पुणे पोर्शे हिट-एंड-रन मामला (तस्वीर क्रेडिट@AlokSinghSays)

पुणे पोर्शे हिट-एंड-रन मामला: तीन आरोपियों को जमानत मिलने से पीड़ित परिवार आहत,सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठे सवाल

उमरिया/नई दिल्ली,3 फरवरी (युआईटीवी)- पुणे के बहुचर्चित पोर्शे हिट-एंड-रन मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन आरोपियों को जमानत दिए जाने के बाद पीड़ित परिवारों की पीड़ा एक बार फिर सामने आ गई है। इस हादसे में जान गंवाने वाले अनिश अवधिया के परिजनों ने शीर्ष अदालत के फैसले पर गहरी निराशा जताते हुए कहा है कि उन्हें न्याय व्यवस्था से बड़ी उम्मीद थी,लेकिन यह फैसला उनके लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ है। परिजनों का आरोप है कि ये तीनों आरोपी नाबालिगों को बचाने के लिए खून के सैंपल बदलने की साजिश में शामिल थे और ऐसे गंभीर आरोपों के बावजूद जमानत दिया जाना न्याय की भावना के खिलाफ है।

अनिश अवधिया के दादा आत्माराम अवधिया,जो मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के निवासी हैं,ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जाँच में स्पष्ट रूप से सामने आया है कि हादसे के समय कार चला रहे नाबालिग के पिता ने अपने बेटे को बचाने के लिए पैसे के दम पर सबूतों से छेड़छाड़ करवाई। उन्होंने कहा कि खून के सैंपल बदलवाने के लिए रिश्वत दी गई और इसमें प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत थी। आत्माराम अवधिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें उम्मीद थी कि वह इस गंभीर साजिश को ध्यान में रखेगा,लेकिन जमानत का आदेश परिवार के लिए बेहद निराशाजनक है। उन्होंने साफ कहा कि वे इस फैसले के खिलाफ जमानत रद्द कराने के लिए फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएँगे।

अनिश के पिता ओम अवधिया ने भी अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत से न्याय की उम्मीद थी,लेकिन तीन आरोपियों को जमानत मिलना यह संकेत देता है कि इस मामले में पैसों और राजनीतिक दबाव की भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि जब आरोप इतने गंभीर हों और जाँच एजेंसियाँ खुद यह कह रही हों कि सबूतों से छेड़छाड़ की गई है,तब जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी। ओम अवधिया ने यह भी आरोप लगाया कि नाबालिग आरोपी एक प्रभावशाली रियल एस्टेट कारोबारी का बेटा है,इसलिए नेता और वरिष्ठ अधिकारी मिलकर इस मामले को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले में तीन आरोपियों—आशीष सतीश मित्तल,आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़ को जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ये आरोपी लगभग 20 महीनों से जेल में हैं और इस आधार पर उन्हें ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई शर्तों के तहत रिहा किया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत का मतलब यह नहीं है कि आरोप खत्म हो गए हैं,बल्कि मुकदमा अपने तय कानूनी दायरे में आगे बढ़ेगा।

इन तीनों आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने पोर्शे कार में मौजूद दो नाबालिगों के खून के सैंपल बदलने में अहम भूमिका निभाई थी। हादसे के समय कार चला रहा नाबालिग और उसके दो दोस्त कथित तौर पर शराब के नशे में थे। जाँच एजेंसियों के अनुसार,शराब पीने की बात सामने आने पर मामला और गंभीर हो सकता था,इसलिए सबूतों को नष्ट करने और बदलने की साजिश रची गई। आशीष सतीश मित्तल को मुख्य आरोपी नाबालिग के पिता का करीबी दोस्त बताया गया है,जबकि आदित्य अविनाश सूद उस नाबालिग का पिता है,जो हादसे के वक्त कार की पिछली सीट पर बैठा था। अमर संतोष गायकवाड़ पर आरोप है कि उसने बिचौलिये की भूमिका निभाई और खून के सैंपल बदलवाने के लिए 3 लाख रुपये लिए।

यह पूरा मामला 19 मई 2024 का है,जब पुणे के कल्याणी नगर इलाके में बिना नंबर प्लेट की एक तेज रफ्तार पोर्शे कार ने एक दोपहिया वाहन को टक्कर मार दी थी। इस दर्दनाक हादसे में दो युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर—अनिश अवधिया और अश्विनी कोस्टा की मौके पर ही मौत हो गई थी। दोनों होटल से घर लौट रहे थे। अनिश अवधिया मध्य प्रदेश के निवासी थे,जबकि अश्विनी कोस्टा जबलपुर जिले से ताल्लुक रखती थीं। इस हादसे ने न केवल पुणे बल्कि पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया था,क्योंकि शुरुआती जाँच में ही यह बात सामने आ गई थी कि कार एक नाबालिग चला रहा था और वह शराब के नशे में था।

पुलिस जाँच में यह भी सामने आया कि नाबालिग आरोपी ने हादसे से पहले दो अलग-अलग होटलों में शराब पी थी। होटल कर्मचारियों और सीसीटीवी फुटेज के जरिए इस बात की पुष्टि हुई। हालाँकि,जब मेडिकल जाँच की बारी आई तो रिपोर्ट में शराब की मौजूदगी नहीं दिखाई गई। इसी बिंदु पर जाँच एजेंसियों को शक हुआ और आगे की जाँच में यह खुलासा हुआ कि पुणे के ससून अस्पताल में नाबालिग का खून का सैंपल फेंक दिया गया था और उसकी जगह उसकी माँ का सैंपल भेज दिया गया।

अभियोजन पक्ष का दावा है कि इस पूरी साजिश में नाबालिग के पिता विशाल अग्रवाल,उनकी पत्नी,अस्पताल के कुछ डॉक्टर और कर्मचारी तथा बिचौलिये शामिल थे। जाँच एजेंसियों के अनुसार,अस्पताल के कर्मचारियों को बिचौलियों के जरिए 3 लाख रुपये दिए गए और वरिष्ठ मेडिकल अधिकारियों ने इस हेरफेर को अंजाम दिया,ताकि रिपोर्ट में शराब की मौजूदगी सामने न आए और नाबालिग को कानूनी कार्रवाई से बचाया जा सके। यह खुलासा सामने आने के बाद मामला सिर्फ एक सड़क हादसा न रहकर सबूतों से छेड़छाड़ और आपराधिक साजिश का गंभीर केस बन गया।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। एक ओर अदालत का कहना है कि लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों को जमानत मिलना उनका कानूनी अधिकार है,वहीं दूसरी ओर पीड़ित परिवारों का कहना है कि यह मामला सामान्य नहीं है और इसमें प्रभाव,पैसा और सत्ता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सामाजिक संगठनों और आम लोगों के बीच भी इस फैसले को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुका है। नाबालिग अपराध,प्रभावशाली लोगों द्वारा कानून का दुरुपयोग और सबूतों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दे इस केस के केंद्र में हैं। आने वाले समय में ट्रायल कोर्ट में होने वाली सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट में संभावित जमानत रद्द याचिका इस मामले की दिशा तय करेगी। फिलहाल,अनिश अवधिया और अश्विनी कोस्टा के परिवार न्याय की उम्मीद में संघर्ष जारी रखने की बात कह रहे हैं,जबकि देश की नजरें इस हाई-प्रोफाइल मामले के अगले मोड़ पर टिकी हुई हैं।