वाशिंगटन,21 जनवरी (युआईटीवी)- ग्रीनलैंड को लेकर वैश्विक राजनीति में तनाव लगातार गहराता जा रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी कीमत पर इस मुद्दे से पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ट्रंप ने एक बार फिर से साफ शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और इस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक के बाद एक पोस्ट के जरिए ट्रंप ने न केवल अपनी मंशा जाहिर की,बल्कि यूरोपीय देशों को भी यह संदेश देने की कोशिश की कि दुनिया में शांति केवल ताकत के जरिए ही कायम रखी जा सकती है और यह क्षमता सिर्फ अमेरिका के पास है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पोस्ट में अमेरिका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बताते हुए कहा कि उनके पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिकी सेना का बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण किया गया,जिसकी वजह से आज अमेरिका वैश्विक स्तर पर निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में है। उन्होंने लिखा कि यह सैन्य ताकत अब और तेजी से बढ़ रही है और अमेरिका ही वह एकमात्र शक्ति है,जो पूरी दुनिया में शांति सुनिश्चित कर सकती है। ट्रंप के अनुसार,यह शांति कूटनीतिक कमजोरियों से नहीं,बल्कि स्पष्ट और निर्णायक ताकत के जरिए आती है।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का रुख बेहद आक्रामक नजर आया। उन्होंने लिखा कि नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे के साथ उनकी ग्रीनलैंड पर “बहुत अच्छी” टेलीफोन पर बातचीत हुई है। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह स्विट्जरलैंड के दावोस में विभिन्न पक्षों के साथ इस मुद्दे पर बैठक के लिए सहमत हो गए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्रीनलैंड राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि अब इस मुद्दे पर पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है। ट्रंप के शब्दों में, “इस पर अब सभी सहमत हैं।”
इस बयान के कुछ ही देर बाद ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक चैट का स्क्रीनशॉट साझा किया,जिसमें नाटो प्रमुख मार्क रुट्टे अमेरिका के हालिया वैश्विक कदमों की तारीफ करते नजर आए। इस कथित बातचीत में रुट्टे ने सीरिया में अमेरिकी भूमिका को “अविश्वसनीय” बताया और कहा कि वह दावोस में मीडिया के जरिए गाजा और यूक्रेन में अमेरिका के प्रयासों को प्रमुखता से उठाएँगे। रुट्टे ने यह भी लिखा कि वह ग्रीनलैंड पर आगे बढ़ने का रास्ता खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं और ट्रंप से मिलने को उत्सुक हैं। इस संदेश को साझा कर ट्रंप ने यह दिखाने की कोशिश की कि नाटो नेतृत्व भी ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी दृष्टिकोण को गंभीरता से ले रहा है।
इतना ही नहीं, ट्रंप ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कथित टेक्स्ट मैसेज का स्क्रीनशॉट भी सार्वजनिक कर दिया,जिसने यूरोप में राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया। इस संदेश में मैक्रों ने सीरिया और ईरान को लेकर अमेरिका की कोशिशों की सराहना करते हुए ट्रंप को “मेरा दोस्त” कहा है। हालाँकि,मैक्रों ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर थोड़ी हैरानी भी जताई। उन्होंने लिखा कि वे सीरिया पर पूरी तरह सहमत हैं और ईरान पर भी काफी कुछ किया जा सकता है,लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर क्या करना चाहता है।
मैक्रों के संदेश में आगे दो प्रस्ताव भी रखे गए। उन्होंने सुझाव दिया कि दावोस के बाद पेरिस में जी7 की एक बैठक आयोजित की जा सकती है,जिसमें यूक्रेन, डेनमार्क,सीरिया और रूस को भी बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाए। इसके अलावा,उन्होंने यह प्रस्ताव भी दिया कि ट्रंप के अमेरिका लौटने से पहले पेरिस में साथ में डिनर किया जाए,ताकि इन मुद्दों पर अनौपचारिक बातचीत हो सके। ट्रंप द्वारा इस निजी बातचीत को सार्वजनिक करना कई यूरोपीय राजधानियों में असहजता का कारण बन गया है।
रॉयटर्स ने मैक्रों के करीबी सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि यह टेक्स्ट मैसेज असली था। सूत्र के मुताबिक,इस संदेश के सार्वजनिक होने से यह साफ होता है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति सार्वजनिक मंचों और निजी बातचीत में एक ही रुख अपनाते हैं। हालाँकि,ट्रंप द्वारा निजी संदेशों को सार्वजनिक करने को लेकर यूरोप में कूटनीतिक मर्यादाओं पर सवाल भी उठने लगे हैं।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है,जब आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक भू-राजनीति का नया केंद्र बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं,जिससे व्यापार और सैन्य रणनीति दोनों के लिहाज से इस क्षेत्र का महत्व बढ़ गया है। ग्रीनलैंड में मौजूद दुर्लभ खनिज,संभावित तेल और गैस भंडार और उसकी भौगोलिक स्थिति इसे अमेरिका,रूस और चीन के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाती है। अमेरिका पहले ही ग्रीनलैंड में थुले एयर बेस के जरिए अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है,जिसे मिसाइल चेतावनी प्रणाली और अंतरिक्ष निगरानी के लिए अहम माना जाता है।
डेनमार्क,जिसके अधीन ग्रीनलैंड आता है,लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और उसकी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा। हालाँकि,ट्रंप के हालिया बयानों और पोस्ट्स से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका इस मुद्दे को केवल आर्थिक या कूटनीतिक नहीं,बल्कि सैन्य और रणनीतिक नजरिए से देख रहा है। ट्रंप का “ताकत के जरिए शांति” वाला बयान इसी सोच को दर्शाता है।
यूरोप में कई नेता ट्रंप की इस आक्रामक भाषा को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि ग्रीनलैंड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस तरह के सार्वजनिक बयान और निजी संदेशों को उजागर करना ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है। वहीं, ट्रंप समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रपति सिर्फ वही कह रहे हैं,जो अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए जरूरी है।
ग्रीनलैंड अब केवल बर्फ से ढका एक दूरस्थ द्वीप नहीं रह गया है,बल्कि यह अमेरिका और यूरोप के रिश्तों,नाटो की एकता और वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा बन चुका है। डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों से साफ है कि वह इस मुद्दे को पीछे छोड़ने के मूड में नहीं हैं। आने वाले दिनों में दावोस और संभावित पेरिस बैठकें यह तय करेंगी कि ग्रीनलैंड पर यह टकराव बातचीत की मेज पर सुलझता है या वैश्विक राजनीति में एक और बड़े तनाव का कारण बनता है।
