चेन्नई,20 जनवरी (युआईटीवी)- तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर संवैधानिक मर्यादाओं,परंपराओं और सत्ता संतुलन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के गवर्नर आर.एन. रवि मंगलवार को साल के पहले विधानसभा सत्र की शुरुआत के कुछ ही मिनटों बाद सदन से बाहर चले गए। इस घटनाक्रम ने न केवल विधानसभा की कार्यवाही को असामान्य बना दिया,बल्कि पिछले साल सामने आए उसी प्रोटोकॉल विवाद को भी फिर से जीवित कर दिया,जिसने राजभवन और राज्य सरकार के बीच रिश्तों में तल्खी बढ़ा दी थी। विधानसभा चुनाव अब महज तीन महीने दूर हैं,ऐसे में यह घटनाक्रम राजनीतिक दृष्टि से और भी ज्यादा अहम माना जा रहा है।
मंगलवार सुबह 9.30 बजे तमिलनाडु विधानसभा की बैठक शुरू हुई। यह समय और प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही परंपरा के अनुरूप थी,जिसके तहत राज्यपाल साल के पहले सत्र की शुरुआत में सदन को संबोधित करते हैं। सदन की कार्यवाही की शुरुआत जैसे ही हुई,एक तमिल प्रार्थना का गायन किया गया। इसी क्षण से विवाद ने तूल पकड़ लिया,क्योंकि राष्ट्रगान के बजाय तमिल प्रार्थना गाए जाने पर गवर्नर आर.एन. रवि ने नाराजगी जाहिर की और कुछ ही क्षणों में सदन से बाहर चले गए।
यह लगातार दूसरा साल है,जब गवर्नर रवि इसी मुद्दे पर विधानसभा छोड़कर बाहर गए हैं। इससे पहले 2025 के शुरुआती सत्र में भी उन्होंने यह कहते हुए सदन का बहिष्कार किया था कि सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से होनी चाहिए। उस समय भी उन्होंने बिना अपना पारंपरिक भाषण दिए ही सदन छोड़ दिया था। मंगलवार को भी कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। गवर्नर ने केवल एक संक्षिप्त तमिल शुभकामना दी और फिर औपचारिक अभिभाषण के बिना ही सदन से बाहर चले गए।
इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद सदन में कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति बनी,लेकिन स्पीकर एम. अप्पावु ने स्थिति को सँभालते हुए कहा कि यह मुद्दा पहले ही सुलझाया जा चुका है। उन्होंने सदन को याद दिलाया कि पिछले साल गवर्नर ने राष्ट्रगान से जुड़े इस विषय पर उन्हें पत्र लिखा था,जिसका एक औपचारिक और विस्तृत जवाब विधानसभा की ओर से दिया गया था। स्पीकर ने बताया कि उस समय के स्पीकर दुरई मुरुगन ने भी विधानसभा की परंपराओं और प्रक्रियाओं को स्पष्ट करते हुए कहा था कि तमिलनाडु विधानसभा अपनी स्थापित विधायी परंपराओं के अनुसार काम करती है।
स्पीकर अप्पावु ने जोर देकर कहा कि विधानसभा की कार्यवाही किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा पर नहीं,बल्कि संविधान,नियमों और लंबे समय से चली आ रही परंपराओं के आधार पर चलती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे को पहले ही समाप्त मान लिया गया था और सदन आगे भी उन्हीं स्थापित प्रक्रियाओं के तहत काम करता रहेगा। उनके इस बयान को सत्ता पक्ष के सदस्यों ने समर्थन दिया,जबकि विपक्ष की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं।
गवर्नर के वॉकआउट के बाद मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने स्थिति को औपचारिक रूप से स्पष्ट करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि भले ही गवर्नर ने सदन छोड़ दिया हो,लेकिन उनका भाषण दिया गया माना जाए और उसे विधानसभा के रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव को सदन में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया,जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि संवैधानिक प्रक्रिया में कोई व्यवधान न आए और विधानसभा अपने निर्धारित एजेंडे के अनुसार आगे बढ़ सके।
प्रस्ताव के पारित होने के बाद विधानसभा की कार्यवाही सामान्य रूप से आगे बढ़ी। सत्र के दौरान स्पीकर एम. अप्पावु ने राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक प्रदर्शन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में तमिलनाडु ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति दर्ज की है और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। उन्होंने पोंगल त्योहार सहायता योजना का विशेष उल्लेख किया,जिसे सरकार की जनकल्याणकारी सोच का प्रतीक बताया गया।
स्पीकर के अनुसार,पोंगल सहायता योजना के तहत राज्य के 2.23 करोड़ परिवारों को 3,000 रुपये की नकद राशि सहित उपहार पैकेज वितरित किए गए। उन्होंने कहा कि इस योजना से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों को सीधा लाभ मिला और त्योहार के मौके पर आम जनता को आर्थिक राहत मिली। सरकार ने इस योजना को राज्य की समावेशी विकास नीति का एक अहम उदाहरण बताया।
इस पूरे घटनाक्रम से पहले राज्यपाल आर.एन. रवि विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने से कुछ ही देर पहले सदन पहुँचे थे। स्पीकर एम. अप्पावु ने औपचारिक रूप से उनका स्वागत किया था और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन भी सत्र से पहले सदन में मौजूद थे। सब कुछ सामान्य प्रतीत हो रहा था और यह उम्मीद की जा रही थी कि गवर्नर अपना पारंपरिक भाषण देंगे,जिसमें सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का उल्लेख होता है। हालाँकि,राष्ट्रगान को लेकर उठे विवाद ने पूरे सत्र की शुरुआत को विवादों में बदल दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वॉकआउट केवल प्रोटोकॉल का मुद्दा नहीं है,बल्कि राजभवन और तमिलनाडु सरकार के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव का एक और उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विधेयकों की मंजूरी,नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर कई बार टकराव सामने आ चुका है। विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण इस बार का विवाद और भी अधिक राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है।
विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम को संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए सरकार और राज्यपाल दोनों पर सवाल उठाए हैं,जबकि सत्तारूढ़ डीएमके ने इसे राज्य की परंपराओं और तमिल अस्मिता से जोड़कर देखा है। डीएमके नेताओं का कहना है कि तमिल प्रार्थना सदन की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है और इसे लेकर विवाद खड़ा करना अनावश्यक है।
गवर्नर आर.एन. रवि का विधानसभा से बाहर जाना तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर टकराव की रेखा खींच गया है। चुनावी माहौल में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमाने की संभावना है,जिससे यह साफ है कि यह सत्र केवल विधायी कामकाज तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि राजनीतिक संदेशों और शक्ति संतुलन की लड़ाई का मंच भी बनेगा।
