तेहरान/इस्लामाबाद,25 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक कूटनीतिक हलचलों के बीच सैयद अब्बास अराघची ने एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दौरे की शुरुआत की है। ईरान के विदेश मंत्री इस दौरे के तहत पाकिस्तान,ओमान और रूस की यात्रा कर रहे हैं, जहाँ उनका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय परिस्थितियों पर विचार-विमर्श करना और विभिन्न देशों के साथ समन्वय को मजबूत करना है। अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी तस्नीम के अनुसार,यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है,जब ईरान,अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
रिपोर्टों के अनुसार,अराघची इस्लामाबाद में अपनी यात्रा के दौरान ईरान की सोच और सुझावों को पाकिस्तान के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। हालाँकि,यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस दौरे के दौरान उनकी अमेरिकी अधिकारियों से कोई प्रत्यक्ष बातचीत नहीं होगी। इसके बावजूद पाकिस्तान को एक संभावित संवाद माध्यम के रूप में देखा जा रहा है,जिसके जरिए ईरान अपने संदेश और रुख को अप्रत्यक्ष रूप से आगे पहुँचाना चाहता है।
ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक,अराघची का यह दौरा एक व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है,जिसमें पड़ोसी और मित्र देशों के साथ संवाद बढ़ाना प्रमुख प्राथमिकता है। उन्होंने स्वयं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में कहा कि उनकी इन यात्राओं का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर करीबी समन्वय स्थापित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि पड़ोसी देशों के साथ बेहतर तालमेल ईरान की विदेश नीति का अहम हिस्सा है।
इस दौरे का पहला पड़ाव पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद है,जहाँ ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहले ही पहुँच चुका है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होगी। इस्लामाबाद को इस समय एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक केंद्र के रूप में देखा जा रहा है,खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष वार्ता ठप पड़ी हुई है।
इसके बाद अराघची ओमान की राजधानी मस्कट जाएँगे,जहाँ क्षेत्रीय सुरक्षा,युद्ध और शांति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। ओमान लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है और कई बार तनावपूर्ण स्थितियों में संवाद का मंच उपलब्ध कराता रहा है। ऐसे में अराघची की यह यात्रा क्षेत्रीय शांति प्रयासों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दौरे का अंतिम चरण रूस में होगा,जहाँ वे द्विपक्षीय,क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बातचीत करेंगे। रूस, ईरान का एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच रक्षा,ऊर्जा और राजनीतिक सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। ऐसे में यह बैठक भविष्य की कूटनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में हाल ही में हुई सैन्य और कूटनीतिक घटनाएँ भी महत्वपूर्ण हैं। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से तेहरान और ईरान के अन्य शहरों पर हमला किया था,जिसमें कई वरिष्ठ अधिकारियों और नागरिकों की मौत हुई थी। इस हमले के जवाब में ईरान ने इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए,जिससे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुँच गया।
हालाँकि,8 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम की घोषणा हुई,लेकिन स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी। इसके बाद 11 और 12 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच लंबी वार्ता हुई,लेकिन यह बातचीत किसी ठोस परिणाम तक नहीं पहुँच सकी। इसके चलते दोनों देशों के बीच अविश्वास की स्थिति बनी रही।
स्थिति तब और जटिल हो गई जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नौसैनिक नाकाबंदी कर दी। इस कदम का सीधा असर ईरान के समुद्री व्यापार पर पड़ा, क्योंकि यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है। नाकाबंदी के कारण ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई,जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ गया।
सूत्रों के अनुसार,इस सप्ताह पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच एक और दौर की बातचीत की संभावना जताई जा रही थी,लेकिन अमेरिका की सख्त शर्तों और जारी नाकाबंदी के कारण ईरान ने इसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी गहरे हैं और समाधान की राह आसान नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अराघची का यह दौरा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास है,जिसके जरिए ईरान क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने और अंतर्राष्ट्रीय दबाव का संतुलित जवाब देने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान,ओमान और रूस जैसे देशों के साथ संवाद बढ़ाकर ईरान एक ऐसा मंच तैयार करना चाहता है,जहाँ से वह अपने हितों की रक्षा कर सके और साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान दे सके।
यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है,जब वैश्विक राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं और मध्य पूर्व का संतुलन लगातार बदल रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन बैठकों से क्या परिणाम निकलते हैं और क्या यह पहल क्षेत्र में स्थायी शांति और सहयोग की दिशा में कोई ठोस कदम साबित होती है। फिलहाल,पूरी दुनिया की नजरें इस कूटनीतिक गतिविधि पर टिकी हुई हैं,जो आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय कर सकती है।
