नई दिल्ली,7 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई ) ने महँगाई के बढ़ते दबाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय बैंक ने बुधवार को रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब रिजर्व बैंक ने रेपो दर में बढ़ोतरी की है। मौद्रिक नीति समिति का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण महँगाई को लेकर जोखिम बढ़ गया है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक में यह फैसला लिया गया। समिति ने नीतिगत रुख में भी बदलाव किया है और उसे ‘तटस्थ’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी चरणबद्ध सख्ती कर दिया है। इसका संकेत यह है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महँगाई के जोखिम को नियंत्रित करने को प्राथमिकता दे रहा है और आगे की नीति कार्रवाई आर्थिक परिस्थितियों तथा महँगाई के रुझान पर निर्भर करेगी।
रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्प अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। जब केंद्रीय बैंक इस दर में बढ़ोतरी करता है,तो बैंकों के लिए धन की लागत बढ़ सकती है। इसका असर बैंक द्वारा दिए जाने वाले विभिन्न प्रकार के कर्ज पर पड़ सकता है। ऐसे में होम लोन,वाहन ऋण और व्यक्तिगत ऋण लेने वाले ग्राहकों पर ब्याज दर बढ़ने का असर दिखाई दे सकता है। फ्लोटिंग ब्याज दर वाले मौजूदा कर्ज की मासिक किस्त बढ़ सकती है या बैंक कर्ज की अवधि में बदलाव कर सकते हैं।
इस फैसले का असर केवल कर्ज लेने वालों तक सीमित नहीं रहेगा। बैंकिंग व्यवस्था में ब्याज दरों के बदलने से जमा और बचत योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है। हालाँकि,जमा दरों में बदलाव का फैसला संबंधित बैंक अपनी वित्तीय स्थिति और बाजार परिस्थितियों को देखते हुए करते हैं। इसलिए रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी का अंतिम प्रभाव अलग-अलग बैंकों और कर्ज उत्पादों में अलग हो सकता है।
रिजर्व बैंक ने अन्य प्रमुख नीतिगत दरों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी की दर बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दी गई है,जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी और बैंक दर को 5.75 प्रतिशत पर समायोजित किया गया है। इन दरों में बदलाव का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में ब्याज दरों के संचालन को मौद्रिक नीति के नए रुख के अनुरूप बनाए रखना है।
महँगाई इस फैसले के पीछे प्रमुख कारणों में शामिल है। अगस्त में खुदरा महँगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई,जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। यह लगातार तीसरा महीना था जब उपभोक्ता महँगाई रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर रही। केंद्रीय बैंक ने भी आने वाले समय में महँगाई को लेकर जोखिमों पर चिंता जताई है।
महँगाई पर सबसे बड़ा बाहरी दबाव कच्चे तेल की कीमतों से पैदा हो रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। कच्चे तेल की ऊँची कीमतें भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण चुनौती हैं। महंगे तेल से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है,जिसका असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा ऊँची तेल कीमतों से देश के आयात बिल और बाहरी क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति की घोषणा के दौरान वैश्विक महँगाई के जोखिमों का उल्लेख किया। दुनिया के कई प्रमुख केंद्रीय बैंक भी ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और मुद्रास्फीति के दबाव के बीच अपनी मौद्रिक नीतियों को सख्त कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत के लिए भी महँगाई के जोखिमों पर नजर रखना जरूरी हो गया है।
मौद्रिक नीति समिति के इस फैसले को बाजार विशेषज्ञों की उम्मीद के अनुरूप भी माना जा रहा है। बैठक से पहले कई अर्थशास्त्रियों ने 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की संभावना जताई थी। इसका मुख्य कारण बढ़ती महँगाई,ऊँची ऊर्जा कीमतें और वैश्विक ब्याज दरों का बदलता माहौल था।
दिलचस्प बात यह है कि रिजर्व बैंक ने ब्याज दर बढ़ाने के साथ आर्थिक विकास को लेकर अपना आकलन भी मजबूत किया है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। यानी आरबीआई के आकलन में अर्थव्यवस्था की घरेलू गतिविधियाँ मजबूत बनी हुई हैं और विकास की गति को लेकर उसे पहले की तुलना में अधिक भरोसा है। इसके साथ ही वित्त वर्ष के लिए महँगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत किया गया है।
इससे स्पष्ट है कि केंद्रीय बैंक के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर मजबूत आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखना है,वहीं दूसरी ओर बढ़ती महँगाई को लंबे समय तक नियंत्रण से बाहर जाने से रोकना है। रेपो दर में बढ़ोतरी इसी संतुलन की कोशिश का हिस्सा है। अगर महँगाई का दबाव लगातार बना रहता है तो ब्याज दरों को लेकर आगे भी बाजार में चर्चा बनी रह सकती है,हालाँकि भविष्य के फैसले उस समय उपलब्ध आर्थिक आँकड़ों पर निर्भर करेंगे।
कर्ज लेने वाले आम लोगों के लिए इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईएमआई से जुड़ा है। यदि बैंक रेपो दर में बढ़ोतरी का पूरा या कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुँचाते हैं,तो फ्लोटिंग दर वाले होम लोन,कार लोन और व्यक्तिगत ऋण की ब्याज लागत बढ़ सकती है। इसका असर या तो मासिक किस्त बढ़ने के रूप में दिखाई दे सकता है या फिर कर्ज की अवधि लंबी हो सकती है। नए कर्ज लेने वालों के लिए भी ब्याज दरों की तुलना करना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।
दूसरी ओर,बचत और सावधि जमा करने वाले ग्राहकों के लिए ऊँची ब्याज दरों का कुछ सकारात्मक असर हो सकता है,क्योंकि बैंक जमा पर ब्याज दरों में बदलाव कर सकते हैं। हालाँकि,इसका वास्तविक लाभ बैंक की नीतियों और बाजार में ब्याज दरों के विकास पर निर्भर करेगा।
आरबीआई का यह कदम करीब साढ़े तीन साल बाद ब्याज दरों में सख्ती की वापसी का संकेत भी है। फरवरी 2023 में रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत की गई थी। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने लंबे समय तक दरों में बदलाव नहीं किया और बाद में दरों में कटौती का दौर शुरू हुआ। अब 5.50 प्रतिशत की नई दर के साथ मौद्रिक नीति का रुख एक बार फिर महँगाई के जोखिमों को देखते हुए सख्ती की ओर बढ़ा है।
कुल मिलाकर,रिजर्व बैंक का फैसला महँगाई और वैश्विक जोखिमों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। कच्चे तेल की ऊँची कीमतें,पश्चिम एशिया में तनाव, वैश्विक स्तर पर बदलती ब्याज दरें और घरेलू महँगाई के दबाव ने केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती बढ़ाई है। ऐसे में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी के जरिए आरबीआई ने महँगाई के खिलाफ अपनी प्राथमिकता स्पष्ट की है। अब आने वाले महीनों में महँगाई,तेल की कीमतों और आर्थिक वृद्धि के आँकड़े यह तय करने में अहम भूमिका निभाएँगे कि केंद्रीय बैंक की अगली मौद्रिक नीति किस दिशा में जाती है।
