चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (तस्वीर क्रेडिट@NealMarcusMKT)

बर्फ के नीचे छुपी महाशक्ति की जंग: ग्रीनलैंड क्यों बन गया अमेरिका,चीन और रूस के बीच तनाव का केंद्र

नई दिल्ली,20 जनवरी (युआईटीवी)- दुनिया के नक्शे पर ग्रीनलैंड एक ऐसा नाम है, जो देखने में बर्फ से ढँका,वीरान और सुविधाओं से दूर लगता है,लेकिन आज यही इलाका वैश्विक राजनीति में भूचाल का कारण बना हुआ है। अमेरिका खुले तौर पर ग्रीनलैंड पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की बात दोहरा रहा है,डेनमार्क इसका कड़ा विरोध कर रहा है,जबकि रूस और चीन भी अमेरिका को चेतावनी दे रहे हैं। सवाल यह है कि जहाँ आबादी महज करीब 56 हजार है,न बड़े शहर हैं,न सड़कों का जाल और न ही आधुनिक सुविधाएँ,वहाँ दुनिया की महाशक्तियाँ इतनी बेचैन क्यों हैं।

असल में ग्रीनलैंड की अहमियत उसकी मौजूदा स्थिति से नहीं,बल्कि उसके भविष्य से जुड़ी है। यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है,जो उत्तरी अटलांटिक महासागर और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है। भौगोलिक रूप से यह उत्तरी अमेरिका का हिस्सा माना जाता है और इसकी एकमात्र स्थलीय सीमा कनाडा से लगती है। राजनीतिक रूप से ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है,हालाँकि इसे आंतरिक प्रशासन में काफी हद तक स्वायत्तता हासिल है। रक्षा और विदेश नीति जैसे अहम फैसले अब भी डेनमार्क के हाथ में हैं। यही व्यवस्था अब वैश्विक शक्तियों की आँखों में खटकने लगी है।

ग्रीनलैंड का सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व आर्कटिक क्षेत्र के प्रवेश द्वार के रूप में है। जलवायु परिवर्तन के चलते जिस तेजी से ग्लेशियर पिघल रहे हैं,उससे आर्कटिक में नए समुद्री रास्ते खुलने लगे हैं। आने वाले वर्षों में ये रूट एशिया,यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापार की दूरी और समय को काफी कम कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि जिस देश के पास इन समुद्री मार्गों पर प्रभाव होगा,वह वैश्विक व्यापार में निर्णायक बढ़त हासिल कर सकता है। यही वजह है कि आर्कटिक को भविष्य की ‘नई सिल्क रोड’ तक कहा जाने लगा है और ग्रीनलैंड इस रोड का सबसे अहम पड़ाव बनता जा रहा है।

अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड केवल व्यापारिक रास्तों तक सीमित नहीं है,बल्कि यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में थुले एयर बेस संचालित करता है,जिसे अब पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है। यह बेस मिसाइल चेतावनी प्रणाली,स्पेस सर्विलांस और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। शीत युद्ध के दौर से ही ग्रीनलैंड अमेरिका की रक्षा रणनीति का हिस्सा रहा है,लेकिन अब रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों ने इसकी अहमियत कई गुना बढ़ा दी है। अमेरिका मानता है कि अगर ग्रीनलैंड पर उसका नियंत्रण कमजोर हुआ,तो आर्कटिक क्षेत्र में उसकी सुरक्षा रीढ़ टूट सकती है।

रूस की नजर में आर्कटिक उसका पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र है। रूस के उत्तरी तट पर लंबे आर्कटिक इलाके फैले हैं,जहाँ उसने सैन्य ठिकानों,आइसब्रेकर जहाजों और ऊर्जा परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। ग्रीनलैंड रूस के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह नाटो और अमेरिका की निगरानी का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। रूस को डर है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी पकड़ मजबूत होने से उसकी आर्कटिक रणनीति पर सीधा असर पड़ेगा और उसे सैन्य दबाव का सामना करना पड़ेगा।

चीन की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। भले ही चीन भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र से दूर है,लेकिन वह खुद को ‘निकट-आर्कटिक राज्य’ बताता है। चीन पिछले कुछ वर्षों से आर्कटिक में वैज्ञानिक रिसर्च,इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निवेश के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ग्रीनलैंड में उसने एयरपोर्ट,खनन और रिसर्च से जुड़े प्रोजेक्ट्स में दिलचस्पी दिखाई है। चीन जानता है कि भविष्य में रेयर अर्थ मिनरल्स और नए समुद्री रूट उसकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी ताकत के लिए बेहद अहम होंगे।

ग्रीनलैंड की जमीन के नीचे छिपे संसाधन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कारण माने जा रहे हैं। यहां रेयर अर्थ मिनरल्स,यूरेनियम,जिंक,आयरन ओर और संभावित तेल व गैस भंडार मौजूद हैं। ये वही खनिज हैं,जिनके बिना इलेक्ट्रिक वाहन,सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और हाई-टेक इंडस्ट्री की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिलहाल चीन इन मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन पर काफी हद तक हावी है। ऐसे में अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड एक ऐसा मौका है,जिससे वह चीन की इस बढ़त को चुनौती दे सकता है और अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता मजबूत कर सकता है।

अमेरिका बार-बार यह संकेत देता रहा है कि वह ग्रीनलैंड को रणनीतिक और आर्थिक दोनों कारणों से अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता है। पूर्व में अमेरिकी नेतृत्व द्वारा ग्रीनलैंड को खरीदने तक की बात कही जा चुकी है,जिसने डेनमार्क और यूरोप में नाराजगी पैदा की थी। डेनमार्क के लिए ग्रीनलैंड केवल एक क्षेत्र नहीं,बल्कि उसकी आर्कटिक पहचान का आधार है। अगर ग्रीनलैंड उसके हाथ से निकलता है,तो डेनमार्क आर्कटिक राजनीति में लगभग हाशिए पर चला जाएगा। यही वजह है कि कोपेनहेगन अमेरिका के दबाव के सामने डटकर खड़ा है।

इस पूरे समीकरण में ग्रीनलैंड के स्थानीय लोग भी अहम हैं। सीमित आबादी होने के बावजूद वहाँ स्वायत्तता और भविष्य को लेकर बहस तेज होती जा रही है। कुछ लोग अधिक आर्थिक अवसरों और निवेश के पक्ष में हैं,तो कुछ को डर है कि महाशक्तियों की खींचतान में उनकी पहचान और पर्यावरण खतरे में पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन पहले ही ग्रीनलैंड के जीवन और संस्कृति को प्रभावित कर रहा है,ऐसे में सैन्य और औद्योगिक गतिविधियाँ चिंता बढ़ाती हैं।

ग्रीनलैंड आज केवल बर्फ से ढँका एक द्वीप नहीं,बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक शतरंज का एक अहम मोहरा बन चुका है। आर्कटिक के बदलते स्वरूप,नए व्यापारिक रास्तों,खनिज संसाधनों और सुरक्षा समीकरणों ने इसे अमेरिका,चीन और रूस के बीच टकराव का केंद्र बना दिया है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बर्फीला द्वीप किस दिशा में जाता है और क्या यह वैश्विक शक्ति संतुलन को नया रूप देता है।