राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत (तस्वीर क्रेडिट@PeoplesUpdate)

राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत,प्रधानमंत्री मोदी पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले की सुनवाई पर रोक

नई दिल्ली,13 अक्टूबर (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को राहत दी है। शीर्ष अदालत ने मामले में निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही, अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली राहुल गांधी की याचिका पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि की शिकायत रद्द करने से इनकार कर दिया था।

यह मामला राहुल गांधी की उन टिप्पणियों से जुड़ा है,जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘चोरों का सरदार’ और ‘कमांडर-इन-थीफ’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। इन टिप्पणियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि राहुल गांधी के बयान से प्रधानमंत्री के साथ-साथ भाजपा और उसके सदस्यों की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुँचा।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद फिलहाल निचली अदालत में इस मामले की आगे की कार्यवाही नहीं होगी। हालाँकि,यह आदेश मानहानि की शिकायत को अंतिम रूप से खारिज किए जाने के समान नहीं है। मामले के कानूनी पहलुओं पर आगे विचार किया जाना बाकी है।

राहुल गांधी ने इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मजिस्ट्रेट अदालत की ओर से जारी समन को चुनौती दी थी। उन्होंने मानहानि की शिकायत की वैधता पर सवाल उठाते हुए उसे रद्द करने की माँग की थी। हालाँकि,हाईकोर्ट ने 8 सितंबर को दिए अपने आदेश में शिकायत खारिज करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद राहुल गांधी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

राहुल गांधी की ओर से दलील दी गई थी कि शिकायतकर्ता द्वारा दायर मामला सुनवाई योग्य नहीं है। उनका कहना था कि संबंधित टिप्पणी में उन्होंने किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया था। साथ ही,उनके बयान में किसी ऐसे स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकने वाले व्यक्ति या समूह को निशाना नहीं बनाया गया था,जिसके आधार पर आपराधिक मानहानि का मामला चलाया जा सके।

उनकी दलील का मुख्य आधार यह था कि राजनीतिक भाषण में की गई टिप्पणी और किसी पहचान योग्य व्यक्ति या समूह की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाले बयान के बीच कानूनी अंतर को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने शिकायत और समन को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस विवाद के अंतिम कानूनी निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय संबंधित पक्षों से जवाब माँगा है। चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल किए जाने के निर्देश के साथ निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई है।

यह आपराधिक मानहानि शिकायत भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर की थी। शिकायतकर्ता के मुताबिक,राहुल गांधी की टिप्पणियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन शब्दों का असर भाजपा और उसके सदस्यों की छवि पर पड़ा।

शिकायतकर्ता का तर्क था कि प्रधानमंत्री को ‘चोरों का सरदार’ कहने का आशय भाजपा के सदस्यों को भी चोर बताने से था। इसी आधार पर उन्होंने इसे मानहानिकारक टिप्पणी बताते हुए कानूनी कार्रवाई की माँग की थी।

इस मामले में मुख्य विवाद यह है कि किसी राजनीतिक नेता की टिप्पणी को लेकर मानहानि का मुकदमा चलाने के लिए किन कानूनी शर्तों का पूरा होना आवश्यक है। क्या किसी राजनीतिक दल के सभी सदस्यों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचने का दावा किया जा सकता है या शिकायत में प्रभावित व्यक्ति अथवा समूह की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए? इन सवालों का संबंध मानहानि कानून के दायरे और उसके इस्तेमाल से है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने राहुल गांधी की याचिका पर विचार करते समय दिल्ली हाईकोर्ट के एक अन्य मामले का भी उल्लेख किया था। यह मामला कांग्रेस नेता शशि थरूर से जुड़ा था, जिसमें राजनीतिक दल को एक पहचान योग्य संस्था के रूप में देखे जाने के प्रश्न पर विचार किया गया था।

राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा और उनके सदस्यों के संदर्भ में मानहानि के दावों पर न्यायिक विचार का महत्व इसी कारण बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में अदालत को यह देखना होता है कि शिकायत में लगाए गए आरोप कानूनी रूप से मानहानि के दायरे में आते हैं या नहीं और शिकायतकर्ता के पास मुकदमा दायर करने का पर्याप्त आधार है या नहीं।

हालाँकि,राहुल गांधी के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश अभी अंतरिम प्रकृति का है। शीर्ष अदालत ने संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। अंतिम निर्णय आने तक यह कहना उचित नहीं होगा कि शिकायत की वैधता पर विवाद पूरी तरह समाप्त हो गया है।

इस बीच, 10 अक्टूबर को हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई से संबंधित मामले में भी राहुल गांधी ने याचिका दाखिल की है। इस मामले में भी उनकी ओर से अदालत में पक्ष रखा जा सकता है। हालाँकि,यह मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि विवाद से अलग है और दोनों की कानूनी प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से राहुल गांधी को मानहानि मामले में निचली अदालत की सुनवाई से अस्थायी राहत मिली है। अब संबंधित पक्षों के जवाब और आगे की न्यायिक सुनवाई के बाद मामले की अगली दिशा तय होगी। इस प्रकरण का परिणाम राजनीतिक भाषण,मानहानि के कानूनी दायरे और राजनीतिक दलों की पहचान से जुड़े प्रश्नों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है।