नई दिल्ली,22 जुलाई (युआईटीवी)- भारत के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ की सफल ऑर्बिटल उड़ान को देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार,इस मिशन ने केवल एक तकनीकी सफलता हासिल नहीं की है,बल्कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का भी संकेत दिया है। अब तक भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम मुख्य रूप से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नेतृत्व में आगे बढ़ता रहा था,लेकिन ‘विक्रम-1’ की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब सरकारी एकाधिकार वाले मॉडल से आगे बढ़कर एक ऐसे बहु-भागीदारी वाले अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की ओर बढ़ रहा है,जिसमें निजी कंपनियाँ,स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थान और वैश्विक साझेदार मिलकर नई संभावनाओं का निर्माण करेंगे।
‘इंडिया नैरेटिव’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अब केवल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की कम लागत वाली क्षमता तक सीमित देश नहीं रह गया है। अब देश एक ऐसे व्यापक स्पेस इकोसिस्टम का निर्माण कर रहा है,जिसमें विभिन्न संस्थाएँ और निजी कंपनियां अपने स्वयं के रॉकेट,उपग्रह और भविष्य में मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशनों तथा अंतरिक्ष स्टेशन जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम कर सकेंगी। रिपोर्ट के अनुसार, यह परिवर्तन भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘विक्रम-1’ उस सफलता की निरंतरता है,जिसकी शुरुआत चंद्रयान-3 के चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग और आदित्य-एल1 के सूर्य अध्ययन मिशन से हुई थी। इन दोनों अभियानों ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई थी। अब ‘विक्रम-1’ ने यह साबित कर दिया है कि भारत केवल सरकारी एजेंसियों के माध्यम से ही नहीं,बल्कि निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए भी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि के पीछे केवल तकनीकी विकास ही नहीं,बल्कि पिछले कुछ वर्षों में किए गए नीतिगत सुधारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। रिपोर्ट के अनुसार,वर्ष 2020 के आसपास शुरू किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र यानी इन-स्पेस के गठन ने निजी कंपनियों के लिए नए अवसरों का मार्ग प्रशस्त किया। इन सुधारों के बाद पहली बार निजी कंपनियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य करने और सरकारी संसाधनों का उपयोग करने की अनुमति मिली।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इन-स्पेस ने ‘विक्रम-1’ मिशन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संस्था ने हैदराबाद स्थित निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस को अपने हार्डवेयर का परीक्षण करने की सुविधा उपलब्ध कराई और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के श्रीहरिकोटा स्थित प्रक्षेपण केंद्र से रॉकेट लॉन्च करने की अनुमति भी दी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत सरकार निजी कंपनियों को केवल अनुमति देने तक सीमित नहीं है,बल्कि उन्हें राष्ट्रीय अंतरिक्ष अवसंरचना का उपयोग करने में भी सहयोग प्रदान कर रही है।
रिपोर्ट के अनुसार,इन-स्पेस का उद्देश्य केवल निजी रॉकेट कंपनियों को प्रोत्साहित करना नहीं है,बल्कि पूरे अंतरिक्ष उद्योग को एक साझा राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र में विकसित करना है। यह संस्था प्रक्षेपण सेवाओं,उपग्रह निर्माण,अंतरिक्ष तकनीक,डेटा सेवाओं और अन्य संबंधित क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों को एक मंच पर जोड़ रही है। इससे विभिन्न कंपनियों को अलग-अलग संसाधन विकसित करने के बजाय साझा सुविधाओं और विशेषज्ञता का लाभ मिल रहा है,जिससे लागत कम होने के साथ-साथ नवाचार को भी बढ़ावा मिल रहा है।
हैदराबाद स्थित स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस ने ‘विक्रम-1’ मिशन में अत्याधुनिक विनिर्माण तकनीकों का उपयोग किया। रिपोर्ट के अनुसार,इस रॉकेट में ऑल-कार्बन कम्पोजिट मोटर केसिंग,उच्च प्रदर्शन वाली ठोस ईंधन मोटर और त्रि-आयामी प्रिंटिंग तकनीक से तैयार किए गए प्रणोदन घटकों का इस्तेमाल किया गया। इन तकनीकों को अंतरिक्ष उद्योग में अत्यधिक उन्नत माना जाता है और इनका उपयोग अब तक केवल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन तथा दुनिया की कुछ अग्रणी एयरोस्पेस कंपनियां ही करती थीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से न केवल रॉकेट का वजन कम किया जा सकता है,बल्कि उसकी कार्यक्षमता और विश्वसनीयता भी बढ़ाई जा सकती है। साथ ही विनिर्माण लागत में कमी आने से भविष्य में अंतरिक्ष प्रक्षेपण सेवाएँ अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकती हैं। यही कारण है कि ‘विक्रम-1’ को भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
रिपोर्ट में इस मिशन के साथ भेजे गए तकनीकी प्रदर्शन पेलोड का भी विशेष उल्लेख किया गया है। इसमें भारत की ग्रहा स्पेस,कॉस्मोसर्व, जर्मनी की डीक्यूबेड तथा स्वयं स्काईरूट एयरोस्पेस के प्रौद्योगिकी प्रदर्शन पेलोड शामिल थे। इन पेलोड का उद्देश्य नई तकनीकों का अंतरिक्ष में परीक्षण करना और भविष्य के व्यावसायिक मिशनों के लिए उनकी उपयोगिता का मूल्यांकन करना था।
रिपोर्ट के अनुसार,यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि इन कंपनियों ने अपने पेलोड के लिए भारत की निजी प्रक्षेपण सेवा को चुना,जबकि उनके पास दुनिया के अन्य देशों में उपलब्ध लॉन्च सेवाओं का विकल्प भी मौजूद था। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत की निजी अंतरिक्ष प्रक्षेपण क्षमता पर अब वैश्विक ग्राहकों का भरोसा भी बढ़ने लगा है। यदि यह विश्वास इसी प्रकार बना रहता है,तो आने वाले वर्षों में भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यावसायिक प्रक्षेपण बाजार में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है।
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में नीतिगत सुधारों का प्रभाव स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार,वर्ष 2022 में जहां देश में अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े स्टार्टअप की संख्या बेहद सीमित थी,वहीं वर्ष 2024 तक यह बढ़कर लगभग 200 तक पहुँच गई। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि युवा उद्यमी और तकनीकी विशेषज्ञ अब अंतरिक्ष क्षेत्र को एक बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
निवेश के मोर्चे पर भी इस क्षेत्र ने उल्लेखनीय प्रगति की है। रिपोर्ट के अनुसार,वर्ष 2023 के केवल आठ महीनों के भीतर ही भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में लगभग 1,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे निजी कंपनियाँ अधिक सफल मिशन संचालित करेंगी,घरेलू और विदेशी निवेशकों का विश्वास भी लगातार बढ़ेगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत सरकार ने वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में देश की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं। वर्तमान में वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी लगभग दो प्रतिशत मानी जाती है। नीति निर्माताओं का लक्ष्य इसे वर्ष 2030 तक बढ़ाकर आठ प्रतिशत और वर्ष 2047 तक 15 प्रतिशत तक पहुँचाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे,बल्कि निजी क्षेत्र की व्यापक भागीदारी भी आवश्यक होगी।
‘विक्रम-1’ की सफलता इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार,इस मिशन ने यह साबित कर दिया है कि भारत के पास अब वह औद्योगिक आधार,तकनीकी क्षमता और नवाचार की शक्ति मौजूद है,जिसके बल पर वह वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा सकता है। निजी कंपनियों,सरकारी संस्थानों और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों के बीच बढ़ता सहयोग भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की क्षमता रखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत केवल उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशनों,अंतरिक्ष स्टेशन,गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण,उपग्रह निर्माण,अंतरिक्ष आधारित सेवाओं और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावसायिक उपयोग जैसे क्षेत्रों में भी वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है। ‘विक्रम-1’ की सफलता ने इस महत्वाकांक्षी भविष्य की मजबूत नींव रख दी है और यह उपलब्धि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखी जा रही है।
