आरक्षण पर विवादित बयान के बाद वरिष्ठ आईएएस संतोष वर्मा निलंबित (तस्वीर क्रेडिट@drbrajeshrajput)

आरक्षण पर विवादित बयान के बाद वरिष्ठ आईएएस संतोष वर्मा निलंबित,सामाजिक संगठनों का तीखा विरोध,मध्य प्रदेश सरकार ने की सख्त कार्रवाई

भोपाल,27 नवंबर (युआईटीवी)- मध्य प्रदेश में आरक्षण संबंधी विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य सरकार ने आरक्षण व्यवस्था पर सार्वजनिक मंच से विवादित टिप्पणी करने के आरोप में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया और उसके तुरंत बाद बुधवार देर रात निलंबित कर दिया। संतोष वर्मा 2011 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में उप सचिव के पद पर तैनात थे,लेकिन 22 नवंबर को दिए गए उनके बयान ने न सिर्फ प्रशासनिक हलकों में खलबली मचा दी,बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संगठनों में भी गुस्से की लहर पैदा कर दी।

यह पूरा विवाद भोपाल में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम से शुरू हुआ,जहाँ संतोष वर्मा ने आरक्षण व्यवस्था की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरक्षण ने अपना मूल उद्देश्य काफी हद तक पूरा कर लिया है और अब यह एक स्थायी राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। उनके इस बयान को पहले ही कई लोगों ने आपत्तिजनक बताया,लेकिन विवाद तब और बढ़ गया जब कार्यक्रम का एक और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो में वर्मा कहते हुए दिख रहे थे—“आरक्षण का लाभ एक परिवार के सिर्फ एक सदस्य तक सीमित होना चाहिए,जब तक कि कोई ब्राह्मण अपनी बेटी मेरे बेटे को न दे दे या उससे रिश्ता न जोड़ ले।”

इस कथन ने आग में घी डालने का काम किया। एससी,एसटी और ओबीसी समुदायों के संगठनों ने इस बयान को संविधान का अपमान बताया और त्वरित कार्रवाई की माँग की। हैरानी की बात यह रही कि ब्राह्मण समाज ने भी इस टिप्पणी को आपत्तिजनक कहा और सार्वजनिक मंच से किसी समुदाय को इस तरह तिरस्कृत करने को गलत करार दिया। विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता तुरंत सक्रिय हुए और भोपाल के वल्लभ भवन,यानी राज्य सचिवालय के बाहर भारी संख्या में जमा हुए। भीड़ ने नारेबाजी की,संतोष वर्मा के पुतले फूँके और उनके खिलाफ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने की माँग उठाई।

प्रदर्शनकारियों के हाथों में पोस्टरों पर लिखा था—“अफसर संविधान नहीं बदल सकते”, “बाबासाहेब की विरासत की रक्षा करो।” प्रदर्शन इतना तीव्र था कि पुलिस और प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर निशाना साधते हुए कहा कि एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ऐसी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी प्रशासनिक तटस्थता और संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

जैसे-जैसे विरोध बढ़ता गया,सरकार पर दबाव भी बढ़ता गया और बुधवार को सामान्य प्रशासन विभाग ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए संतोष वर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। नोटिस में साफ लिखा गया कि वर्मा का बयान सामाजिक समरसता के लिए हानिकारक है और यह अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 तथा अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियम, 1969 का सीधा उल्लंघन है। उनसे सात दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने को कहा गया,साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि वे निर्धारित समय में जवाब नहीं देते,तो उनके विरुद्ध एकतरफा विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने इससे भी आगे कदम उठाया। बुधवार देर रात,संतोष वर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। सरकार के इस फैसले को सामाजिक संगठनों ने स्वागत योग्य बताया और कहा कि ऐसी टिप्पणियों से समाज में विभाजन का खतरा पैदा हो सकता है,इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों को सार्वजनिक मंचों पर अधिक जिम्मेदारी और संयम बरतना चाहिए।

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कोई भी सिविल सर्वेंट,चाहे वह किसी भी पद या रैंक पर हो,संविधान द्वारा निर्धारित नीतियों और संवैधानिक प्रावधानों की इस प्रकार आलोचना नहीं कर सकता,जिससे सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा में रहते हुए अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने व्यक्तिगत विचारों और आधिकारिक दायित्वों के बीच स्पष्ट रेखा बनाए रखें। यदि कोई अधिकारी ऐसा करने में विफल रहता है,तो उसके खिलाफ कार्रवाई किया जाना स्वाभाविक है।

इस पूरी घटना ने एक बार फिर आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस को तेज कर दिया है—क्या आरक्षण का दायरा सीमित होना चाहिए,क्या संशोधन की आवश्यकता है और क्या इसे समयबद्ध रूप से पुनरीक्षित किया जाना चाहिए? परंतु इन बहसों के समानांतर प्रश्न यह भी उठ रहा है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएँ क्या होनी चाहिए,विशेष रूप से तब जब उनके बयान समाज के कमजोर वर्गों को प्रभावित करते हों।

फिलहाल, संतोष वर्मा के निलंबन के बाद माहौल कुछ हद तक शांत हुआ है,पर यह मामला आने वाले दिनों में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा का केंद्र बना रहेगा। सरकार की सख्त कार्रवाई एक संदेश के रूप में देखी जा रही है कि संवैधानिक मुद्दों पर किसी भी प्रकार की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।