अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

ट्रंप का बड़ा दावा—“ईरान डील के लिए गिड़गिड़ा रहा”,तेहरान ने बातचीत से किया इनकार

वाशिंगटन,27 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। इसी कड़ी में डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर बड़ा और विवादित दावा किया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान उनके सामने “गिड़गिड़ा रहा है” और समझौते के लिए “भीख माँग रहा है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरानी वार्ताकार बेहद “अजीब” व्यवहार कर रहे हैं और वास्तविकता से अलग बयान दे रहे हैं।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट के जरिए यह बयान दिया। उन्होंने लिखा कि ईरान के प्रतिनिधि अमेरिका के साथ समझौता करने के लिए लगातार अनुरोध कर रहे हैं,क्योंकि वे सैन्य रूप से कमजोर हो चुके हैं और उनके पास वापसी का कोई विकल्प नहीं बचा है। ट्रंप ने कहा कि इसके बावजूद ईरान सार्वजनिक रूप से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह केवल अमेरिकी प्रस्तावों पर विचार कर रहा है,जो कि “पूरी तरह गलत” है।

अपने बयान में ट्रंप ने तेहरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि उसे जल्द ही गंभीर होना होगा,अन्यथा स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर हो सकती है। उन्होंने लिखा कि अगर एक बार हालात बिगड़ गए,तो फिर पीछे लौटना संभव नहीं होगा और इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। ट्रंप के इस बयान को एक तरह की सख्त कूटनीतिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

हालाँकि,दूसरी ओर ईरान ने ट्रंप के इन दावों को खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया कि तेहरान ने अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं की है और न ही उसकी कोई योजना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने कुछ देशों के माध्यम से संदेश जरूर भेजे हैं,लेकिन इसे बातचीत या वार्ता नहीं कहा जा सकता।

अराघची के अनुसार,ईरान का रुख साफ है कि वह दबाव या धमकी के तहत किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि देश अपनी शर्तों पर ही किसी संभावित समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा। इससे यह साफ हो जाता है कि दोनों देशों के बीच संवाद को लेकर अभी भी गंभीर मतभेद बने हुए हैं।

इसी बीच यह खबर भी सामने आई है कि ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के जरिए ईरान को 15 सूत्रीय संघर्ष विराम योजना भेजी थी। हालाँकि,ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक तेहरान ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत देता है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के बजाय और बढ़ सकता है।

गौरतलब है कि 23 मार्च को ट्रंप ने यह दावा किया था कि ईरान के साथ बातचीत “सकारात्मक और रचनात्मक” दिशा में आगे बढ़ रही है। इसी के चलते उन्होंने ईरान के ऊर्जा संयंत्रों पर संभावित हमले को पाँच दिनों के लिए टालने का फैसला लिया था। यह समयसीमा अब समाप्त होने के करीब है,जिससे स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई है।

27 मार्च को इस पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दिन माना जा रहा है,क्योंकि यह तय कर सकता है कि आगे अमेरिका और ईरान के बीच संबंध किस दिशा में जाएँगे। यदि दोनों पक्षों के बीच तनाव कम नहीं होता,तो क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई की आशंका बढ़ सकती है,जिसका असर वैश्विक स्तर पर भी महसूस किया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की तीखी बयानबाजी से कूटनीतिक समाधान की संभावनाएँ कमजोर हो सकती हैं। जहाँ एक ओर अमेरिका ईरान पर दबाव बनाकर उसे बातचीत की मेज पर लाना चाहता है,वहीं ईरान अपने आत्मसम्मान और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हुए किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है।

पश्चिम एशिया पहले से ही कई संघर्षों और अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यदि स्थिति और बिगड़ती है,तो इसका असर न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा,बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर ऊर्जा बाजारों पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

ट्रंप के हालिया बयान और ईरान की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या कूटनीति के जरिए इस संकट का समाधान निकलता है या फिर यह टकराव और गहरा होता है।