ईरान में भड़का जनविरोध (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ईरान में भड़का जनआक्रोश,सड़कों पर उतरी जनता; ऑस्ट्रेलिया,कनाडा और यूरोपीय संघ ने शासन की कड़ी आलोचना की

नई दिल्ली,10 जनवरी (युआईटीवी)- ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शन अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुँच गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर उतर रही जनता का आक्रोश लगातार तेज होता जा रहा है और हालात सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण बनते दिख रहे हैं। बढ़ती महँगाई,बदहाल अर्थव्यवस्था और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाइयों के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल घरेलू मुद्दा नहीं रहा,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गहरी चिंता का विषय बन गया है। इसी कड़ी में ऑस्ट्रेलिया,कनाडा और यूरोपीय संघ ने एक संयुक्त बयान जारी कर ईरानी सरकार की तीखी आलोचना की है और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की है।

ग्लोबल अफेयर्स कनाडा की ओर से जारी इस संयुक्त बयान में तीनों पक्षों के विदेश मंत्रियों ने ईरानी जनता के साहस की खुलकर सराहना की है। बयान में कहा गया है कि वे ईरानी लोगों की उस बहादुरी की प्रशंसा करते हैं,जिसके तहत वे अपनी गरिमा,स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अपने मौलिक अधिकारों के लिए खड़े हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का यह संदेश स्पष्ट है कि ईरान में सड़कों पर उतर रहे लोग केवल अपनी आवाज उठाने की कोशिश कर रहे हैं और उनका यह अधिकार छीना नहीं जाना चाहिए।

संयुक्त बयान में ईरानी शासन द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की जा रही कार्रवाई को पूरी तरह निंदनीय बताया गया है। विदेश मंत्रियों ने कहा कि ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्या,हिंसा का इस्तेमाल,मनमानी गिरफ्तारियाँ और डराने-धमकाने की रणनीति मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। बयान में यह भी कहा गया कि ईरानी शासन अपने ही लोगों के खिलाफ दमनात्मक रवैया अपनाकर हालात को और बिगाड़ रहा है। तीनों पक्षों ने ईरान से माँग की है कि वह तुरंत अत्यधिक और घातक बल प्रयोग को बंद करे और तनाव कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।

बयान में विशेष रूप से ईरान के सुरक्षा बलों का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि ईरान को अपने सुरक्षा बलों,जिनमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) और बसीज शामिल हैं,द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक और घातक बल के इस्तेमाल को तत्काल समाप्त करना चाहिए। संयुक्त बयान के अनुसार अब तक इन विरोध प्रदर्शनों में 40 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है,जबकि सैकड़ों लोग घायल और गिरफ्तार किए गए हैं। यह आँकड़ें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता पैदा कर रहे हैं।

विदेश मंत्रियों ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होती है,न कि उनके खिलाफ हिंसा का सहारा लेना। बयान में कहा गया कि ईरान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार की गारंटी देनी चाहिए,ताकि लोग बिना किसी डर या प्रतिशोध के अपनी बात रख सकें। तीनों देशों ने स्पष्ट किया कि दुनिया ईरान की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और मानवाधिकारों के उल्लंघन को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

ईरान के भीतर हालात और ज्यादा तनावपूर्ण तब हो गए,जब शुक्रवार को सरकार ने अशांति को रोकने के नाम पर इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दीं। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय टेलीफोन कॉल सेवाओं पर भी रोक लगा दी गई,जिससे देश के अंदर और बाहर रहने वाले लोगों के बीच संपर्क टूट गया। सरकार का यह कदम कई बार पहले भी विरोध प्रदर्शनों के दौरान उठाया जा चुका है,ताकि सूचनाओं के प्रसार को रोका जा सके और आंदोलनों को कमजोर किया जा सके।

इस बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने सख्त रुख अपनाते हुए पीछे न हटने की कसम खाई है। खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों पर प्रवासी विपक्षी गुटों और संयुक्त राज्य अमेरिका के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ये प्रदर्शन ईरान के खिलाफ विदेशी साजिश का हिस्सा हैं और देश को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है। खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि वे किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति को खुश करने के लिए अपनी ही सड़कों पर तबाही मचा रहे हैं।

खामेनेई का यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर इशारा करता है। ट्रंप ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर ईरानी शासन प्रदर्शन कर रहे लोगों को निशाना बनाता है,तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई कर सकता है। इस बयान के बाद ईरान और अमेरिका के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में और कड़वाहट आ गई है।

ईरान में खामेनेई के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा लंबे समय से सुलग रहा था। बढ़ती महँगाई,बेरोजगारी,मुद्रा की गिरती कीमत और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते आम जनता की जिंदगी लगातार मुश्किल होती जा रही है। इसके साथ ही सुरक्षा बलों की कथित दमनकारी कार्रवाइयों ने लोगों के असंतोष को और हवा दी है। कई प्रदर्शनकारी यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार उनकी समस्याओं को सुनने के बजाय ताकत के बल पर उन्हें चुप कराने की कोशिश कर रही है।

इन विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने में ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की भूमिका भी चर्चा में है। उन्होंने गुरुवार और शुक्रवार को स्थानीय समयानुसार रात 8 बजे लोगों से सड़कों पर उतरने का आह्वान किया था। उनके इस आह्वान के बाद 8 जनवरी की रात ईरान में विरोध प्रदर्शनों ने तेज रफ्तार पकड़ ली। कई शहरों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे,जिससे सरकार पर दबाव और बढ़ गया।

स्थिति को काबू में करने के लिए राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के नेतृत्व वाली ईरानी सरकार ने इंटरनेट और अंतर्राष्ट्रीय संचार सेवाएँ बंद करने का फैसला किया। हालाँकि,आलोचकों का कहना है कि ऐसे कदमों से समस्या का समाधान नहीं होगा,बल्कि जनता का गुस्सा और भड़केगा।

ईरान इस समय एक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। देश के अंदर जनता सड़कों पर है,जबकि बाहर से अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया,कनाडा और यूरोपीय संघ का संयुक्त बयान इस बात का संकेत है कि ईरान की स्थिति अब वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरानी सरकार संवाद और सुधार का रास्ता अपनाती है या फिर सख्ती के जरिए हालात को काबू में रखने की कोशिश जारी रखती है।