कर दिया है,लेकिन ट्रंप का लगातार इस मुद्दे को उठाना उनके इरादों पर सवाल खड़े करता है।

नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़ा एक और दिलचस्प पहलू यह है कि पिछले साल यह पुरस्कार वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को दिया गया था। मचाडो ने यह पुरस्कार ट्रंप को गिफ्ट कर दिया था,जिस पर नोबेल समिति ने कड़ी आपत्ति जताई थी। समिति ने साफ कहा था कि नोबेल पुरस्कार किसी को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद ट्रंप और उनके समर्थकों ने इसे एक नैतिक समर्थन के रूप में पेश किया।

नॉर्वे के प्रधानमंत्री को भेजा गया यह संदेश केवल एक निजी संवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह अमेरिका,यूरोप और नाटो के बीच संबंधों,ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत और अंतर्राष्ट्रीय शांति प्रयासों पर एक नई बहस को जन्म दे चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस बयानबाजी का कूटनीतिक स्तर पर क्या असर पड़ता है और क्या ट्रंप का यह रुख वैश्विक राजनीति में किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है।